कारपोरेट मीडिया की भाषा और सहमति का निर्माण

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


कारपोरेट मीडिया की भाषा और सहमति का निर्माण

किसी भी सभ्यता में भाषा केवल सूचना का माध्यम नहीं होती; वह उस सभ्यता की चेतना, नैतिक दिशा और सत्ता-संरचना को प्रतिबिंबित करती है। जब भाषा बदलती है, तो केवल शब्द नहीं बदलते—समाज की सोच, उसकी संवेदना और उसके प्रश्न भी बदल जाते हैं। समकालीन कारपोरेट मीडिया की भाषा को इसी परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है।

कारपोरेट मीडिया स्वयं को तटस्थ, तथ्यपरक और पेशेवर बताता है। किंतु यह तटस्थता वस्तुतः एक चयनित मौन है—ऐसा मौन जो व्यवस्था पर प्रश्न नहीं उठाता, बल्कि उसे स्वाभाविक और अपरिहार्य मानकर प्रस्तुत करता है। यह भाषा अन्याय को उचित सिद्ध नहीं करती, पर उसे अपरिहार्य बना देती है। यही इसका सबसे सूक्ष्म, किंतु सबसे प्रभावी आयाम है।

इस भाषा की एक विशेषता है—प्रश्नों का क्रमिक निष्कासन। सामाजिक, आर्थिक या नैतिक संकटों को इस तरह शब्दांकित किया जाता है मानो वे किसी मानवीय निर्णय का परिणाम न होकर प्राकृतिक घटनाएँ हों। बेरोज़गारी “संक्रमण काल” बन जाती है, विस्थापन “विकास-जनित प्रक्रिया” और असमानता “वैश्विक प्रवृत्ति”। जब समस्याएँ इस भाषा में ढल जाती हैं, तो उनके उत्तर खोजने की ज़रूरत भी समाप्त हो जाती है।


इतिहास बताता है कि औपनिवेशिक सत्ता भी इसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करती थी। तब कहा जाता था कि उपनिवेशित समाज स्वयं को शासित करने के लिए तैयार नहीं हैं। आज वही विचार अधिक परिष्कृत शब्दावली में दोहराया जाता है—अब निर्णय जनता के नहीं, “बाज़ार”, “विशेषज्ञ” या “वैश्विक मानकों” के माने जाते हैं। सत्ता का स्वरूप बदला है, पर भाषा की आत्मा नहीं।


कारपोरेट मीडिया की भाषा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—संवेदना का विस्थापन। मानवीय पीड़ा को आँकड़ों, ग्राफ़ों और प्रतिशतों में बदल दिया जाता है। जब दुख संख्या बन जाता है, तो करुणा अप्रासंगिक हो जाती है। यह भाषा समाज को कठोर नहीं बनाती, बल्कि उसे उदासीन बनाती है—और सभ्यतागत क्षरण अक्सर यहीं से शुरू होता है।


सबसे बड़ा भ्रम “तटस्थता” का है। कोई भी भाषा जो सत्ता-संरचना पर प्रश्न नहीं उठाती, वह स्वतः ही सत्ता की भाषा बन जाती है। तटस्थता का यह दावा वस्तुतः यथास्थिति की रक्षा है। भारतीय बौद्धिक परंपरा में मौन को भी अर्थपूर्ण माना गया है, पर वह मौन तपस्या से उपजा होता है, सुविधा से नहीं।


इसका दीर्घकालिक प्रभाव राजनीतिक से अधिक सभ्यतागत है। इतिहास, स्मृति और नैतिक विमर्श को “अप्रासंगिक” बताकर खारिज किया जाने लगता है। धीरे-धीरे समाज यह मानने लगता है कि सभ्यता कोई जीवित चेतना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का उपोत्पाद मात्र है। यही वह क्षण होता है जब समाज बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक उपनिवेश का शिकार होता है।


आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया की भाषा पर पुनर्विचार हो। प्रश्न पूछना अविवेक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और सभ्यतागत जिम्मेदारी है। यदि भाषा केवल सहमति गढ़ने का औज़ार बन जाए, तो सूचना तंत्र जीवित रहते हुए भी अपना आत्मा-धर्म खो देता है।


"सभ्यताएँ तब नहीं टूटतीं जब सत्ता अन्यायी होती है—इतिहास इसका साक्षी है। सभ्यताएँ तब टूटती हैं जब अन्याय की भाषा सामान्य हो जाती है।"