चौथा स्तम्भ, नई अराजकता और जवाबदेही की रेखा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla 


चौथा स्तम्भ, नई अराजकता और जवाबदेही की रेखा

प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाना कोई औपचारिक विशेषण नहीं, बल्कि एक गहरी संवैधानिक और सामाजिक समझ का परिणाम है। पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं; सत्ता, समाज और नागरिक के बीच एक जिम्मेदार सेतु बनना है। इसी कारण पत्रकारिता को पेशेवर अनुशासन, नैतिक मानकों और विधिक सीमाओं के भीतर विकसित किया गया—ताकि सवाल पूछने की स्वतंत्रता, गरिमा और जवाबदेही के साथ संतुलित रहे।


पारंपरिक पत्रकारिता में कुछ बुनियादी शिष्टाचार और एथिक्स स्वाभाविक माने जाते हैं। इंटरव्यू से पहले सहमति, फोटो या वीडियो से पहले अनुमति, और असहमति मिलने पर सम्मानजनक दूरी—ये केवल औपचारिक नियम नहीं, बल्कि पेशे की विश्वसनीयता के स्तम्भ हैं। पहचान-पत्र (आईडी) का महत्व भी इसी भरोसे की शृंखला का हिस्सा है। वह यह स्पष्ट करता है कि प्रश्नकर्ता किसी संस्थान, आचार-संहिता और उत्तरदायित्व से जुड़ा है।


डिजिटल युग ने इस परिदृश्य को उलट दिया है। कैमरा, माइक और प्लेटफ़ॉर्म अब किसी बड़े न्यूज़रूम की संपत्ति नहीं रहे; वे हर स्मार्टफ़ोन में समाहित हैं। YouTube जैसे मंचों के मोनेटाइजेशन मॉडल ने सामग्री-निर्माण को करियर और प्रभाव—दोनों का साधन बना दिया। यह परिवर्तन अपने आप में नकारात्मक नहीं; इसने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया, विविध आवाज़ों को स्थान दिया। परंतु हर लोकतंत्रीकरण अपने साथ अराजकता की आशंका भी लाता है।


समस्या वहाँ जन्म लेती है जहाँ “सामग्री निर्माण” और “पत्रकारिता” की रेखा धुंधली हो जाती है। हर वीडियो रिपोर्ट नहीं, हर प्रश्न इंटरव्यू नहीं, और हर माइक पत्रकारिता का प्रतीक नहीं होता। पेशेवर पत्रकारिता में प्रशिक्षण, सत्यापन, संपादकीय समीक्षा और कानूनी जवाबदेही—ये चारों मिलकर विश्वसनीयता गढ़ते हैं। यदि कोई व्यक्ति बिना स्पष्ट पहचान, बिना सहमति और बिना एथिक्स के सार्वजनिक या निजी स्थानों में घुसकर रिकॉर्डिंग करता है, तो वह स्वतंत्रता से अधिक अतिक्रमण की श्रेणी में आ सकता है।


हाल के कुछ घटनाक्रम—जिनमें यूट्यूबरों के आचरण पर प्रश्न उठे—इसी असंतुलन की ओर संकेत करते हैं। विरोध-प्रदर्शनों, संवेदनशील परिस्थितियों या निजी क्षणों में कैमरा लेकर प्रवेश करना केवल तकनीकी क्रिया नहीं; वह सामाजिक विश्वास और व्यक्तिगत अधिकारों की परीक्षा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, निजता, सहमति और गरिमा उतनी ही अनिवार्य हैं।


यहाँ नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही प्रासंगिक है। किसी से बातचीत या रिकॉर्डिंग से पहले पहचान और उद्देश्य पूछना कोई असभ्यता नहीं; यह वैध सतर्कता है। पहचान-पत्र की मांग, विशेषकर तब जब स्थिति संवेदनशील हो, एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवहार के रूप में देखी जा सकती है—बशर्ते यह मांग संयम, शालीनता और विधिक समझ के साथ हो। भीड़तंत्र या शत्रुता के भाव से किया गया प्रतिरोध स्वयं समस्या बन सकता है।


साथ ही, यह भी याद रखना आवश्यक है कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले सभी लोग “अनाधिकृत” नहीं होते। अनेक स्वतंत्र पत्रकार, शोधकर्ता और ग्राउंड-रिपोर्टर संस्थागत ढांचे से बाहर रहकर भी उच्च पेशेवर मानकों का पालन करते हैं। इसलिए समाधान blanket अविश्वास में नहीं, बल्कि स्पष्ट मानकों और पारदर्शिता में है।


समय की मांग दोतरफा है।

पहला, सामग्री-निर्माताओं के लिए—आत्मनियमन, सहमति, तथ्य-सत्यापन और आचार-संहिता का सम्मान। विश्वसनीयता views से नहीं, विवेक से बनती है।

दूसरा, नागरिकों और संस्थाओं के लिए—मीडिया साक्षरता, विधिक अधिकारों की समझ, और संतुलित प्रतिक्रिया। हर कैमरा शत्रु नहीं, हर सवाल अतिक्रमण नहीं।


लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ आज माध्यमों के विस्तार से कमजोर नहीं, बल्कि आचरण के संकट से चुनौतीग्रस्त है। तकनीक ने शक्ति का विकेंद्रीकरण किया है; अब नैतिकता और जवाबदेही का विकेंद्रीकरण भी उतना ही आवश्यक है। पहचान, सहमति और मर्यादा—ये तीन शब्द ही उस नई रेखा को परिभाषित करेंगे जहाँ स्वतंत्रता और अनुशासन एक-दूसरे के पूरक बन सकें।