अख़बारों का अवसान या पत्रकारिता का पुनर्जन्म?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
अख़बारों का अवसान या पत्रकारिता का पुनर्जन्म?
2009 का वह दौर याद कीजिए जब न्यूज़रूम में एक भविष्यवाणी अक्सर उद्धृत होती थी—कि 2040 तक दुनिया के सभी अख़बार बंद हो जाएंगे। यह कथन स्वर्गीय मधुसूदन आनंद जैसे अनुभवी संपादक के मुख से निकला था, इसलिए उसमें सनसनी से अधिक संकेत छिपा था। तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तेज़ी से फैल रहा था, पर विज्ञापन बाज़ार पर उसका वर्चस्व सीमित था। बहुतों को लगा, यह अनुमान अतिशयोक्ति है। लेकिन समय की नदी ने बहस को नया संदर्भ दे दिया है।
हाल के वर्षों में वैश्विक और भारतीय मीडिया परिदृश्य में जो हलचलें दिखीं—छँटनियाँ, ब्यूरो बंद होना, प्रसार संख्या का गिरना, चैनलों की वित्तीय जकड़न—उन्होंने उस भविष्यवाणी को फिर चर्चा में ला खड़ा किया। The Washington Post जैसी प्रतिष्ठित संस्था में कटौती की खबर हो या महामारी के दौरान कई प्रकाशनों का अवसान, ये घटनाएँ केवल कारोबारी संकट का संकेत नहीं; वे मीडिया उपभोग की बदलती आदतों और अर्थशास्त्र की कठोर सच्चाई का दर्पण हैं।
परंतु क्या यह सचमुच “अख़बारों की मौत” की कहानी है? या पत्रकारिता के एक नए अवतार का संक्रमणकाल?
वास्तव में संकट का केंद्र माध्यम नहीं, मॉडल है। प्रिंट का पारंपरिक आधार—विज्ञापन + प्रसार—डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की लक्षित विज्ञापन क्षमता के सामने कमजोर पड़ा। एल्गोरिद्म ने विज्ञापनदाता को वह सटीकता दी जो अख़बार कभी नहीं दे पाए। दूसरी ओर, दर्शक/पाठक की अपेक्षाएँ भी बदलीं: तात्कालिकता, वैयक्तिकरण, और इंटरैक्टिव अनुभव। न्यूज़ अब सुबह की रस्म नहीं, हर पल की धारा है।
टीवी न्यूज़ की स्थिति भी विरोधाभासी है। पहुँच व्यापक है, पर विश्वास का प्रश्न बार-बार उभरता है। शोर, बहस, और ‘ब्रेकिंग’ की अति ने सूचना और मत के बीच की रेखा धुंधली कर दी। जब दर्शक को लगता है कि स्क्रीन पर वास्तविकता से अधिक नैरेटिव परोसा जा रहा है, तो वह विकल्प खोजता है। यही वह जगह है जहाँ सोशल मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता ने जगह बनाई।
सोशल मीडिया का उदय लोकतंत्रीकरण का प्रतीक है—हर नागरिक संभावित प्रकाशक। पर इसके साथ जोखिम भी जुड़ा है: अपुष्ट सूचना, भावनात्मक ध्रुवीकरण, और एल्गोरिद्मिक इको-चैम्बर्स। फिर भी, यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि कई बार डिजिटल मंचों ने वे प्रश्न उठाए जिन्हें मुख्यधारा ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया। दर्शक संख्या और एंगेजमेंट के आँकड़े इस बदलाव के सामाजिक मनोविज्ञान को रेखांकित करते हैं।
विश्वास का संकट यहाँ केंद्रीय शब्द है। मीडिया पर भरोसा केवल तथ्य-सत्यापन से नहीं, बल्कि निष्पक्षता की अनुभूति से बनता है। यदि पाठक/दर्शक को बार-बार लगे कि खबरों का चयन सत्ता-समीपता या वैचारिक आग्रह से संचालित है, तो वह दूरी बना लेता है। यह दूरी प्रसार संख्या में गिरावट से लेकर TRP के उतार-चढ़ाव तक हर जगह दिखती है।
लेकिन तस्वीर एकांगी नहीं। प्रिंट मीडिया आज भी गहराई, संदर्भ और संरचित विश्लेषण का सबसे सक्षम मंच है। जाँच-पड़ताल, डेटा-आधारित रिपोर्टिंग और दीर्घ-रूप लेखन—इनकी विश्वसनीयता और संग्रहणीयता डिजिटल की तात्कालिकता से अलग मूल्य रखती है। कई अख़बार सफलतापूर्वक हाइब्रिड मॉडल की ओर बढ़े हैं—डिजिटल सब्सक्रिप्शन, पेवॉल, पॉडकास्ट, न्यूज़लेटर, और मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग। प्रश्न अस्तित्व का नहीं, अनुकूलन का है।
पत्रकारिता के छात्रों के लिए यह समय भय का नहीं, स्पष्टता का है। करियर अब केवल “माध्यम चुनने” का निर्णय नहीं; कौशल-संयोजन की चुनौती है। रिपोर्टिंग, डेटा साक्षरता, विज़ुअल स्टोरीटेलिंग, ऑडियंस एंगेजमेंट, और सबसे बढ़कर—नैतिक विवेक। प्लेटफ़ॉर्म बदलते रहेंगे; विश्वसनीयता और बौद्धिक ईमानदारी स्थायी पूँजी रहेंगी।
मधुसूदन आनंद की भविष्यवाणी को शाब्दिक सत्य या असत्य की कसौटी पर परखना शायद सीमित दृष्टि होगी। उसका सार यह था कि मीडिया उद्योग को अपनी आत्मा और संरचना—दोनों पर पुनर्विचार करना होगा। अख़बार बंद होंगे या नहीं, यह बाज़ार और तकनीक तय करेंगे। पर पत्रकारिता बचेगी या नहीं, यह समाज और संस्थाएँ तय करेंगी।
अंततः, माध्यमों का अवसान इतिहास का नियम है; मूल्यों का अवसान विकल्प नहीं। यदि पत्रकारिता सत्य, संतुलन और सार्वजनिक हित के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पुनर्स्थापित करती है, तो यह काल “मौत” का नहीं, पुनर्जन्म का अध्याय भी बन सकता है। लोकतंत्र को अख़बार या चैनल नहीं, विश्वसनीय सूचना और साहसी प्रश्न चाहिए—किसी भी माध्यम से।
