चरण–महिमा और महावर का आध्यात्मिक रहस्य

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


चरण–महिमा और महावर का आध्यात्मिक रहस्य

सनातन धर्म में चरण केवल शरीर का अंग नहीं; वे प्राण के आधार, विनय के द्वार और आध्यात्मिक ऊर्जाओं के सेतु हैं। मंगल कार्य और उपासना से पूर्व जब हम चरणों को महावर (आलता) से अलंकृत देखते हैं, तो वह केवल शृंगार नहीं होता—वह पृथ्वी और प्राण के मिलन का उत्सव होता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो तलवों में उगता हुआ सूर्य बाँध दिया गया हो—लालिमा, उष्मा और जीवन का उद्गम एक साथ सिमट आया हो।

१. पृथ्वी–स्पर्श और प्राण–दोलन


क्या आपने कभी ओस से भीगे कच्चे मार्ग पर नंगे पाँव चलने का अनुभव किया है? मिट्टी की शीतलता जब तलवों से होकर नसों में प्रवाहित होती है, तब केवल स्पर्श नहीं होता—एक मौन संवाद आरम्भ होता है।


उपनिषदों में कहा गया—“अन्नं ब्रह्मेति।” अन्न पृथ्वी से उत्पन्न है और पृथ्वी ही हमारे शरीर का मूल तत्त्व है। जब तलवा पृथ्वी को छूता है, तो पंचमहाभूतों का पुनर्मिलन होता है।


तलवे में असंख्य नाड़ी–बिंदु होते हैं। आयुर्वेद और योगशास्त्र दोनों मानते हैं कि तलवे से सम्पूर्ण शरीर की नाड़ियों का सूक्ष्म संबंध है। अतः पृथ्वी–स्पर्श से जो शीतल दोलन उत्पन्न होता है, वह प्रत्येक कोशिका तक पहुँच सकता है।


यह केवल जैविक प्रतिक्रिया नहीं—यह “मिट्टी की भाषा” है। यदि संवेदन–ग्रंथियाँ जागृत हों, तो अनुभव होगा कि पृथ्वी अपना स्नेह ज्ञापित कर रही है।


२. चरण और प्राण का वैदिक रहस्य


वेदों में “प्राण” को जीवन का आधार कहा गया है। प्रश्नोपनिषद् में प्राण को देवताओं का राजा बताया गया। प्राण के पाँच भेद—प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान—सभी शरीर में प्रवाहित होते हैं।


तलवा विशेषतः अपान वायु से संबंधित माना जाता है, जो स्थिरता और आधार का प्रतीक है। इसलिए चरणों को “आधार” कहा गया।


सनातन परम्परा में “चरण–स्पर्श” का विधान केवल सामाजिक विनम्रता नहीं, बल्कि ऊर्जा–विनिमय का आध्यात्मिक विज्ञान है। ऊर्जा का प्रवाह संपीडन से विरलन की ओर होता है। जब शिष्य गुरु के चरण स्पर्श करता है, तो वह अपने अहंकार का संपीडन करता है और गुरु की प्राण–शक्ति को ग्रहण करने योग्य बनता है।


यही कारण है कि “चरण–कमल” शब्द प्रचलित हुआ—कमल की भाँति पवित्र, आधारभूत और ऊर्जस्वी।


३. आल्हखण्ड की कथा और तलवों में प्राण


आल्हखण्ड में वीर योद्धा मलखान की कथा आती है। कहा गया कि उनके प्राण तलवों में स्थित थे। यह रहस्य माहिल को ज्ञात था और उसने पृथ्वीराज चौहान को बताया, जिससे उनके पैरों में आघात कर उन्हें पराजित किया जा सके।


यह कथा प्रतीकात्मक है— तलवे में प्राण का होना दर्शाता है कि जीवन का आधार नीचे है, स्थिरता में है।


योगदृष्टि से देखें तो “मूलाधार चक्र” भी शरीर के निम्न भाग में स्थित है। यह स्थिरता, अस्तित्व और जीवन–ऊर्जा का केन्द्र है। अतः तलवे में प्राण–घनत्व का विचार लोक–कथा नहीं, बल्कि गूढ़ प्रतीक है।


४. महावर (आलता) : लाली का आध्यात्मिक अर्थ


भारतीय विवाह और मंगल–कार्य में स्त्रियों के चरणों पर महावर लगाया जाता है। यह लाल रंग केवल सौंदर्य का साधन नहीं; वह—


* भोर की अरुणिमा का प्रतीक है

* सृजन–ऊर्जा का प्रतीक है

* पृथ्वी की उर्वरता का प्रतीक है


लाल रंग “शक्ति” का द्योतक है। शक्ति–तत्त्व के बिना सृष्टि संभव नहीं।


विवाह के उपरांत जब वधू कलश को चरण से स्पर्श कर गृह–प्रवेश करती है, तो यह केवल अनुष्ठान नहीं; यह प्रतीक है कि वह अपने प्राण–तत्त्व से उस गृह को सजीव कर रही है।


भारतीय दृष्टि में स्त्री “प्रकृति” है और पुरुष “पुरुष”। प्रकृति सृजन–शक्ति है, इसलिए उसके चरणों का शृंगार अधिकाधिक महत्वपूर्ण माना गया। यहाँ यह स्मरणीय है कि यह श्रेष्ठता–हीनता का प्रश्न नहीं; यह सर्जन–क्षमता का सम्मान है।


५. चरण–सेवा और ईश्वर–तत्त्व


कृष्ण द्वारा चरण–सेवा का प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। महाभारत–परम्परा में वर्णित है कि उन्होंने अतिथियों और भक्तों के चरण पखारे। विशेषतः सुदामा के चरण धोने का प्रसंग भक्ति–पराकाष्ठा का उदाहरण है।


ईश्वर द्वारा चरण धोना क्या दर्शाता है? यह कि सेवा सर्वोच्च है। जो चरण संसार–धूलि में चलकर सेवा करते हैं, ईश्वर स्वयं उनके कलुष को धोते हैं। यह दृश्य केवल कथा नहीं—यह धर्म का मर्म है। चरण–धुलाई का अर्थ है—प्राणों पर जमे सांसारिक विकारों का शुद्धिकरण।


६. चरण और विनय–संस्कृति


भारतीय समाज में “चरण–वन्दना” केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि अहंकार–त्याग का अभ्यास है। जब हम माता–पिता, गुरु या संत के चरण स्पर्श करते हैं, तब—


* हम अपने ‘अहं’ को झुकाते हैं

* हम ऊर्जा–वृत्त को सक्रिय करते हैं

* हम आशीर्वाद के लिए स्वयं को पात्र बनाते हैं


विनय ही आध्यात्मिक उन्नति का प्रथम सोपान है।


७. नाऊ ठाकुर की मौन सेवा : कर्मयोग का पाठ


भारतीय ग्राम्य–जीवन में नाई (नाऊ) केवल केश–कर्तन करने वाला नहीं; वह संस्कारों का सहभागी होता है। विवाह, उपनयन, श्राद्ध—हर संस्कार में उसकी भूमिका होती है।


“संरक्षकतुल्य नाऊ ठाकुर” की मौन सेवा उस कर्मयोग की स्मृति है जिसमें बिना अपेक्षा के कार्य किया जाता है।


यह गीता–सिद्धांत है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” सेवा में अहंकार नहीं, समर्पण है।


उनके द्वारा चरणों का स्पर्श, शृंगार और सेवा—यह सब केवल सामाजिक कर्म नहीं; यह संस्कार–परम्परा की निरन्तरता है।


८. प्राण–सौंदर्य और प्रकृति–अनुभूति


प्राण का सौंदर्य पहचानना ही प्रकृति के सौंदर्य से परिचित होना है।


जब महावर से सजे पाँव धरती पर पड़ते हैं, तो वह स्थान सजीव प्रतीत होता है। यह प्रतीक है कि जहाँ चेतना का स्पर्श हो, वहाँ जीवन खिल उठता है।


धरती बंजर तब होती है जब चेतना शुष्क हो जाए। प्राण–युक्त स्पर्श उसे उर्वर बनाता है। इसलिए कहा गया— “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।” स्त्री के चरणों का सम्मान उसी प्राण–ऊर्जा का सम्मान है।


९. दार्शनिक निष्कर्ष : पाटल में बसे प्राण


तलवा (पाटल) शरीर का निम्नतम भाग है, परन्तु वही सम्पूर्ण भार वहन करता है। जीवन में भी जो विनम्र है, वही समर्थ है।


चरण हमें सिखाते हैं—


* धरती से जुड़े रहो

* अहंकार त्यागो

* सेवा करो

* और प्राण–ऊर्जा को जागृत रखो


जब महावर से चरण रंजित होते हैं, तब जीवन में रंग, ताप, गंध, सुर और रस के घुँघरू खनकते हैं। यह शृंगार बाह्य नहीं—आन्तरिक चेतना का उत्सव है।


चरणों की महिमा केवल काव्य नहीं; वह वेद, पुराण और लोक–परम्परा से पुष्ट आध्यात्मिक विज्ञान है।


* पृथ्वी–स्पर्श में विनय है।

* चरण–स्पर्श में ऊर्जा–विनिमय है।

* महावर में शक्ति–स्मरण है।

* और चरण–सेवा में ईश्वर–तत्त्व का अनुभव है।


जब हम इन रहस्यों को समझकर जीवन में उतारते हैं, तब प्रत्येक पग साधना बन जाता है। हमारे पाँव यदि प्राण–युक्त हों, तो प्रत्येक यात्रा तीर्थ–यात्रा हो सकती है।



जब महावर से चरण रंजित होते,

भोर की लाली धरती पर सोते,

पलकों पर नव अरुणिम सपने,

प्राणों में गुप्त सलिल संजोते।


जब महावर से चरण रंजित होते…


रंग झरें जैसे अम्बर से,

ताप जगे जैसे दीप कलेवर से,

गंध उठे भीगी मिट्टी बन,

सुर फूटें अंतर्मन के स्वर से।


जब महावर से चरण रंजित होते…


रस के घुँघरू छन-छन बोले,

मन-मंदिर के द्वार ये खोले,

हर पग में उत्सव जागे,

हर आहट में ब्रह्म के टोले।


जब महावर से चरण रंजित होते,

जीवन के सब शोक विसर्जित होते,

धरा स्वयं आरती उतारे,

और नभ से आशीष बरसते होते।