भारत में बेरोज़गारी: समस्या केवल सरकार नहीं, मानसिकता भी है
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
भारत में बेरोज़गारी: समस्या केवल सरकार नहीं, मानसिकता भी है
"एक संरचनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विश्लेषण"
भारत में बेरोज़गारी पर चर्चा होते ही विमर्श प्रायः सरकार बनाम विपक्ष के द्वंद्व में सिमट जाता है। आंकड़े प्रस्तुत होते हैं, प्रतिवाद होते हैं, और निष्कर्ष राजनीतिक हो जाता है। परंतु बेरोज़गारी केवल नीति का प्रश्न नहीं—यह संरचना, संस्कृति और मानसिकता का भी प्रश्न है।
यह लेख इस जटिल समस्या को एक बहुस्तरीय दृष्टि से देखने का प्रयास है—आर्थिक संरचना, सामाजिक व्यवहार, मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति और शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में।
1. नवाचार का सामाजिक अवमूल्यन
भारत में जोखिम लेने वाले युवा के सामने पहली चुनौती बाज़ार नहीं—समाज होता है।
जब कोई युवा पारंपरिक नौकरी के स्थान पर स्टार्टअप, स्वतंत्र पेशा या नया प्रयोग चुनता है, तो उसका स्वागत प्रोत्साहन से अधिक संदेह से होता है।
* “ये भी कोई करियर है?”
* “पहले स्थायी नौकरी ले लो।”
* “सरकारी नौकरी छोड़कर यह क्यों?”
यह प्रतिक्रिया केवल भावनात्मक नहीं; यह सामाजिक संरचना का संकेत है।
## जोखिम-विरोधी संस्कृति (Risk-averse culture)
मनोविज्ञान में इसे “लॉस एवर्ज़न” (Loss Aversion) कहा जाता है—हानि का भय लाभ की संभावना से अधिक प्रभावी होता है।
भारत जैसे समाजों में जहाँ सामाजिक प्रतिष्ठा सामूहिक होती है, व्यक्तिगत असफलता परिवार की “प्रतिष्ठा” से जोड़ दी जाती है। परिणामस्वरूप युवा जोखिम लेने से बचता है।
नवाचार के लिए अनिश्चितता सहन करने की क्षमता चाहिए। यदि समाज अनिश्चितता को अस्वीकार करता है, तो नवाचार अवरुद्ध हो जाता है।
2. असफलता का अपराधीकरण
विकसित नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्थाओं में असफलता को सीखने की प्रक्रिया माना जाता है। भारत में असफलता को सामाजिक अपमान से जोड़ा जाता है—
* व्यापार में घाटा = “नाक कटना”
* नौकरी छूटना = “अयोग्यता”
* प्रतियोगी परीक्षा में असफलता = “भविष्य समाप्त”
## मनोवैज्ञानिक प्रभाव
1. सीखी हुई असहायता (Learned Helplessness)
2. सामाजिक तुलना (Social Comparison Stress)
3. जोखिम से स्थायी परहेज़
जब असफलता को सामाजिक दंड बना दिया जाए, तो उद्यमिता स्वाभाविक रूप से घटती है।
3. माता-पिता की “सुरक्षा मानसिकता”
हर परिवार अपने बच्चों के लिए स्थिर भविष्य चाहता है। यह स्वाभाविक है। परंतु भारत में “सुरक्षा” का अर्थ अत्यधिक संकुचित होकर “सरकारी नौकरी” तक सीमित हो गया है।
## इसके कारण
* नौकरी की स्थिरता
* पेंशन और सामाजिक सुरक्षा
* सामाजिक प्रतिष्ठा
* विवाह बाजार में मूल्य
परिणाम यह है कि लाखों युवा वर्षों तक एक ही प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगे रहते हैं, जबकि उनकी योग्यता विविध क्षेत्रों में उपयोग हो सकती थी। यहाँ समस्या अभिलाषा की नहीं, विकल्पों की संकीर्ण परिभाषा की है।
4. शिक्षा प्रणाली: कौशल बनाम डिग्री
भारत की औपचारिक शिक्षा अभी भी मुख्यतः परीक्षा-केंद्रित है।
## प्रमुख विशेषताएँ
* रटंत प्रणाली
* अंक-आधारित मूल्यांकन
* डिग्री-केंद्रित सफलता
* कौशल और उद्योग से सीमित जुड़ाव
परिणामस्वरूप शिक्षा का लक्ष्य “रोज़गार सृजन” नहीं, “नौकरी प्राप्ति” बन जाता है।
## कौशल अंतर (Skill Gap)
उद्योगों को जिन कौशलों की आवश्यकता है—
* समस्या समाधान
* डिजिटल दक्षता
* वित्तीय साक्षरता
* उद्यमिता
—वे अक्सर शिक्षा में पर्याप्त रूप से विकसित नहीं होते। इस अंतर के कारण बेरोज़गारी और “रोज़गार-अयोग्यता” (employability gap) समानांतर रूप से बढ़ती हैं।
5. रोजगार की परिभाषा में त्रुटि
भारत में एक बड़ी मानसिक बाधा है—
> सरकारी नौकरी = सम्मान
> निजी नौकरी = अस्थिर
> व्यापार = जोखिम
> स्वरोज़गार = मजबूरी
जब रोजगार की परिभाषा सीमित हो जाती है, तो अवसरों का दायरा भी सीमित हो जाता है। यदि 10 लाख लोग एक ही परीक्षा के पीछे दौड़ते हैं और सीटें 10,000 हैं, तो 9,90,000 लोग सांख्यिकीय रूप से “असफल” होंगे। यह असफलता बेरोज़गारी के रूप में दर्ज होती है, जबकि उनमें से कई अन्य क्षेत्रों में मूल्य सृजन कर सकते थे।
6. जनसंख्या: समस्या या संभावना?
भारत की बड़ी जनसंख्या को अक्सर बेरोज़गारी का प्रमुख कारण बताया जाता है। परंतु जनसंख्या अपने आप समस्या नहीं होती। यदि—
* कौशल विकास हो
* स्थानीय उद्योग मजबूत हों
* लघु और मध्यम उद्यम (MSME) सशक्त हों
* डिजिटल अर्थव्यवस्था समावेशी हो
तो वही जनसंख्या “डेमोग्राफिक डिविडेंड” बन सकती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब अवसरों की विविधता सीमित हो और आकांक्षाएँ एक ही दिशा में केंद्रित हों।
7. सरकार, समाज और व्यक्ति: त्रिकोणीय संबंध
यह कहना कि “सिर्फ सरकार दोषी है” अधूरा है। और यह कहना कि “सिर्फ समाज दोषी है” भी अधूरा है।
## सरकार की भूमिका
* नीति निर्माण
* औद्योगिक वातावरण
* कौशल कार्यक्रम
* नियमन सरल करना
## समाज की भूमिका
* जोखिम को स्वीकार करना
* असफलता को सामान्य बनाना
* सफलता की परिभाषा बदलना
## परिवार की भूमिका
* विकल्पों को खुला रखना
* बच्चों की मौलिक रुचि पहचानना
## युवा की भूमिका
* निरंतर कौशल उन्नयन
* वैकल्पिक अवसर तलाशना
* दीर्घकालिक दृष्टि अपनाना
यह चारों स्तर पर समन्वय का प्रश्न है।
8. समाधान: संरचनात्मक और सांस्कृतिक
(1) असफलता का सामान्यीकरण
स्कूल और कॉलेज स्तर पर “फेल-फास्ट, लर्न-फास्ट” मॉडल की समझ विकसित हो।
(2) उद्यमिता शिक्षा
वित्तीय साक्षरता, स्थानीय उद्योग प्रशिक्षण और डिजिटल व्यवसाय की शिक्षा प्रारंभिक स्तर से दी जाए।
(3) लघु व्यवसाय प्रक्रियाओं का सरलीकरण
पंजीकरण, कर व्यवस्था और अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए।
(4) सामाजिक सम्मान की पुनर्परिभाषा
सम्मान नौकरी से नहीं, योग्यता और ईमानदार श्रम से जुड़ा हो।
(5) स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त करना
ग्राम और कस्बा-स्तर पर उद्योग, कृषि-प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, डिजिटल सेवाएँ विकसित हों।
9. मानसिकता परिवर्तन: मूल प्रश्न
भारत अयोग्यता के कारण पीछे नहीं है। भारत अवसर-परिभाषा की संकीर्णता और जोखिम-भय के कारण सीमित है। स्थिरता आवश्यक है, परंतु प्रगति केवल स्थिरता से नहीं—साहस से आती है। जब तक सरकारी कुर्सी को ही सफलता का अंतिम प्रतीक माना जाएगा, तब तक लाखों सक्षम युवा “बेरोज़गार” कहलाते रहेंगे।
बेरोज़गारी केवल आर्थिक आँकड़ा नहीं; यह सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब भी है। समाधान बहुस्तरीय है—
* नीति सुधार
* शिक्षा सुधार
* सांस्कृतिक पुनर्परिभाषा
* और व्यक्तिगत साहस
अब प्रश्न यह नहीं कि दोषी कौन है। प्रश्न यह है— "क्या हम मानसिकता बदलने को तैयार हैं?"
