"होली" (रंगोत्सव) — वैदिक यज्ञ से लोकमंगल तक

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


"होली" (रंगोत्सव) — वैदिक यज्ञ से लोकमंगल तक

भारतीय सनातन परम्परा में कोई भी पर्व केवल सामाजिक उत्सव नहीं होता; वह समय, प्रकृति, मनुष्य और ब्रह्म के मध्य एक सूक्ष्म संवाद का अवसर होता है। "होली" भी ऐसा ही एक महापर्व है—जिसे सामान्यतः रंग, हास-परिहास और सामाजिक मेल-मिलाप का प्रतीक माना जाता है, परन्तु उसके मूल में एक गहन वैदिक-आध्यात्मिक संरचना विद्यमान है।

आज आवश्यकता है कि हम इस पर्व के बाह्य उल्लास के पीछे छिपे उसके वैदिक, पुराणिक और दार्शनिक आयामों को समझें—ताकि उत्सव मर्यादित हो, धर्माधिष्ठित हो और लोकमंगल का माध्यम बने।


1. वैदिक पृष्ठभूमि : यज्ञ-संस्कृति और महाव्रत


वैदिक सभ्यता का केन्द्रीय तत्त्व "यज्ञ" है। यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि देवता, प्रकृति और समाज के साथ संतुलित आदान-प्रदान की व्यवस्था है। ऋग्वेद में अग्नि को “ऋत्विज्” और “होता” कहा गया—वह देवताओं और मनुष्यों के बीच सेतु है। वैदिक यज्ञों में "सोमयज्ञ" सर्वोपरि माना गया। इसके तीन प्रमुख भेद बताए गए—


* एकाह (एक दिन का यज्ञ),

* अहीन (अनेक दिनों तक चलने वाला),

* सत्रयाग (दीर्घकालिक सामूहिक अनुष्ठान)।


सत्रयाग में “गवामयन” नामक एक वर्षव्यापी अनुष्ठान का उल्लेख ब्राह्मण-ग्रंथों में मिलता है। यह 360 दिनों तक चलता था और उसके अंतिम चरण को “महाव्रत” कहा गया।


महाव्रत का दिन केवल वैदिक विधि का समापन नहीं, बल्कि वर्षभर के तप, श्रम और अनुशासन के पश्चात् एक नियंत्रित, सांस्कृतिक मनोविनोद का अवसर भी था। शास्त्रों में वर्णित है कि उस दिन संगीत, विनोद, हर्ष-उल्लास और प्रतीकात्मक अभिनय होते थे। यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य उभरता है—"सनातन परम्परा में आनंद निषिद्ध नहीं है; वह धर्माधिष्ठित होना चाहिए।"


2. महाव्रत से होलिकोत्सव तक : अनुष्ठान का विकास


समय के साथ यज्ञ की दीर्घकालिक परम्पराएँ लोकजीवन में सरल रूप में अवतरित हुईं। होलिका-दहन की अग्नि को यदि हम यज्ञाग्नि का प्रतीक मानें तो यह परम्परा का स्वाभाविक विकास है।


(क) अग्नि का दार्शनिक अर्थ


अग्नि केवल भौतिक ज्वाला नहीं; वह—


* तप का प्रतीक है

* पाप-दहन का प्रतीक है

* संस्कार का प्रतीक है


होलिका-दहन में लकड़ियाँ, उपले, सूखी टहनियाँ इकट्ठी कर अग्नि प्रज्वलित की जाती है—यह केवल सामाजिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि "अन्तःकरण की अशुद्धियों को अग्नि में समर्पित करने का प्रतीकात्मक विधान" है।


(ख) नव-शस्येष्टि का समावेश


वसंत ऋतु के आगमन पर नई फसल का प्रथम अन्न अग्नि को अर्पित कर ग्रहण करने की परम्परा— "नव-शस्येष्टि" —भी इस पर्व में समाहित हो गई। यह कृषि-आधारित वैदिक संस्कृति का चिह्न है। इस प्रकार होली केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि—


* वैदिक यज्ञ परम्परा

* कृषि संस्कृति

* ऋतु परिवर्तन

* और सामाजिक पुनर्संयोजन


—इन सबका समन्वित संस्कार है।


3. पुराणिक आयाम : प्रह्लाद और होलिका


प्रह्लाद की कथा और होलिका का आख्यान इस पर्व को भक्ति और धर्म-निष्ठा का आयाम प्रदान करता है।।हिरण्यकशिपु का अहंकार और प्रह्लाद की अटूट भक्ति—यह संघर्ष केवल पिता-पुत्र का नहीं, बल्कि अधर्म और धर्म का है। होलिका अग्नि में भस्म होती है, परन्तु प्रह्लाद बच जाते हैं। यह कथा प्रतीक है—


* अहंकार का दहन

* भक्ति की विजय

* दैवी संरक्षण का आश्वासन


अतः होली का अग्निकर्म केवल ऋतु का संस्कार नहीं, बल्कि आन्तरिक दुराग्रहों और अहंकार का परित्याग है।


4. वसंतोत्सव और रास-परम्परा


कृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़कर होली को रसात्मक आयाम मिला। वृन्दावन और बरसाना की लठमार होली केवल हास्य नहीं, बल्कि रसमय भक्ति का उत्स है। यहाँ रंग केवल रंग नहीं—


* वह प्रेम का प्रतीक है

* आत्मा और परमात्मा के मिलन का संकेत है

* अद्वैत की अनुभूति का सौन्दर्य है


वसंत ऋतु स्वयं प्रकृति का श्रृंगार है। शास्त्रों में वसंत को “ऋतुराज” कहा गया है। इस ऋतु में काम-भाव की स्वाभाविक जागृति होती है। सनातन परम्परा ने इसे दमन नहीं किया, बल्कि "धर्म के अनुशासन में रूपान्तरित किया"।


5. पुरुषार्थ-चतुष्टय और होली


सनातन दर्शन में जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए—


1. धर्म

2. अर्थ

3. काम

4. मोक्ष


होली का पर्व विशेषतः “काम” पुरुषार्थ को धर्माधिष्ठित करने का अवसर देता है। यहाँ काम का अर्थ केवल इन्द्रियसुख नहीं; बल्कि सौन्दर्य-बोध, सृजन, प्रेम और जीवन-रस है।


जब हास-परिहास मर्यादा में हो, व्यंग्य विनोद सामाजिक कटुता को दूर करे, और रंग-उल्लास किसी की गरिमा भंग न करे—तभी काम पुरुषार्थ धर्म के अधीन होकर लोकमंगल का साधन बनता है।


6. हास-परिहास की सांस्कृतिक भूमिका


महाव्रत के दिन ऋत्विजों द्वारा किया गया विनोद केवल मनोरंजन नहीं था; वह सामाजिक तनाव-निवारण का साधन था। भारतीय समाज में वर्ष भर के सामाजिक अनुशासन के बाद एक दिन ऐसा हो, जब लोग औपचारिकताओं से मुक्त होकर—


* हँस सकें

* गा सकें

* परिहास कर सकें


—यह सामूहिक मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक था। किन्तु यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं थी। शास्त्र मर्यादा का आग्रह करते हैं।


7. अग्नि, रंग और आध्यात्मिक प्रतीक


(क) अग्नि — तप और शुद्धि


(ख) रंग — विविधता में एकता


(ग) अबीर-गुलाल — पंचतत्त्व का उत्सव


प्रकृति में रंगों का विस्फोट इस तथ्य का प्रतीक है कि ब्रह्म एक होते हुए भी अनेक रूपों में प्रकट होता है। अद्वैत का यह बहुरूपत्व ही संसार है।


8. सामाजिक समरसता और लोकव्यवस्था


होली का एक बड़ा आयाम सामाजिक है।


* जाति-भेद का क्षय

* वर्ग-अंतर का क्षणिक लोप

* सामूहिक भोज

* गले मिलना


यह सब “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अनुभूति को सजीव करता है। परन्तु यह भी स्मरणीय है कि समरसता केवल एक दिन का अभिनय न बने; वह जीवन-दृष्टि बने।


9. आधुनिक सन्दर्भ में होली


आज होली कई स्थानों पर—


* मद्यपान

* अश्लीलता

* प्रदूषण

* हिंसा


—से दूषित हो जाती है।


यह सनातन परम्परा का विकृतिकरण है।


यदि होली यज्ञ है, तो—


* नशा उसकी आहुति नहीं हो सकता

* अपमान उसका विनोद नहीं हो सकता

* पर्यावरण-हानि उसका उत्सव नहीं हो सकता


हमें चाहिए—


* प्राकृतिक रंगों का प्रयोग

* जल-संरक्षण

* मर्यादित हास-परिहास

* और अग्नि-दहन में वृक्ष-रक्षा का ध्यान


10. दार्शनिक निष्कर्ष : होली एक आन्तरिक साधना


होली केवल बाहर की अग्नि नहीं, भीतर की ज्वाला है।


जब हम—


* अपने अहंकार को जलाते हैं

* द्वेष को त्यागते हैं

* और प्रेम के रंग में रँगते हैं


—तभी होली पूर्ण होती है।


* अग्नि में समर्पण का अर्थ है—“इदं न मम”।

* रंग में भीगने का अर्थ है—“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”।


होली का मूल स्वरूप वैदिक है, उसका विस्तार पुराणिक है, उसका सौन्दर्य भक्ति-परम्परा में है और उसका लक्ष्य सामाजिक समरसता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि—


* धर्म केवल अनुष्ठान नहीं

* आनंद केवल उच्छृंखलता नहीं

* और उत्सव केवल प्रदर्शन नहीं


होली एक संस्कार है— यज्ञ से लोक तक, तप से प्रेम तक, और अग्नि से रंग तक की यात्रा।


आइए हम इस वर्ष होली को— यज्ञ की पवित्रता, भक्ति की सरलता, और सामाजिक समरसता के साथ—मनाएँ। तभी यह महापर्व वास्तव में सनातन धर्म की गरिमा के अनुरूप होगा।