क्या मुख्यमंत्री अदालत से ऊपर हैं?
लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla
क्या मुख्यमंत्री अदालत से ऊपर हैं?
सर्वोच्च न्यायालय ने शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022) में हेट स्पीच को लेकर कोई अस्पष्ट या प्रतीकात्मक निर्देश नहीं दिए थे। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश बिना किसी शिकायत का इंतज़ार किए स्वतः संज्ञान लें, और तत्कालीन आईपीसी की धाराओं 153A, 153B, 295A और 505 के तहत प्राथमिकी दर्ज करें। कोर्ट ने यह भी चेताया था कि नफ़रत भरे भाषणों पर पुलिस की निष्क्रियता या हिचकिचाहट कर्तव्य की गंभीर लापरवाही मानी जाएगी।
सवाल सीधा है: "क्या असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा इस आदेश से ऊपर हैं?" या फिर भारत का संविधान और सर्वोच्च न्यायालय अब केवल उन पर लागू होता है जो सत्ता से बाहर हैं?
संवैधानिक शपथ की मर्यादा को तो हिमंता बिस्वा सरमा लंबे समय से सार्वजनिक मंचों पर रौंदते आ रहे हैं। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध उनकी भाषा अब ‘राजनीतिक बयान’ नहीं, बल्कि निरंतर उकसावे की रणनीति बन चुकी है। लेकिन अब मामला केवल भाषणों का नहीं रहा—अब दृश्य भी सामने हैं।
7 फरवरी को भारतीय जनता पार्टी की असम इकाई ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ अकाउंट से एक वीडियो पोस्ट किया। एक दिन बाद वीडियो हटा लिया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वीडियो में मुख्यमंत्री के हाथ में बंदूक है, सामने मुसलमान दिखने वाले लोग हैं, और साथ में ‘पॉइंट ब्लैंक शॉट’ तथा ‘कोई दया नहीं’ जैसे वाक्य। यह कोई रूपक नहीं है। यह कोई ‘क्रिएटिव कंटेंट’ नहीं है। यह सीधे-सीधे नरसंहार के लिए उकसाने वाली दृश्य भाषा है।
यहाँ प्रश्न विपक्ष के विरोध का नहीं है—वह तो अपेक्षित है। प्रश्न यह है कि जिनके पास कार्रवाई की संवैधानिक शक्ति है, वे चुप क्यों हैं? केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय, राष्ट्रपति, चुनाव आयोग—सब मौन हैं। यह मौन सामान्य नहीं है, यह सहमति का मौन है।
हिमंता बिस्वा सरमा का यह दुस्साहस अचानक नहीं आया। यह उस राजनीतिक अनुभव से पैदा हुआ है जिसे 2002 के गुजरात ने जन्म दिया था—जहाँ अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफ़रत और हिंसा का माहौल बना, लेकिन सत्ता पर बैठे लोग दंडित नहीं हुए, बल्कि पदोन्नत किए गए। तब सवाल उठा था कि क्या भारत नाज़ी जर्मनी की राह पर जा रहा है। तब यह सवाल एक राज्य तक सीमित था। आज यह पूरे देश में फैल चुका है।
असम में जो हो रहा है, वह केवल असम का मामला नहीं है—यह एक प्रयोगशाला है। अगर यह प्रयोग सफल हुआ, तो यही मॉडल देश के दूसरे हिस्सों में भी दोहराया जाएगा। यही वजह है कि यह चुप्पी डरावनी है।
राष्ट्रपति महोदया से भी किसी हस्तक्षेप की उम्मीद रखना अब निरर्थक है। मणिपुर पर उनकी चुप्पी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि उनका संवैधानिक दायित्व अब औपचारिक आयोजनों और दही-चीनी तक सीमित रह गया है। चुनाव आयोग का रिकॉर्ड भी सामने है—2024 के चुनाव में प्रधानमंत्री द्वारा मुसलमानों पर खुलेआम “ज़्यादा बच्चे” वाला तंज, झारखंड में ‘घुसपैठिया’ नैरेटिव पर बने वीडियो—सब कुछ आयोग की आँखों के सामने हुआ, और आयोग ने कुछ नहीं किया।
अब केवल एक संस्था बचती है—सर्वोच्च न्यायालय। लेकिन विडंबना यह है कि अदालत को इस बार किसी और के आदेश को नहीं, अपने ही 2022 के निर्देश को याद करने की ज़रूरत है। यदि इस मामले में अदालत स्वतः संज्ञान लेती है, तो यह देश, संविधान और लोकतंत्र—तीनों के लिए जीवनरेखा होगी। यदि नहीं, तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि भारत में हेट स्पीच अब अपराध नहीं, राज्य-प्रायोजित राजनीतिक उपकरण बन चुकी है।
यह भी याद रखना चाहिए कि हिमंता बिस्वा सरमा का यह पहला मामला नहीं है। डिगबोई में उनका बयान—“मियां मुसलमानों को किसी भी तरीके से परेशान करो, वे असम छोड़ देंगे”—खुले तौर पर सामूहिक दमन का आह्वान था। तब भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
जब दंड नहीं मिलता, तो भाषा और हिंसक होती जाती है। आज भाषण से आगे बढ़कर हथियारों के दृश्य दिखाए जा रहे हैं।
नफ़रत का यह उभार केवल अल्पसंख्यकों की समस्या नहीं है। यह हर नागरिक के लिए ख़तरा है। क्योंकि नफ़रत से सत्ता को लाभ मिल सकता है, लेकिन समाज को केवल असुरक्षा, बेरोज़गारी, भय और विघटन मिलता है। सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ ऑन हेट की रिपोर्ट बताती है कि 2025 में देश में 1,318 हेट स्पीच की घटनाएँ दर्ज हुईं—2024 से 13 प्रतिशत अधिक, और 2023 के मुकाबले लगभग दोगुनी। नफ़रत अब चुनावी मौसम की भाषा नहीं रही—यह स्थायी राजनीतिक रणनीति बन चुकी है।
बीबीसी की एक चर्चा में हर्ष मंदर ने कहा था, “नाज़ी जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार गैस चैंबर से नहीं, नफ़रती भाषण से शुरू हुआ था।”
सवाल अब अलंकारिक नहीं रह गया है। क्या सत्ता में बने रहने के लिए भारत में भी वही रास्ता तैयार किया जा रहा है? और अगर आज अदालत, संविधान और समाज चुप रहे—तो कल इतिहास पूछेगा: "जब नफ़रत अपराध बननी चाहिए थी, तब तुम कहाँ थे?"
