शोर से सत्ता तक: जब कूटनीति स्मृति खो दे
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
शोर से सत्ता तक: जब कूटनीति स्मृति खो दे
2014 के बाद भारत में जो घटित हुआ, वह सत्ता परिवर्तन नहीं था—वह लोकतंत्र की भाषा का प्रतिस्थापन था। संवाद को शोर से, नीति को प्रचार से और संस्थाओं को एक व्यक्ति की छवि से बदल दिया गया। यह महज़ शासन शैली का बदलाव नहीं, बल्कि राज्य-बुद्धि का क्षरण था।
जिस लोकतंत्र में सवाल पूछना राष्ट्र-विरोध कहलाने लगे, वहाँ विदेश नीति भी विवेक से नहीं, भीड़ की तालियों से संचालित होने लगती है। यही वह बिंदु है जहाँ भारत की कूटनीति ने संतुलन नहीं, प्रदर्शन को चुना।
कूटनीति स्मृति माँगती है। लेकिन शोर को स्मृति की ज़रूरत नहीं होती—उसे केवल वर्तमान चाहिए, कैमरा चाहिए, नारा चाहिए।
भारत की परंपरागत विदेश नीति स्मृति पर टिकी थी: गुटनिरपेक्षता, रणनीतिक स्वायत्तता, और यह समझ कि राष्ट्र संबंध भावनाओं से नहीं, हितों और भरोसे से चलते हैं। 2014 के बाद इस समझ को “पुरानी सोच” कहकर हटा दिया गया।
रूस इसका सबसे असहज उदाहरण है। 1971 में, जब अमेरिका और पश्चिमी ताक़तें पाकिस्तान के साथ खड़ी थीं, तब सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र में भारत के लिए वीटो लगाया। यह कोई नैरेटिव नहीं, कूटनीतिक इतिहास का पत्थर पर लिखा तथ्य है। लेकिन शोर के युग में इतिहास बोझ बन जाता है—क्योंकि वह आज की सेल्फ़ी में फ़िट नहीं बैठता।
इसके बरक्स, भारत की विदेश नीति को डोनाल्ड ट्रंप जैसे चरित्र के साथ व्यक्तिगत निकटता में उलझा दिया गया। यह निकटता रणनीतिक नहीं, नाटकीय थी। नवंबर 2020 में ट्रंप की हार और 6 जनवरी 2021 को अमेरिकी संसद पर हमला—ये घटनाएँ किसी भी लोकतांत्रिक नेतृत्व के लिए स्पष्ट संकेत थीं। यह समय था संस्थानों के पक्ष में खड़े होने का। लेकिन भारत की चुप्पी महज़ कूटनीतिक सावधानी नहीं थी—वह लोकतांत्रिक असमंजस थी।
कूटनीति में व्यक्ति आते-जाते रहते हैं, संस्थान टिके रहते हैं। लेकिन जब विदेश नीति को व्यक्ति-केन्द्रित कर दिया जाता है, तब राष्ट्र भी एक इवेंट बन जाता है—आज ह्यूस्टन, कल अहमदाबाद, परसों कहीं और। इसे कूटनीति नहीं कहते, इसे सेल्फी-डिप्लोमेसी कहते हैं।
आज वही नीति हमें वैश्विक ऊर्जा राजनीति में असहज स्थिति में ले आई है। रूसी तेल चीन की ओर मोड़ा जा रहा है। यह बाज़ार का स्वाभाविक खेल नहीं है—यह संकेतों की राजनीति है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी संकेत आकस्मिक नहीं होता। चुप्पी भी बोलती है, और गलत जगह खड़ा होना सबसे तेज़ बोलता है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि मोदी सरकार सफल है या असफल।
सवाल यह है कि हमने सत्ता को परखने की भाषा बदल दी है।
हमने शोर को नेतृत्व मान लिया, आक्रामकता को नीति, और संस्थागत विनम्रता को कमजोरी।
यह किसी पार्टी-विरोध का लेख नहीं है। यह उस लोकतंत्र की चेतावनी है जो यह भूल रहा है कि उसकी ताक़त सेनाओं या अर्थव्यवस्था से पहले संस्थागत विवेक में होती है। जब विवेक को ‘एलिटिज़्म’ और स्मृति को ‘नॉस्टैल्जिया’ कहा जाने लगे, तब राज्य धीरे-धीरे राष्ट्र नहीं, प्रदर्शन-स्थल बन जाता है।
और इतिहास गवाह है— "जो लोकतंत्र शोर को नीति बना लेते हैं, वे अंततः दुनिया में सुने नहीं जाते, सिर्फ़ देखे जाते हैं।"
