GDP का शोर, आमदनी की ख़ामोशी

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


GDP का शोर, आमदनी की ख़ामोशी

"भारत की उभरती महाशक्ति—या वैश्विक असंतुलन का नया अध्याय?"

भारत के लिए 2026 एक प्रतीकात्मक वर्ष बनने जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थान बता रहे हैं कि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा—$4 ट्रिलियन GDP के साथ। वैश्विक मंचों पर तालियाँ बजेंगी, निवेश सम्मेलनों में भारत “स्टोरी ऑफ़ द डिकेड” कहलाएगा और कूटनीति में यह उपलब्धि एक नए आत्मविश्वास की मुद्रा बनेगी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र में एक पुराना नियम है— बड़ा होना और समृद्ध होना, एक ही चीज़ नहीं हैं। भारत का मामला इसी मूलभूत अंतर को उजागर करता है।

## आंकड़ों की चकाचौंध बनाम नागरिक की हक़ीक़त

अगर GDP आकार ही विकास का अंतिम पैमाना होता, तो जर्मनी, जापान और अमेरिका के बाद भारत को वैश्विक समृद्धि का केंद्र मान लिया जाता। लेकिन जैसे ही विश्लेषण per capita income पर आता है, यह कहानी ढहने लगती है। जर्मनी की प्रति व्यक्ति आय भारत से लगभग 21 गुना, जापान की 12 गुना, अमेरिका की 32 गुना, और चीन की भी 5 गुना है।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से इसका अर्थ साफ़ है—भारत एक large economy बन रहा है, लेकिन rich society बनने से अभी बहुत दूर है। यह वही अंतर है जिसे वैश्विक अर्थशास्त्र में कहा जाता है—Scale without welfare.

## उभरती महाशक्ति या सस्ता बाज़ार?

वैश्विक पूंजी भारत को किस नज़र से देखती है? उत्तर असहज है—एक विशाल उपभोक्ता बाज़ार, न कि उच्च-आय वाला समाज। भारत की अर्थव्यवस्था आज निर्यात-आधारित चमत्कार नहीं है, जैसे कभी पूर्वी एशिया था। यह एक consumption-driven model है, जहाँ घरेलू उपभोग GDP का 60% से अधिक है।

अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए यह आकर्षक है— क्योंकि कम आय + बड़ी आबादी = भविष्य की खपत। लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह एक चेतावनी भी है। यदि खपत उत्पादक नौकरियों, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, और वास्तविक वेतन वृद्धि के बिना बढ़ती है, तो यह मॉडल स्थिर नहीं रहता।

लैटिन अमेरिका इसका उदाहरण है— जहाँ GDP बढ़ी, मिडिल क्लास बनी, लेकिन औद्योगिक आधार कमजोर रहा। नतीजा: ऋण, असमानता और सामाजिक असंतोष।

## भारत का ख़तरा: कर्ज़ पर टिकी आकांक्षाएँ

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से सबसे बड़ा जोखिम यह है कि भारत का उपभोग आय से नहीं, कर्ज़ से संचालित हो जाए। अगर EMI संस्कृति, क्रेडिट कार्ड और अनौपचारिक कर्ज़ वास्तविक आय वृद्धि से तेज़ बढ़े—तो यह “consumption boom” नहीं, debt-driven illusion बन जाएगा। इसका सामाजिक परिणाम होगा—

 बढ़ती असमानता

 असुरक्षित मध्यम वर्ग

 और आर्थिक तनाव का राजनीतिक रूपांतरण

इतिहास गवाह है—जब आकांक्षाएँ बढ़ती हैं और आय ठहर जाती है, तो लोकतंत्र अस्थिर होता है।

## वैश्विक तुलना: चीन से भारत क्यों अलग है

चीन ने GDP बढ़ाने से पहले औद्योगिक रोज़गार, निर्यात क्षमता और शहरी मजदूरी पर काम किया। भारत ने उल्टा रास्ता चुना—पहले बाज़ार, बाद में उत्पादन। अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र इसे premature consumption economy कहता है। यह मॉडल अल्पकाल में तेज़ वृद्धि दिखाता है, लेकिन दीर्घकाल में सामाजिक तनाव पैदा करता है।

## असली कसौटी: रैंकिंग नहीं, जीवन स्तर

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की असली परीक्षा GDP रैंकिंग नहीं होगी। परीक्षा होगी—

 क्या औसत भारतीय की आय तेज़ी से बढ़ती है?

 क्या रोज़गार सुरक्षित और उत्पादक हैं?

क्या स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा GDP के साथ बढ़ते हैं?

यदि इन सवालों का जवाब “नहीं” रहा, तो $4 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था भी केवल आंकड़ों की महाशक्ति होगी, मानव विकास की नहीं।

## शोर बनाम समृद्धि

GDP का शोर अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियाँ बना सकता है। लेकिन वैश्विक इतिहास एक बात साफ़ कहता है—महाशक्ति वही होती है, जिसका नागरिक सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर हो।

अगर भारत को सच में 21वीं सदी की शक्ति बनना है, तो उसे चार्ट में नहीं, जीवन स्तर में छलांग लगानी होगी। वरना दुनिया यह कहेगी—भारत बड़ा ज़रूर हुआ, लेकिन अपने लोगों को अमीर बनाना भूल गया।