माघ मेला : क्या होता है कल्पवास?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


माघ मेला : क्या होता है कल्पवास?

कल्पवास कोई साधारण धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन जीवन-दृष्टि का सघन साधना-पथ है। यह उस संस्कृति का जीवित अवशेष है जहाँ धर्म कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति था; जहाँ तीर्थ यात्रा पर्यटन नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन की प्रक्रिया थी; और जहाँ व्रत-उपवास शरीर-शोषण नहीं, बल्कि चित्त-शुद्धि का विज्ञान था।

प्रयागराज के माघ मेले और कुम्भ परम्परा में कल्पवास का जो स्थान है, वह उसे एक साधारण मेला न रहने देकर चलता-फिरता आध्यात्मिक विश्वविद्यालय बना देता है।

## कल्पवास : शब्दार्थ और तात्त्विक अर्थ

‘कल्पवास’ दो शब्दों से मिलकर बना है—

 कल्प – जिसका अर्थ है विधान, मर्यादा, नियत साधना-काल

 वास – अर्थात निवास, ठहराव, स्थायित्व

अर्थात— नियत नियमों के साथ, नियत काल तक, पवित्र क्षेत्र में निवास करते हुए आत्म-साधना करना ही कल्पवास है। शास्त्रीय दृष्टि से कल्पवास केवल ‘संगम तट पर रहना’ नहीं है, बल्कि—

 इन्द्रियों का संयम

आहार का शोधन

 विचारों की शुद्धि

और जीवन-गति का धीमा होकर आत्मा की ओर मुड़ जाना

इसका मूल उद्देश्य है— गृहस्थ जीवन की गति को रोककर, कुछ समय के लिए ऋषि-जीवन का अभ्यास करना।

## कल्पवास : वेदकालीन अरण्य-संस्कृति की निरन्तरता

कल्पवास की जड़ें वेदकालीन अरण्य-संस्कृति में हैं। वेदों में स्पष्ट कहा गया है—“अरण्यं वा एष आत्मानं विजानाति।” — (ऐतरेय आरण्यक) अर्थात मनुष्य अरण्य में ही आत्मा को पहचानता है।

जब प्रयाग में न नगर था, न बाजार, न सत्ता— तब यह क्षेत्र केवल ऋषियों की तपोभूमि था। गंगा–यमुना–सरस्वती का संगम केवल जल-संगम नहीं, बल्कि

 ज्ञान (सरस्वती)

 कर्म (यमुना)

और भक्ति/प्रवाह (गंगा)

का त्रिवेणी-संयोग था

ऋषियों ने अनुभव किया कि—

 निरन्तर गृहस्थ जीवन में रहने वाला व्यक्ति

 न तो शास्त्र का मर्म समझ पाता है

 न आत्मचिन्तन के लिए समय निकाल पाता है

इसलिए उन्होंने गृहस्थों के लिए अल्पकालिक संन्यास जैसा विधान रचा— यही था कल्पवास।

## कल्पवास क्यों? — इसका दार्शनिक प्रयोजन

सनातन धर्म मनुष्य के जीवन को चार आश्रमों में विभाजित करता है—

1. ब्रह्मचर्य

2. गृहस्थ

3. वानप्रस्थ

4. संन्यास

परन्तु कल्पवास इन चारों का सेतु है।

 यह गृहस्थ को ब्रह्मचर्य की स्मृति दिलाता है

 वानप्रस्थ की ओर मानसिक तैयारी कराता है

 और संन्यास के मूल्य को जीवन में उतारने का अभ्यास कराता है

कल्पवास का उद्देश्य संसार से भागना नहीं, संसार में रहते हुए आसक्ति को ढीला करना है।

## कल्पवास का काल : माघ मास का रहस्य

कल्पवास का समय—

 पौष शुक्ल एकादशी (या पौष 11) से

माघ शुक्ल द्वादशी तक माना गया है

  (कुछ साधक पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक करते हैं)

माघ मास को शास्त्रों में विशेष महत्त्व प्राप्त है—

“माघे स्नानं दानं च यत् किञ्चित् क्रियते नरैः।

तदक्षयं भवेत् सर्वं इह लोके परत्र च॥”

माघ में किया गया स्नान, दान और तप अक्षय फल देता है। यह वह काल है जब—

 सूर्य उत्तरायण में होता है

 प्रकृति में सात्त्विकता बढ़ती है

और शरीर–मन साधना के लिए अनुकूल हो जाते हैं

## कल्पवास के नियम : अनुशासन ही साधना है

शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि कल्पवास बिना नियम के सम्भव नहीं। पद्मपुराण में कहा गया है—

“संगमे वसतो नित्यं शान्तचित्तस्य संयतः।

जितेन्द्रियस्य धर्मज्ञः कल्पवासः फलं ददाति॥”

अर्थात संगम तट पर वही व्यक्ति कल्पवास का फल पाता है जो—

 शान्त चित्त वाला हो

जितेन्द्रिय हो

 धर्मज्ञ और संयमी हो

## मुख्य नियम

1. पर्णकुटी में निवास – तामसिक सुविधा का त्याग, प्रकृति के निकट जीवन

2. एक समय भोजन – आहार की मात्रा नहीं, चेतना का शोधन उद्देश्य

3. ब्रह्मचर्य और अहिंसा – विचार, वाणी और कर्म तीनों में

4. साधना-त्रयी

    तप – शरीर और मन का अनुशासन

    होम – यज्ञ द्वारा अहंकार की आहुति

    दान – संग्रह से मुक्त होने का अभ्यास

## कल्पवासी की दिनचर्या : एक लघु आश्रम-जीवन

कल्पवासी का दिन—

 ब्रह्ममुहूर्त में गंगा-स्नान से आरम्भ होता है

संध्यावन्दन, जप, स्वाध्याय, प्रवचन श्रवण चलता है

 सायंकाल भजन-कीर्तन और सत्संग

 और रात्रि आत्मचिन्तन के साथ समाप्त होती है

यह दिनचर्या मनुष्य को समय की गुलामी से मुक्त करती है। घड़ी नहीं, सूर्य और साधना जीवन को चलाते हैं।

## कल्पवास के फल : भौतिक नहीं, आध्यात्मिक

लोक-परम्परा कहती है— जो कल्पवास करता है, वह अगले जन्म में राजा होता है। परन्तु शास्त्र इससे आगे जाते हैं। मत्स्यपुराण (106/40) में कहा गया है—

“मोक्षार्थं यो वसेन्मर्त्यः कल्पवासं समाचरेत्।

न पुनर्जन्म तस्यास्ति सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥”

अर्थात— जो मोक्ष की अभिलाषा से कल्पवास करता है, उसे पुनर्जन्म नहीं मिलता। यहाँ राजा होना प्रतीक है—इन्द्रियों पर राज्य करने का।

## कल्पवास : रोग और शोक का क्षय

कल्पवास के विषय में लोकमान्यता है— “कल्पवास करने वालों का संपूर्ण रोग और शोक मिट जाता है।”

यह कथन केवल चमत्कार नहीं, बल्कि मनोदैहिक (psychosomatic) सत्य है—

 सात्त्विक आहा नियमित स्नान

 जप–ध्यान

 तनावमुक्त जीवन

 सामूहिक आध्यात्मिक वातावरण

इन सबका परिणाम—

 मन का हल्का होन

 शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का बढ़ना

और जीवन के प्रति दृष्टिकोण का बदल जाना

## दार्शनिक निष्कर्ष : कल्पवास आज भी क्यों प्रासंगिक है

आज का मनुष्य—

 सुविधा में जीता है 

पर शान्ति से वंचित है

 जानकारी से भरा है

 पर विवेक से रिक्त है

ऐसे समय में कल्पवास—

 डिजिटल डिटॉक्स से भी गहरा

 माइंडफुलनेस से भी व्यापक

 और योग-रिट्रीट से कहीं अधिक सम्पूर्ण है

कल्पवास सिखाता है— कम में जीना, मौन में सुनना, और भीतर उतरकर स्वयं को पाना।

कल्पवास अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य की आवश्यकता है। यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि भारतीय आत्मा की प्रयोगशाला है। जो कुछ समय के लिए संगम तट पर स्वयं से मिलता है—वह जीवन भर के लिए अपने भीतर के प्रयाग को पहचान लेता है।

॥ स्वस्ति। शुभम्। मंगलम्। ॥