वेनेज़ुएला प्रकरण: शक्ति, संप्रभुता और पेट्रोडॉलर—इक्कीसवीं सदी की वैश्विक परीक्षा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

वेनेज़ुएला प्रकरण: शक्ति, संप्रभुता और पेट्रोडॉलर—इक्कीसवीं सदी की वैश्विक परीक्षा

वेनेज़ुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को लेकर सामने आए किडनैप/बलपूर्वक हटाने के दावों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ सवाल किसी एक देश का नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था का है। यदि किसी महाशक्ति को यह अधिकार मिल जाए कि वह संप्रभु देशों में सैन्य हस्तक्षेप करे और नेतृत्व को बलपूर्वक हटाने का दावा करे—तो फिर UN चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय कूटनीति की प्रासंगिकता क्या रह जाती है?

यह विश्लेषण आरोपों और प्रतिक्रियाओं के अंतरराष्ट्रीय, भूराजनीतिक, कूटनीतिक और वैश्विक व्यापारिक निहितार्थों का विश्लेषण करता है—नारेबाज़ी से नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन की ठंडी समझ से।

## राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: ‘लोकतंत्र’ का औज़ार और ‘शक्ति’ का प्रयोग

अमेरिकी विदेश नीति का एक स्थायी पैटर्न रहा है—मूल्य-आधारित भाषा (लोकतंत्र, मानवाधिकार, आतंकवाद-रोधी) और हित-आधारित कार्रवाई (संसाधन, भुगतान प्रणालियाँ, भू-रणनीतिक नियंत्रण)। इराक और लीबिया के अनुभव बताते हैं कि जब ये दोनों टकराते हैं, तो हित प्राथमिकता बनते हैं।

वेनेज़ुएला के मामले में भी यही द्वंद्व दिखता है। आलोचक कहते हैं कि लोकतंत्र का तर्क चयनात्मक है—क्योंकि वैश्विक राजनीति में ऐसे कई सहयोगी हैं जिनकी आंतरिक व्यवस्थाएँ लोकतांत्रिक कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं, फिर भी उन्हें संरक्षण मिलता है। इससे वैश्विक नैतिकता की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है।

## भूराजनीति: पेट्रोडॉलर, डी-डॉलराइजेशन और शक्ति-संतुलन

इस संकट की धुरी ऊर्जा और मुद्रा है। 1970 के दशक से चली पेट्रोडॉलर व्यवस्था ने डॉलर को वैश्विक ऊर्जा व्यापार का केंद्र बनाया। इसके कारण अमेरिका को वित्तीय लाभ और रणनीतिक बढ़त मिली। लेकिन पिछले दशक में डी-डॉलराइजेशन की प्रवृत्तियाँ तेज़ हुई हैं—रूस, चीन, ईरान और BRICS ढाँचे के भीतर गैर-डॉलर सेटलमेंट, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियाँ (CIPS, mBridge) और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार।

वेनेज़ुएला—दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडारों में से एक—यदि डॉलर से बाहर तेल व्यापार करता है और BRICS जैसे मंचों से जुड़ता है, तो यह मुद्रा-भूराजनीति में बड़ा संकेत बनता है। यही कारण है कि कई विश्लेषक इस टकराव को संसाधन नियंत्रण बनाम भुगतान प्रभुत्व की लड़ाई के रूप में देखते हैं।

## कूटनीति: बहुपक्षीय व्यवस्था की साख

संयुक्त राष्ट्र, चीन, रूस, ईरान, लैटिन अमेरिकी समूहों और कुछ यूरोपीय प्रतिक्रियाओं में एक साझा स्वर दिखता है—संप्रभुता का सम्मान, सैन्य संयम और राजनीतिक संवाद। यह संकट UN की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है: क्या सुरक्षा परिषद प्रभावी मध्यस्थ बन पाएगी, या फिर वीटो-राजनीति उसे पंगु बनाए रखेगी?

यदि आरोपित कार्रवाइयों पर निष्पक्ष, पारदर्शी अंतरराष्ट्रीय जाँच नहीं होती, तो यह एक खतरनाक मिसाल बनेगी—कि शक्ति के आगे कानून गौण है। इससे छोटे और मध्यम देशों में असुरक्षा बढ़ेगी और गठबंधन-राजनीति कठोर होगी।

## वैश्विक व्यापार: ऊर्जा, निवेश और आपूर्ति शृंखलाएँ

व्यापारिक दृष्टि से यह संकट तीन स्तरों पर असर डालता है:

1. ऊर्जा बाज़ार: आपूर्ति बाधित होने की आशंका से कीमतों में अस्थिरता।

2. निवेश जोखिम : संसाधन-समृद्ध देशों में राष्ट्रीयकरण बनाम विदेशी निवेश का तनाव बढ़ता है; निवेशक जोखिम प्रीमियम बढ़ाते हैं।

3. भुगतान प्रणालियाँ : गैर-डॉलर सेटलमेंट पर काम कर रहे देशों के लिए यह चेतावनी और प्रेरणा—दोनों—बनती है; परिणामस्वरूप वैकल्पिक प्रणालियाँ तेज़ी से अपनाई जा सकती हैं।

लंबी अवधि में, यदि व्यापार और ऊर्जा लेन-देन बहु-मुद्रा हो जाते हैं, तो वैश्विक वित्त अधिक बहुध्रुवीय होगा—जिसमें डॉलर का वर्चस्व घटेगा, पर अस्थिरता भी बढ़ सकती है।

## भारत का स्थान: रणनीतिक स्वायत्तता की कसौटी

भारत के लिए यह क्षण रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा है। भारत के वेनेज़ुएला से ऐतिहासिक संबंध, सीमित परंतु महत्वपूर्ण ऊर्जा निवेश, और प्रवासी हित हैं। आर्थिक निर्भरता कम होने के बावजूद, नैतिक और कूटनीतिक दांव बड़े हैं।

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भारत यदि अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और संवाद के सिद्धांतों पर संतुलित, स्पष्ट रुख अपनाता है, तो उसकी वैश्विक साख मज़बूत होगी—खासकर ग्लोबल साउथ में। चुप्पी या अस्पष्टता अल्पकाल में सुविधा दे सकती है, पर दीर्घकाल में विश्वसनीयता को क्षति पहुँचा सकती है।

## शक्ति बनाम नियम—दुनिया किसे चुनेगी?

वेनेज़ुएला प्रकरण किसी एक नेता या एक देश का मामला नहीं। यह नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाम शक्ति-आधारित हस्तक्षेप की टकराहट है। यदि नियम हारते हैं, तो दुनिया अधिक अस्थिर, अधिक ध्रुवीकृत और अधिक सशस्त्र होगी। यदि संवाद और कानून जीतते हैं, तो बहुध्रुवीयता के बावजूद सहयोग संभव रहेगा।

आज सवाल यह नहीं कि किसका तेल, किसकी मुद्रा—सवाल यह है कि क्या इक्कीसवीं सदी कानून से चलेगी, या बंदूक से?