एक ऐसा नेता जिसका जन्मदिन भुला दिया गया।



आज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संथापकों में एक कॉमरेड हसरत मोहानी का जन्मदिन है

एक ऐसा शख़्स जिसने फ़क़ीरी और दरवेशी में अपनी ज़िंदगी गुज़ार दी, जिसका टूटा फूटा मकान था जिसमें टाट का पर्दा लगा रहता था। जिसके पास एक मैला-कुचैला थैला रहा करता था। उस थैले में फटे पुराने कपड़े, एक लोटा और चंद कागज़ात रहा करते थे। जो शख़्स जब संविधान सभा की बैठक में आता तो संसद के सामने एक टूटी सी मस्जिद में अपना क़याम करता। वो शख़्स जिसने कभी संसद से तनख़्वाह या कोई भी सरकारी सहूलियत नहीं लिया।

वो शख़्स जिसने इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा दिया, जिसने सम्पूर्ण आज़ादी का नारा बाबुलंद लगाया। जिसने अपनी ज़िंदगी के छः साल इसलिए जेल में गुज़ार दिया ताकि आने वाली नस्लें एक आज़ाद और ख़ुदमुख़्तार मुल्क में सांसें ले सकें। वो शख़्स क्या नहीं था। कभी आलिम बनकर, तो कभी शायर बनकर, मुजाहिद-ए-आज़ादी बनकर, तो कभी क़ायद बनकर मुल्क और इंसानियत की बेलौस ख़िदमत किया। जिसकी शायरी और ग़ज़लें आज भी रूह को ताज़ा कर देती हैं। वो शख़्स जो क़ौमी एकता का सच्चा सिपाही था जिसने हमेशा हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद की बात की। श्री कृष्ण का दीवाना ये शख़्स जिसने अपनी ग़ज़लों में श्री कृष्ण की शान में क़सीदे पढ़े। जिसने इंसानियत को हमेशा सियासत से ऊपर रखा। जिसे किसी भी पद की कोई ख़्वाहिश नहीं रही।

वो शख़्स जिसने कभी कांग्रेस को मज़बूत किया फिर ख़िलाफ़त आंदोलन ख़त्म किए जाने पर कांग्रेस से अपना रिश्ता तोड़ लिया। लेनिन का दीवाना ये शख़्स कम्युनिस्ट पार्टी से स्थापना के समय से जुड़ा। लेफ़्ट में रहकर जिसने वामपंथी मूल्यों और इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों में शामिल मानवता और समानता के संदेशों का प्रचार किया। वो शख़्स जो गांधी की तरह बैठकर बात करने के बजाय लेनिन की तरह दुनिया को हिला देने की बात करता था। अम्बेडकर का वो साथी जिसके साथ अम्बेडकर दस्तरखान पर साथ बैठकर खाना खाते थे।

वो शख़्स जिसने मुस्लिम लीग को नई ऊर्जा दी। वो शख़्स जिसने मुस्लिम लीग में रहकर उसके द्विराष्ट्रीय सिद्धांत का विरोध किया एवं पाकिस्तान बनने के विरोध में खड़े हो गए। वो शख़्स जिसने बँटवारे के बाद पाकिस्तान जाने से मना कर दिया। मुनव्वर राणा ने उसी शख़्स के बारे में मुहाज़िरनामा में लिखा है “वो पतली सी सड़क जो उन्नाव से मोहान जाती है, वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं।”

उस अज़ीम शख़्स का नाम ‘कॉमरेड हसरत मोहानी’ था और आज उस अज़ीम शख़्सियत की यौम-ए-पैदाईश है।