"रामनाम" : अन्तःकाय महाकुम्भ का रहस्य
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
"रामनाम" : अन्तःकाय महाकुम्भ का रहस्य
“सब के भीतर कुम्भ है।”
यह वाक्य कोई काव्यात्मक उक्ति नहीं, बल्कि सनातन योग-दर्शन का अत्यन्त गूढ़ सत्य है। कुम्भ किसी काल–विशेष या स्थान–विशेष का उत्सव मात्र नहीं, अपितु प्राण, मन और चेतना के भीतर घटित होने वाली एक नित्य प्रक्रिया है। प्रत्येक जीव के भीतर, प्रत्येक श्वास–प्रश्वास के मध्य, एक सहज कुम्भक अनायास घटित होता रहता है। इसी सूक्ष्म कुम्भक को जब चेतना का स्पर्श मिल जाता है, तब वह साधना बन जाता है—और जब साधना पूर्ण होती है, तब वही महाकुम्भ बन जाता है।
## सहज कुम्भक : श्वास के बीच का अमृत-क्षण
प्राणायाम में सामान्यतः तीन क्रियाएँ कही गई हैं— पूरक (श्वास लेना), रेचक (श्वास छोड़ना) और कुम्भक (श्वास को रोकना)। परन्तु शास्त्र यह भी कहते हैं कि एक चौथी अवस्था है—केवली कुम्भक, जो न प्रयास से होता है, न अभ्यास से; वह सहज होता है। यह वही क्षण है—
* जब श्वास भीतर जाकर ठहर जाती है
* और बाहर निकलने से पहले एक सूक्ष्म विराम लेती है
यही क्षण अमृत-क्षण है। यही भीतर का कुम्भ है। हर मनुष्य में यह कुम्भक घटित होता है, पर वह अचेतन रहता है। साधना का अर्थ है—अचेतन कुम्भक को चेतन बना देना।
## रामनाम और कुम्भक का सहज उदय
सनातन परम्परा में कहा गया है— “नाम जप से प्राण स्थिर होते हैं।” रामनाम का जप करते-करते, साधक अनुभव करता है कि—
* श्वास स्वतः सूक्ष्म होने लगती है
* गति मंद होती जाती है
* और श्वास–प्रश्वास के बीच का अन्तराल बढ़ने लगता है
यही वह अवस्था है जहाँ कुम्भक अनायास घटित होने लगता है।इसलिए कहा गया— “राम नाम से केवल कुम्भक अनायास होने लगता है।” यह कोई प्रतीकात्मक कथन नहीं, बल्कि नाड़ी-विज्ञान पर आधारित योगिक सत्य है।
## ‘राम’ : कोई नाम नहीं, एक योगसूत्र
अब प्रश्न उठता है— आख़िर रामनाम में ऐसा क्या है?
सनातन दृष्टि कहती है— राम केवल ईश्वर का नाम नहीं, यह एक पूर्ण योग-रचना (Yogic Formula) है।
### राम = र + अ + म
ये तीन अक्षर केवल ध्वनियाँ नहीं, बल्कि तीन नाड़ियाँ और तीन ब्रह्मतत्त्व हैं।
## १. रकार — इड़ा नाड़ी — सोम शक्ति
रकार (र्) का सम्बन्ध है इड़ा नाड़ी से।
* इड़ा नाड़ी बाएँ नासाछिद्र से प्रवाहित होती है
* यह चन्द्र (सोम) की शक्ति है
* शीतल, स्निग्ध, शान्त और मन को शीतल करने वाली
इसलिए कहा गया— इड़ा = र (सोम) शक्ति
जब ‘र’ का जप होता है, तो—
* मन की चंचलता शान्त होने लगती है
* भावनाओं का उबाल ठहरने लगता है
* चित्त में शीतलता आती है
यह वही अवस्था है जहाँ मन संगम की ओर बढ़ता है।
## २. अकार — पिंगला नाड़ी — सूर्य शिव
अकार (अ) का सम्बन्ध है पिंगला नाड़ी से।
* पिंगला दाएँ नासाछिद्र से प्रवाहित होती है
* यह सूर्य तत्व है
* ऊष्ण, तेजस्वी, क्रियाशील
इसलिए कहा गया— पिंगला = अ (सूर्य) शिव
यहाँ शिव का अर्थ संहार नहीं, बल्कि चेतना का जागरण है।
‘अ’ के जप से—
* प्राण में तेज आता है
* आलस्य टूटता है
* चेतना जाग्रत होती है
इड़ा की शीतलता और पिंगला की ऊष्मा— जब दोनों संतुलित होती हैं, तब योग का द्वार खुलता है।
## ३. मकार — सुषुम्णा — यम/काल
मकार (म्) का सम्बन्ध है सुषुम्णा नाड़ी से।
* सुषुम्णा मध्य मार्ग है
* जहाँ न इड़ा है, न पिंगला
* यही योग का राजपथ है
इसे कहा गया— सुषुम्णा = म (यम) काल
यहाँ ‘यम’ का अर्थ मृत्यु नहीं, बल्कि काल-नियंत्रण है।
जब प्राण सुषुम्णा में प्रवेश करता है—
* समय की अनुभूति लुप्त होने लगती है
* मन ठहर जाता है
* चित्तवृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती हैं
यही कुम्भक की पराकाष्ठा है।
## रामनाम : त्रिवेणी का अन्तःस्नान
अब यह स्पष्ट होता है कि—
* "र" से इड़ा सक्रिय
* "अ" से पिंगला संतुलित
* "म" से सुषुम्णा प्रवाहित
अर्थात रामनाम का जप स्वयं में—
* इड़ा–पिंगला का संगम
* और सुषुम्णा में प्राण का आरोहण है।
यह भीतर का प्रयाग, भीतर की त्रिवेणी, और भीतर का महाकुम्भ है। इसीलिए कहा गया— “श्री राम का नाम स्वयं में महाकुम्भ है।”
## रामनाम और केवली कुम्भक
जब साधक निरन्तर रामनाम में लीन होता है—
* श्वास–प्रश्वास सूक्ष्म हो जाता है
* पूरक–रेचक विलीन होने लगते हैं
* केवल शुद्ध चेतना शेष रह जाती है
यह अवस्था केवली कुम्भक है। यह न प्रयत्न से आती है, न बल से — यह समर्पण से प्रकट होती है।
## दार्शनिक उपसंहार
बाह्य कुम्भ में—
* देह स्नान करती है
* पाप का प्रतीकात्मक क्षय होता है
अन्तःकुम्भ में—
* मन स्नान करता है
* वासनाओं का क्षय होता है
और रामनाम के महाकुम्भ में—
* आत्मा स्नान करती है
* और जन्म–मृत्यु के बन्धन शिथिल हो जाते हैं
इसलिए सनातन ने कहा— “सब के भीतर कुम्भ है।” जो रामनाम में उतर गया— वही सच्चा कुम्भस्नातक है। राम केवल आराध्य नहीं, राम साधना हैं। राम केवल नाम नहीं, राम मार्ग हैं।
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
॥ स्वस्ति। शुभम्। मंगलम्। ॥
