सनातन धर्म में मकर संक्रांति

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


सनातन धर्म में मकर संक्रांति

मकर संक्रांति : पर्व नहीं, जीवन की धुरी

सनातन धर्म में पर्वों को केवल उत्सव समझना उस परंपरा के साथ अन्याय होगा। यहाँ पर्व काल-बोध, जीवन-दर्शन, आत्मिक अनुशासन और सामूहिक चेतना के संवाहक हैं। मकर संक्रांति भी ऐसा ही पर्व है— जो पंचांग की तिथि नहीं, मानव जीवन की दिशा बदलने का संकेत है।

यह वह क्षण है जब

👉 सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होता है

👉 प्रकाश की यात्रा प्रारम्भ होती है

👉 जड़ता से चेतना की ओर गति होती है


अतः मकर संक्रांति केवल “तिल–गुड़” का पर्व नहीं, यह अंधकार से प्रकाश की दीक्षा है।


2. संक्रांति का शास्त्रीय अर्थ : गति का दर्शन


संक्रांति शब्द का मूल अर्थ है— सं + क्रान्ति, अर्थात् — पूर्ण रूप से आगे बढ़ना


शास्त्रों में कहा गया है— 

संक्रान्तिर्ग्रहयोगे तु विशेषेण विधीयते। (धर्मसिन्धु)

अर्थात जब कोई ग्रह एक राशि से दूसरी में प्रवेश करता है,

तो वह संक्रांति कहलाती है।


किन्तु मकर संक्रांति इसलिए विशिष्ट है क्योंकि— यह सौर गणना पर आधारित है, जो परिवर्तनशील नहीं, स्थिर और वैज्ञानिक है।


3. सूर्य का मकर राशि में प्रवेश : ब्रह्माण्डीय अनुशासन


मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।

मकर—

✔ अनुशासन

✔ तप

✔ कर्म

✔ धैर्य का प्रतीक है।


मकरो धर्मराजस्य वाहनम् (पुराण-संकेत)

अर्थात मकर धर्मराज यम का वाहन है—जो यह दर्शाता है कि यह काल कर्म-फल की चेतना का है। यह संयोग बताता है— अब कर्म से पलायन नहीं, अब उत्तरदायित्व का समय है।


4. उत्तरायण : देवयान और आत्मोन्नति का मार्ग


श्रीमद्भगवद्गीता (8.24) में श्रीकृष्ण कहते हैं—


अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।

तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥

अर्थात—।जो आत्माएँ उत्तरायण, प्रकाश और शुक्ल पक्ष में देह त्यागती हैं, वे ब्रह्मगति को प्राप्त होती हैं। यहाँ उत्तरायण भौगोलिक घटना नहीं, चेतना की दिशा है।


उत्तरायण =

👉 जड़ता से चेतना

👉 अज्ञान से ज्ञान

👉 तमस से सत्त्व


5. भीष्म पितामह और उत्तरायण का प्रतीक


महाभारत में भीष्म पितामह शरशय्या पर पड़े रहकर उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हैं। क्यों?

क्योंकि वे जानते थे—मृत्यु भी यदि सही काल-बोध में हो, तो वह मोक्ष का द्वार बन जाती है। यह प्रसंग बताता है—सनातन धर्म में काल भी साधना है।


6. मकर संक्रांति और जल-संस्कृति


शास्त्र कहते हैं— उत्तरायणे जले स्नानं सहस्रगुणितं फलम्।उत्तरायण में किया गया स्नान हजार गुना फल देता है।


इसीलिए—


* गंगा स्नान

* संगम स्नान

* तीर्थ स्नान का विधान है।


जल यहाँ केवल शरीर नहीं धोता, वह संस्कार धोता है।


7. तिल–गुड़ : सामाजिक दर्शन का सूत्र


मकर संक्रांति पर तिल–गुड़ का दान और सेवन क्यों? शास्त्र कहते हैं— तिलाः पापहराः प्रोक्ता (गरुड़ पुराण)


तिल—

👉 कर्म बंधन काटता है

👉 पितृ ऋण शमन करता है


गुड़—

👉 मधुरता

👉 समरसता

👉 सामाजिक सौहार्द


अर्थात संदेश स्पष्ट है— कटु सत्य को भी मधुरता से कहो।


8. पतंग : सीमाओं के पार उड़ान


पतंग उड़ाना केवल खेल नहीं।


यह प्रतीक है—


* सीमाओं को लांघने का

* दृष्टि को ऊपर उठाने का

* बंधनों से मुक्त होने का


Gen Z के लिए यह गहरा संकेत है— ऊँचा उड़ो, पर डोर मत तोड़ो।


9. वैज्ञानिक दृष्टिकोण : प्रकृति और शरीर का संवाद


आधुनिक विज्ञान भी मानता है—


* सूर्य के उत्तरायण होते ही

* जैविक ऊर्जा बढ़ती है

* रोग प्रतिरोधक क्षमता सुधरती है


तिल, गुड़, घी— ये सभी ऊष्मा प्रदान करने वाले तत्व हैं। अर्थात सनातन पर्व परंपरा नहीं, प्रयोगशाला हैं।


10. सामाजिक समरसता का पर्व


मकर संक्रांति—


* जाति भेद नहीं देखती

* वर्ग भेद नहीं मानती

* उत्तर–दक्षिण को जोड़ती है


देश के हर कोने में अलग नाम, पर एक भाव—


* उत्तर भारत : मकर संक्रांति

* दक्षिण : पोंगल

* असम : बिहू

* पंजाब : लोहड़ी


यह भारत की आत्मिक एकता है।


11. Gen Z के लिए आध्यात्मिक संदेश


आज की युवा पीढ़ी—


* तेज है

* जागरूक है

* प्रश्न करती है

कर संक्रांति उन्हें सिखाती है—

👉 जीवन में दिशा बदलने से मत डरो

👉 अंधकार स्थायी नहीं होता

👉 अनुशासन स्वतंत्रता का शत्रु नहीं, उसका आधार है

👉 अपनी “उत्तरायण” स्वयं खोजो

धर्म भागने का मार्ग नहीं, सजग जीवन जीने की कला है।

12. संक्रांति भीतर भी घटे

सबसे बड़ा प्रश्न— क्या सूर्य ही उत्तरायण हुआ या हमारी चेतना भी?

यदि—

* क्रोध घटा

* विवेक बढ़ा

* करुणा जागी

* कर्म में ईमानदारी आई

तो समझिए—आपकी आत्मिक संक्रांति सफल हुई।

तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय॥

अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर— यही मकर संक्रांति का सनातन संदेश है।