माघ मास : स्नानमात्र से श्रीहरि की परम प्रीति का काल
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
माघ मास : स्नानमात्र से श्रीहरि की परम प्रीति का काल
सनातन धर्म में माघ मास को भक्ति, वैराग्य, तप और कृपा का अद्वितीय संगम कहा गया है। यह मास केवल आचरण का विधान नहीं, बल्कि ईश्वर और जीव के मध्य सहज, सरल और सुलभ सेतु है। पद्मपुराण के उत्तर खण्ड में माघ मास की महिमा का जो उद्घोष मिलता है, वह सनातन साधना-दर्शन के हृदय को स्पर्श करता है—
व्रतैर्दानस्तपोभिश्च न तथा प्रीयते हरिः।
माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशवः॥
अर्थात— व्रत, दान और तपस्या से भी भगवान श्रीहरि उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने माघ मास में ब्रह्ममुहूर्त में केवल स्नानमात्र से हो जाते हैं।
यह श्लोक माघ मास की अपूर्व करुणा को उद्घाटित करता है। जहाँ अन्य साधनाएँ कठोर नियम, दीर्घ अभ्यास और सामर्थ्य की अपेक्षा रखती हैं, वहीं माघ मास ईश्वर को अनुग्रहशील बना देता है। यहाँ साधना का भार मनुष्य से अधिक, कृपा का भार ईश्वर पर होता है।
## माघ-स्नान व्रत : मोक्ष का सहज द्वार
पद्मपुराण के अनुसार— सभी पापों से मुक्ति और भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए माघ-स्नान व्रत प्रत्येक मनुष्य को अवश्य करना चाहिए। इस व्रत का आरम्भ पौष पूर्णिमा से होता है और माघ पूर्णिमा तक चलता है।
माघ मास की यह अद्भुत विशेषता है कि—
* इस मास में जहाँ कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान पुण्यदायक हो जाता है।
* इस मास की प्रत्येक तिथि स्वयं में पर्व है।
यह विधान यह स्पष्ट करता है कि माघ मास में स्थान नहीं, भाव प्रधान हो जाता है। संगम, नदी या सरोवर—सब श्रेष्ठ हैं, पर यदि शरीर अशक्त हो, परिस्थितियाँ अनुकूल न हों, तो घर पर जल में गंगाजल मिलाकर किया गया स्नान भी पूर्ण फलदायी माना गया है।
## अल्प सामर्थ्य के लिए भी पूर्ण करुणा
सनातन धर्म की यह महान विशेषता है कि वह किसी को भी वंचित नहीं करता। शास्त्र कहते हैं— यदि कोई व्यक्ति पूरे मास का कठोर नियम न ले सके, तो भी—
* एक पक्ष
* एक सप्ताह
* तीन दिन
* अथवा एक दिन
निश्चित रूप से माघ-स्नान व्रत का पालन करे। यह भी अक्षय पुण्यदायक होता है। यह व्यवस्था बताती है कि माघ मास साधना की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि ईश्वर की करुणा का उत्सव है।
## माघ मास में किए जाने वाले पुण्यकर्म
माघ मास में किए गए—
* स्नान
* दान
* उपवास
* भगवत्पूजन
अत्यन्त फलदायी माने गए हैं। विशेषतः कुछ तिथियाँ और व्रत अत्यधिक महत्त्व रखते हैं।
## षटतिला एकादशी : तिल से पापक्षय
माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। इस दिन काले तिल और काली गाय के दान का विशेष माहात्म्य है।
शास्त्रों में बताए गए तिल-सम्बन्धी छः कर्म पापों के नाशक माने गए हैं—
1. तिल मिश्रित जल से स्नान
2. तिल का उबटन
3. तिल से हवन
4. तिल मिश्रित जल का पान एवं तर्पण
5. तिल मिश्रित भोजन
6. तिल का दान
तिल को कर्मबंधन भेदन का प्रतीक माना गया है—यह अतीत के संस्कारों को शिथिल करता है।
## मौनी अमावस्या : मौन द्वारा मन की शुद्धि
माघ कृष्ण पक्ष की अमावस्या मौनी अमावस्या कहलाती है। इस दिन—
* मौन रहकर
* मुनियों के समान आचरण करते हुए
* स्नान, ध्यान और दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
मौन केवल वाणी का नहीं, मन का उपवास है। यह तिथि चित्त-वृत्तियों को शान्त करने की अनुपम साधना प्रदान करती है।
## सूर्यग्रहण तुल्य तिथियाँ
शास्त्रों में माघ मास की चार तिथियों को सूर्यग्रहण के समान पुण्यदायक कहा गया है—
* मंगलवारी चतुर्थी
* रविवारी सप्तमी
* बुधवारी अष्टमी
* सोमवारी अमावस्या
इन तिथियों में किया गया स्नान, दान और श्राद्ध अक्षय फल प्रदान करता है।
## वसंत पंचमी : ज्ञान की अवतरण तिथि
माघ शुक्ल पंचमी को वसंत पंचमी कहा जाता है। यह माँ सरस्वती का आविर्भाव दिवस है। इस दिन— प्रातः सरस्वती पूजन तथा पुस्तकों और लेखनी की पूजा की जाती है, क्योंकि शास्त्रों में ज्ञान के उपकरणों में भी देवी सरस्वती का निवास माना गया है।
## अचला सप्तमी : स्थिर पुण्य की साधना
शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अचला सप्तमी कहा जाता है। षष्ठी को एक समय भोजन कर, सप्तमी को सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से—
* पापनाश
* रूप
* सुख-सौभाग्य
* सद्गति की प्राप्ति होती है।
## माघी पूर्णिमा : देवताओं का स्नान पर्व
यद्यपि माघ मास की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, फिर भी माघी पूर्णिमा का स्थान सर्वोपरि है। इस दिन—
* स्नान
* भगवत्पूजन
* श्राद्ध
* दान
का विशेष फल मिलता है।
शास्त्रों में कहा गया है— जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।
माघी पूर्णिमा को—
तिल
सूती वस्त्र
कम्बल
रत्न
पगड़ी
जूते आदि का यथाशक्ति दान करने से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।
## ब्रह्मवैवर्त पुराण दान : ब्रह्मलोक का द्वार
मत्स्य पुराण के अनुसार— जो व्यक्ति माघी पूर्णिमा के दिन ब्रह्मवैवर्त पुराण का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। यह दान ज्ञान-दान की श्रेणी में आता है, जिसे शास्त्रों में सर्वोच्च माना गया है।
## माघ मास — कृपा का काल
माघ मास यह सिखाता है कि— ईश्वर तक पहुँचने के लिए सदा कठोर तप आवश्यक नहीं, कभी-कभी निर्मल भाव, प्रातःकालीन स्नान और स्मरण ही पर्याप्त होता है। यह मास मनुष्य को स्मरण कराता है कि— "ईश्वर साधनों से नहीं, समर्पण से प्रसन्न होता है।"
माघ मास का स्नान, वस्तुतः देह का नहीं, चित्त का स्नान है। जो इस सत्य को समझ लेता है, उसके लिए माघ मास केवल एक महीना नहीं, मोक्ष की भूमिका बन जाता है।
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
