माघ मेला : कल्पवास के समय पंचकोसी परिक्रमा का महत्त्व

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

माघ मेला : कल्पवास के समय पंचकोसी परिक्रमा का महत्त्व 

"चलते हुए ध्यान की वह सनातन परम्परा, जो आज भी आत्मा को दिशा देती है"

## जब आस्था चलने लगती है

माघ मेला प्रयाग केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, यह सनातन चेतना का जीवित महाकाव्य है। संगम में स्नान, कल्पवास की तपश्चर्या, साधु-संतों का समागम और प्रवचन—इन सबके बीच एक ऐसी परम्परा है, जो अपेक्षाकृत कम चर्चित होते हुए भी अत्यन्त गहन है—"पंचकोसी परिक्रमा"।

यह परिक्रमा न तो केवल पाँवों की यात्रा है, न ही मात्र तीर्थों की गणना। यह मनुष्य के भीतर की यात्रा है—अहंकार से आत्मबोध की ओर, स्थिरता से सजग गति की ओर।

## पंचकोसी परिक्रमा क्या है?

‘पंच’ अर्थात पाँच और ‘कोसी’ अर्थात कोस। पंचकोसी परिक्रमा का अर्थ है—"प्रयाग क्षेत्र की लगभग पाँच कोस की पवित्र परिधि का पैदल परिक्रमण"। माघ मास में, विशेषतः कल्पवास के दौरान, इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

सनातन परम्परा में "परिक्रमासी का तात्पर्य केवल घूमना नहीं है। यह एक आध्यात्मिक विधान है, जिसमें साधक स्वयं को केंद्र में रखकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करता है। इसी कारण परिक्रमा सदैव दाईं ओर, सूर्य की दिशा में की जाती है—यह चेतना की आरोहण यात्रा है।

## शास्त्रीय पृष्ठभूमि : पंचकोसी और पंचतत्त्

शस्त्र में पंचकोसी की अवधारणा केवल दूरी से नहीं, बल्कि पञ्चमहाभूतों से भी जुड़ी है— पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश।

स्कन्दपुराण के प्रयागखण्ड में प्रयाग क्षेत्र को पञ्चकोशात्मक तीर्थ कहा गया है, जहाँ अन्नमय से लेकर आनन्दमय कोश तक का शोधन होता है। इस दृष्टि से पंचकोसी परिक्रमा देह, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा—पाँचों स्तरों की साधना है।

## माघ मेला और पंचकोसी : काल का रहस्य

माघ मास को शास्त्रों में देवताओं का प्रिय काल कहा गया है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश, उत्तरायण का प्रभाव और जल-तत्त्व की प्रधानता—ये सभी मिलकर साधना को स्थिरता और गहराई देते हैं।

पुराणों में कहा गया है—

“माघे मासि प्रयागे तु कृतं यत् पुण्यकर्म च।

तत् कोटिगुणितं पुण्यं भवत्येव न संशयः॥”

अर्थात माघ मास में प्रयाग क्षेत्र में किया गया प्रत्येक धर्मकर्म कोटि-गुणा फल प्रदान करता है। ऐसे में पंचकोसी परिक्रमा केवल परम्परा नहीं, बल्कि काल-सिद्ध साधना बन जाती है।

## आध्यात्मिक अर्थ : चलते हुए ध्यान की साधना

पंचकोसी परिक्रमा का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश है—गति में ध्यान। पदयात्रा में शरीर थकता है, मन शांत होता है और अहंकार स्वतः ढीला पड़ता है। यही स्थिति ध्यान की भूमि बनाती है। जब पाँव चलते हैं और मन नाम-स्मरण में लीन होता है, तब साधक अनायास ही ध्यान की अवस्था में प्रवेश कर जाता है। यह वही सिद्धान्त है, जिसे योग में चलित ध्यान कहा गया है—जहाँ गति और स्थिरता का द्वंद्व समाप्त हो जाता है।

## धार्मिक फल : पापक्षय से मोक्षमार्ग तक

धार्मिक दृष्टि से पंचकोसी परिक्रमा को—

गंगा-स्नान के पुण्य का विस्तार

 दान और व्रत का पूरक

 पितृदोष शमन का साधन माना गया है।

स्कन्दपुराण में उल्लेख है कि श्रद्धा और नियम से की गई परिक्रमा, अनेक यज्ञों के फल के समान होती है। यह परिक्रमा साधक को केवल पुण्य नहीं, बल्कि संस्कारों की शुद्धि प्रदान करती है।

## पंचकोसी और कल्पवास : स्थिरता और गति का संतुलन

कल्पवास माघ मेले की आत्मा है—जहाँ साधक एक स्थान पर रहकर तप करता है। पंचकोसी परिक्रमा उसी तप का गतिशील विस्तार है।

 कल्पवास सिखाता है—रुकना। पंचकोसी सिखाती है—सजग होकर चलना।


दोनों मिलकर सनातन जीवन-दर्शन का पूर्ण स्वरूप रचते हैं—जहाँ जीवन न तो केवल संन्यास है, न केवल गृहस्थी, बल्कि संतुलन है।

## सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व

पंचकोसी परिक्रमा में कोई ऊँच-नीच नहीं होती। साधु, गृहस्थ, स्त्री, वृद्ध, युवा—सब एक साथ चलते हैं। यह परम्परा सनातन धर्म की उस सामाजिक समता को प्रकट करती है, जहाँ पाँवों की धूल सबके लिए समान होती है।

यह लोकधर्म और शास्त्रधर्म का संगम है—जहाँ आस्था, अनुशासन और सामूहिकता एक साथ चलती हैं।

## आधुनिक संदर्भ : आज के मनुष्य के लिए पंचकोसी

 आज का मनुष्य तेज़ है, पर अशांत।

उसके पास गति है, पर दिशा नहीं।

पंचकोसी परिक्रमा आज के समय में एक गहरा संदेश देती है—

 धीरे चलो

 प्रकृति के साथ चलो

 शरीर को साधन बनाओ, लक्ष्य नहीं

केंद्र से जुड़े रहो

यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक वेलनेस मॉडल है, जो मन, शरीर और समाज—तीनों को संतुलित करता है।

## बाहर की परिक्रमा, भीतर का प्रयाग

माघ मेला की पंचकोसी परिक्रमा वास्तव में प्रयाग की नहीं, मनुष्य की अपनी चेतना की परिक्रमा है। जो इस परिक्रमा में चलता है, वह केवल पाँच कोस नहीं चलता— वह अपने भीतर जमी जड़ता, अहंकार और अस्मिता को पार करता है।

यही कारण है कि सहस्र वर्षों बाद भी पंचकोसी परिक्रमा आज उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी ऋषियों के युग में थी—क्योंकि मनुष्य बदला है, उसकी आत्मा की प्यास नहीं।