टीवी का पतन नहीं, सत्ता–व्यवसाय का पुनर्संयोजन: भारत में मीडिया कंजम्पशन की नई सच्चाई
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
टीवी का पतन नहीं, सत्ता–व्यवसाय का पुनर्संयोजन: भारत में मीडिया कंजम्पशन की नई सच्चाई
भारत में टेलीविज़न इंडस्ट्री किसी अचानक आए संकट से नहीं, बल्कि धीमे लेकिन निर्णायक पतन से गुजर रही है। दर्शक जा रहे हैं, विज्ञापन खिसक रहे हैं और चैनल—एक-एक कर—अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस समेट रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में करीब 50 टीवी चैनलों का लाइसेंस सरेंडर होना कोई तकनीकी घटना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मोड़ है—जहाँ भारतीय मीडिया का पारंपरिक ढांचा ढह रहा है। यह बदलाव केवल तकनीक का नहीं है, यह सत्ता, पूंजी और कंट्रोल के रिश्ते के पुनर्गठन का संकेत है।
## बड़े नाम, बड़ी वापसी: जब दिग्गज भी पीछे हटें
यदि यह संकट केवल छोटे या क्षेत्रीय चैनलों तक सीमित होता, तो इसे “मार्केट करेक्शन” कहकर टाला जा सकता था। लेकिन जब JioStar, Zee, TV Today, ABP, Eenadu और Sony (Culver Max) जैसे कॉरपोरेट दिग्गज अपने चैनल बंद करें—तो साफ है कि खेल की बिसात ही बदल चुकी है।
26 डाउनलिंकिंग परमिशन सरेंडर करना, HD चैनल बंद करना, क्षेत्रीय चैनलों से हाथ खींचना—ये सब बताता है कि अब “हर जगह मौजूद रहने” की रणनीति खत्म हो चुकी है। अब केवल वही बचेगा जो या तो
1. डिजिटल पर प्रभुत्व रखता हो,
2. या सत्ता–विज्ञापन के स्थायी संरक्षण में हो।
## OTT नहीं, असली खतरा है कंट्रोल का शिफ्ट
यह कहना आधा सच है कि टीवी OTT से हार रहा है। असली सच्चाई यह है कि टीवी का कंट्रोल OTT और डिजिटल के हाथों में जा रहा है, जहाँ एल्गोरिदम, डेटा और प्लेटफॉर्म ओनरशिप निर्णायक भूमिका में हैं।
शहरी, संपन्न दर्शक पहले ही टीवी छोड़ चुके हैं। ग्रामीण और मध्यम वर्ग अब DD Free Dish की ओर बढ़ रहा है—जहाँ कंटेंट तो है, लेकिन कॉरपोरेट विज्ञापन मॉडल नहीं।
निजी DTH कंपनियाँ दो तरफ़ से पिस रही हैं— OTT ने प्रीमियम दर्शक छीने, Free Dish ने कीमत-संवेदनशील दर्शक।
## आंकड़े चीख-चीख कर बता रहे हैं सच्चाई
Crisil के आंकड़े किसी वैचारिक आलोचना नहीं, बल्कि निर्दय आर्थिक सत्य हैं—
* FY19: 7.2 करोड़ DTH सब्सक्राइबर
* FY24: घटकर 6.19 करोड़
* FY25: और 9% गिरावट
* FY26 तक: 5.1 करोड़ से नीचे जाने की आशंका
यह केवल सब्सक्राइबर का पतन नहीं है—यह विज्ञापन, प्रभाव और राजनीतिक उपयोगिता के क्षरण का संकेत है।
## कौन बचेगा? और क्यों?
यह सवाल अब पत्रकारिता का नहीं, राजनीतिक अर्थशास्त्र का है।
जो चैनल—
* सत्ता के लिए अपरिहार्य नहीं,
* विज्ञापन के लिए “सेफ” नहीं,
* या डिजिटल में आत्मनिर्भर नहीं
वे या तो बंद होंगे, या YouTube/OTT के शरणार्थी बनेंगे।
ABP News HD, NDTV Gujarati, Zee Sea, Dangal HD जैसे उदाहरण साफ बताते हैं— भावनात्मक ब्रांड वैल्यू अब पर्याप्त नहीं।
## यह मीडिया का अंत नहीं, लोकतंत्र की चेतावनी है
टीवी चैनलों का बंद होना केवल एक उद्योग का संकट नहीं है। यह संकेत है कि सूचना का केंद्रीकरण तेज़ी से हो रहा है। जब विकल्प कम होंगे, तो विविधता, असहमति और आलोचना भी सिमटेगी।
भारत में मीडिया अब तीन रास्तों पर है—
1. सत्ता-समर्थित कॉरपोरेट मीडिया
2. एल्गोरिदम-नियंत्रित डिजिटल प्लेटफॉर्म
3. और हाशिए पर जाती स्वतंत्र आवाज़ें
सवाल यह नहीं कि टीवी बचेगा या नहीं। सवाल यह है—क्या जनता के पास सुनने के लिए सच बचेगा? अगर इस बदलाव को केवल “बिज़नेस ट्रेंड” कहकर नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले वर्षों में मीडिया नहीं— "लोकतांत्रिक संवाद सरेंडर होता दिखेगा।"
