दिल्ली से न्यूयॉर्क तक कानून का घेरा: क्या भारत में ‘सत्ता-संरक्षण’ से रुक गई है SEC की कानूनी प्रक्रिया?

 दिल्ली से न्यूयॉर्क तक कानून का घेरा: क्या भारत में ‘सत्ता-संरक्षण’ से रुक गई है SEC की कानूनी प्रक्रिया?

अंतर्राष्ट्रीय वित्त और भू-राजनीति के गलियारों में, अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (SEC) बनाम भारत के उद्योगपति गौतम अडानी और सागर अडानी का मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार और राष्ट्रीय जवाबदेही के चौराहे पर खड़ा एक प्रतीकात्मक संघर्ष बन गया है। नवंबर 2024 में धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी के आरोपों पर मूल शिकायत दर्ज होने के एक वर्ष से अधिक समय बाद, SEC को भारत में कानूनी समन तामील कराने में मिली निराशा भारत-अमेरिका संबंधों और भारत के संस्थागत स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।


## कानूनी गतिरोध: कूटनीति के चक्रव्यूह में समन


SEC के वकीलों ने न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में जो लगातार स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की हैं, वे स्पष्ट करती हैं कि समन की प्रक्रिया कूटनीतिक रास्तों की नौकरशाही में उलझ गई है। चूंकि अडानी बंधु भारत में रहते हैं, इसलिए हेग सर्विस कन्वेंशन के तहत समन को भारत के विधि एवं न्याय मंत्रालय (MoLJ) के माध्यम से तामील कराना अनिवार्य है।


आठ महीनों और पाँच स्टेटस रिपोर्टों के बावजूद, समन की तामील न हो पाना असाधारण है। यह तब और भी अधिक चिंताजनक हो जाता है जब फरवरी 2025 में MoLJ द्वारा RTI के माध्यम से ऐसे किसी अनुरोध को प्राप्त न करने का दावा किया गया था, जबकि SEC ने अमेरिकी अदालत को प्रक्रिया शुरू करने की सूचना दी थी।


यह केवल धीमी गति का मामला नहीं है; यह एक संकेत है कि अंतर्राष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया को भारत के भीतर संस्थागत प्रतिरोध या कम से कम, गंभीर उदासीनता का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी कानून प्रवर्तन के प्रयासों को अडानी समूह के वकीलों द्वारा समन से छूट (waiver) देने से इनकार करने से भी झटका लगा है, जो कानूनी प्रक्रिया को अधिकतम खींचने की रणनीति को दर्शाता है।


## SEC के पास आगे क्या कानूनी विकल्प हैं?


मौजूदा गतिरोध को देखते हुए, SEC के पास सीमित लेकिन प्रभावी कानूनी विकल्प मौजूद हैं:


1. न्यायिक हस्तक्षेप का अनुरोध (Request for Judicial Intervention): SEC मजिस्ट्रेट जज जेम्स आर. चो या डिस्ट्रिक्ट जज से भारतीय मंत्रालय पर अधिक दबाव बनाने के लिए कूटनीतिक चैनलों को सक्रिय करने या अमेरिकी विदेश विभाग से हस्तक्षेप का अनुरोध करने का आग्रह कर सकता है।

2. वैकल्पिक सेवा (Alternative Service): यदि कूटनीतिक रास्ता पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है, तो SEC कोर्ट से वैकल्पिक सेवा (Alternative Service) की अनुमति मांग सकता है। इसमें समन को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों (ईमेल) से या भारत में अडानी समूह के मुख्य वकीलों/कर्मचारियों पर तामील कराया जा सकता है। हालांकि, हेग कन्वेंशन के चलते यह रास्ता जटिल है और इसकी वैधता पर भारत में विवाद हो सकता है।

3. सिविल डिफॉल्ट जजमेंट (Civil Default Judgment): यह सबसे बड़ा कानूनी दांव होगा। यदि SEC यह साबित करने में सफल होता है कि उसने समन तामील कराने के लिए हर संभव उचित प्रयास किया है और अडानी बंधुओं ने जानबूझकर समन लेने से इनकार किया है, तो कोर्ट डिफॉल्ट जजमेंट दे सकता है। इसका अर्थ यह होगा कि कोर्ट आरोपों को सच मानते हुए अडानी बंधुओं को दोषी ठहरा सकता है और उन पर भारी जुर्माना लगा सकता है। हालांकि, यह जुर्माना भारत में तभी वसूल किया जा सकेगा जब दोनों देशों के बीच न्यायिक सहयोग हो।

4. आपराधिक अभियोग पर जोर (Focus on Criminal Indictment): न्यूयॉर्क के अमेरिकी अटॉर्नी कार्यालय द्वारा गौतम और सागर अडानी समेत आठ लोगों के खिलाफ समानांतर आपराधिक अभियोग (धोखाधड़ी और साजिश) को प्राथमिकता दी जा सकती है। यद्यपि सभी आरोपी अमेरिका से बाहर हैं, गिरफ्तारी वारंट जारी हैं। यह मामला विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम (FCPA) के उल्लंघन के तहत आता है, और भारत पर प्रत्यर्पण का दबाव बढ़ सकता है।


## अडानी समूह का खंडन: 'निराधार' आरोपों की दीवार


SEC के $265 मिलियन की कथित रिश्वत और अमेरिकी निवेशकों को गुमराह करने के आरोपों के जवाब में, अडानी समूह ने शुरू से ही एक दृढ़ रुख अपनाया है।


"समूह के अनुसार, सभी आरोप 'निराधार' और 'दुर्भावनापूर्ण' हैं।"


अडानी समूह की रक्षा मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर केंद्रित है:


* तथ्यात्मक असत्यता: समूह ने आरोपों की सत्यता को सिरे से खारिज किया है और कहा है कि वे अपनी परियोजनाओं में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता या अनैतिक आचरण में शामिल नहीं रहे हैं।

* कानूनी क्षेत्राधिकार: समूह के वकीलों का मौन विरोध और समन से छूट को अस्वीकार करना, कहीं न कहीं इस बात को भी दर्शाता है कि वे SEC के कानूनी क्षेत्राधिकार को भारत में चुनौती देने का इरादा रखते हैं। वे तर्क दे सकते हैं कि रिश्वत और धोखाधड़ी के कथित कार्य भारत में हुए, और अमेरिकी कानून का प्रभाव सीमित होना चाहिए।


## वैश्विक प्रतिष्ठा और 'जवाबदेही का अंतर'


अंतर्राष्ट्रीय कानून का सामना कर रहे एक बड़े भारतीय समूह के इस प्रकरण में सबसे गंभीर विषय भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा है। भारत सरकार लगातार खुद को अंतर्राष्ट्रीय निवेश के लिए एक पारदर्शी और नियम-आधारित गंतव्य के रूप में प्रस्तुत करती रही है।


लेकिन जब देश के भीतर ही "अडानी समूह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीधी राजनीतिक छत्रछाया में काम करता है" जैसी धारणाएं मजबूत हों, और घरेलू एजेंसियां इस समूह के मामलों में 'निष्क्रिय' दिखें, तो यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि MoLJ अमेरिकी समन को आसानी से तामील कराएगा?


आलोचक सही हैं जब वे कहते हैं कि सत्ता-संरक्षण और संस्थागत चुप्पी का यह गठजोड़ ही वह मुख्य वजह है, जिसकी वजह से अंतर्राष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया बार-बार ठहर जाती है। यह मामला सिर्फ गौतम अडानी का नहीं है; यह भारत में कानून के समान अनुप्रयोग (Equal Application of Law) और जवाबदेही (Accountability) के सिद्धांत पर एक वैश्विक रेफरेंडम है। दिल्ली को न्यूयॉर्क के सवालों का जवाब केवल कागजी कार्यवाही से नहीं, बल्कि तेज और पारदर्शी कानूनी कार्रवाई से देना होगा, ताकि भारत की छवि एक ऐसे राष्ट्र की बनी रहे जहाँ कानून सबसे ऊपर है।