केरल की जीत—कांग्रेस के लिए संजीवनी या 'कमजोर कड़ी' का संकेत?

 केरल की जीत—कांग्रेस के लिए संजीवनी या 'कमजोर कड़ी' का संकेत?


"निकाय चुनाव का केरल फ़ैसला—कांग्रेस की वापसी का दावा, या भाजपा के 'शून्य से शिखर' नैरेटिव की शुरुआत?"

वर्ष 2025 में महाराष्ट्र, हरियाणा और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्यों को गंवाने के बाद, कांग्रेस के लिए केरल के नगरीय निकाय चुनावों में मिली बड़ी जीत—यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के नेतृत्व में—किसी संजीवनी से कम नहीं है। यह जीत न केवल कार्यकर्ताओं में आई निराशा को दूर करेगी, बल्कि अगले साल होने वाले केरल विधानसभा चुनावों के लिए भी एक मजबूत नींव का काम करेगी। हालांकि, यह जीत कांग्रेस के लिए आत्ममंथन और आंतरिक अनुशासन की चेतावनी भी लेकर आई है।


1. नैरेटिव का युद्ध: मामूली जीत या निर्णायक मोड़?


केरल के निकाय चुनाव के परिणाम स्पष्ट रूप से सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के प्रति जनता के भरोसे में आई कमी को दर्शाते हैं। LDF, जो 2020 में पाँच नगर निगम जीता था, इस बार महज़ एक पर सिमट गया, जबकि UDF ने कोल्लम, कोच्चि, त्रिशूर और कन्नूर समेत चार नगर निगमों, सात जिला पंचायतों और अधिकांश ब्लॉक व ग्राम पंचायतों में बड़ी जीत हासिल की है।


* भाजपा का अति-उत्साह: भाजपा ने तिरुवनंतपुरम की नगर निगम की जीत को 'एक नए अध्याय की शुरुआत' और 'भारी जीत' बताया है। जिस राज्य में भाजपा दशकों तक एक अदद सीट के लिए तरसती रही है, वहाँ एक महापौर बना लेना बेशक उसके लिए प्रतीकात्मक जीत है।

* कटु सत्य: भाजपा का यह अति-उत्साह केवल नैरेटिव बनाने की रणनीति है। असलियत यह है कि इस "सत्ता के सेमी-फाइनल" में असली बाजी कांग्रेस के हाथ लगी है, जिसने न केवल अपनी पिछली सीटें बरकरार रखी हैं, बल्कि सत्तारूढ़ LDF से नयी सीटें भी छीनी हैं। भाजपा अपनी मामूली बढ़त को 'विकल्प' के रूप में पेश करके, केरल में LDF और UDF के बीच के दशकों पुराने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने का भ्रम पैदा कर रही है।


2. कांग्रेस की 'कमजोर कड़ी': शशि थरूर और अनुशासन का संकट


केरल की जीत कांग्रेस के लिए जितनी उत्साहजनक है, उतनी ही आंतरिक खतरे की घंटी भी बजाती है।


* असंगत आचरण: सांसद शशि थरूर का अपनी संसदीय सीट पर भाजपा की जीत को 'लोकतंत्र की खूबसूरती' बताकर न्यायसंगत ठहराना, और महत्त्वपूर्ण पार्टी बैठकों से उनकी गैरमौजूदगी, कांग्रेस के लिए स्पष्ट संकेत है।

* सत्ता की नज़दीकी: रुसी राष्ट्रपति के रात्रि भोज में थरूर को आमंत्रित करना और राहुल गांधी या खड़गे को दरकिनार करना, यह दर्शाता है कि भाजपा जानबूझकर कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी का फायदा उठाना चाहती है।

* ज़रूरत: त्वरित कार्रवाई: कांग्रेस को अब 'फूंक-फूंक कर कदम' रखने की जरूरत है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की 'चतुर रणनीति' और मेहनत (जिसने जीत दिलाई) को तब तक फायदा नहीं मिलेगा, जब तक पार्टी आंतरिक अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं देती। केरल की इस 'कमजोर कड़ी' पर संभल कर और दृढ़ता से एक्शन लेने की आवश्यकता है।


3. वामदलों का आत्मनिरीक्षण


LDF के लिए यह परिणाम एक तीव्र आत्मचिंतन का विषय है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के बाद, अब केरल में भी उनका जनाधार कमजोर हो रहा है। केरल में LDF और UDF के मुकाबले में भाजपा का शून्य से आगे बढ़ना, और 'भाजपा भी विकल्प है' जैसे नैरेटिव बनाना, वामदलों के लिए खतरे की घंटी है। उन्हें यह परखना होगा कि भाजपा की बढ़त भ्रम है या जमीनी स्तर पर वास्तविक चुनौती।


केरल की जीत कांग्रेस के लिए 2026 के विधानसभा चुनावों (केरल, तमिलनाडु, असम, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल) से पहले एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक बढ़ावा है। यह जीत राहुल और प्रियंका की मेहनत का परिणाम है, जिसने गुटबाजी को रोकते हुए शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जनाधार बढ़ाया।


किन्तु, जब तक कांग्रेस आंतरिक विद्रोह और मीडिया के नैरेटिव नियंत्रण की चुनौतियों का सामना नहीं करती, तब तक यह जीत एक क्षणिक सफलता ही रह सकती है। कांग्रेस को यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरण (प्रदूषण) और आर्थिक असमानता जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर वह मुखर रहे, और संगठन में किसी भी प्रकार की असंगति को सहन न करे, ताकि यह 'संजीवनी' स्थायी लाभ में बदल सके।