दिल्ली-एनसीआर: जहाँ 'गैस चैंबर' में दम घुटता है नागरिक और संविधान का
दिल्ली-एनसीआर: जहाँ 'गैस चैंबर' में दम घुटता है नागरिक और संविधान का
राजधानी दिल्ली और उसके परिक्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण का 'गंभीर' स्तर पर पहुँचना अब मौसमी ख़बर नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय त्रासदी और संवैधानिक विफलता का प्रमाण है। जब देश की राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 461 और नोएडा का 500 के पार जाता है, तो यह केवल हवा की गुणवत्ता नहीं, बल्कि हमारे शासन की प्राथमिकताएँ, राजनीतिक इच्छाशक्ति और नागरिक अधिकारों की उपेक्षा का सूचकांक बन जाता है।1. स्वास्थ्य परिप्रेक्ष्य: एक राष्ट्रव्यापी स्वास्थ्य आपातकाल
प्रदूषण का यह स्तर केवल आँखों में जलन या खाँसी तक सीमित नहीं है; यह एक धीमा ज़हर है जो नागरिक के सबसे मौलिक अधिकार – जीने का अधिकार (Right to Life) – पर सीधा हमला है। चिकित्सकों की चेतावनी स्पष्ट है: प्रदूषित हवा, शरीर में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और कोशिकाओं में आनुवंशिक बदलाव पैदा करती है।
यह स्थिति एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल है, जिसे सरकारों ने अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए अनदेखा करना सीख लिया है। छोटे बच्चे, जिनके फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं और जो वयस्कों की तुलना में दोगुनी रफ्तार से सांस लेते हैं, उनके जीवन के पहले आठ वर्षों में होने वाला यह नुकसान अपरिवर्तनीय है। हम अपनी भावी पीढ़ी को एक अस्वस्थ विरासत सौंप रहे हैं।
2. संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार स्पष्ट किया है कि इसमें स्वच्छ हवा में साँस लेने का अधिकार भी शामिल है।
जब सरकारें जानती हैं कि पराली जलाने, औद्योगिक उत्सर्जन और धूल नियंत्रण में विफलता के कारण हर साल यह संकट आएगा, और फिर भी कोई ठोस दीर्घकालिक समाधान नहीं निकल पाता, तो यह संवैधानिक कर्त्तव्य की घोर उपेक्षा है। यह केवल प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन है। अदालतों को अब केवल जुर्माना लगाने के बजाय, सरकारों पर इस पर्यावरणीय विफलता के लिए सीधी और व्यक्तिगत जवाबदेही तय करनी चाहिए।
3. शैक्षणिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य: पीढ़ियों का नुकसान
नोएडा प्रशासन का नर्सरी से कक्षा 5वीं तक के स्कूलों को बंद करने का निर्णय एक तात्कालिक मजबूरी हो सकती है, लेकिन यह हमारे सामाजिक और शैक्षणिक ताने-बाने पर गहरा असर डालता है।
* शैक्षणिक क्षति: हाइब्रिड या ऑनलाइन मोड पर स्विच करने से बच्चों की सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है, खासकर निम्न-आय वर्ग के छात्रों के लिए जहाँ डिजिटल पहुँच सीमित है।
* सामाजिक असमानता: अमीर अपने घरों में एयर प्यूरीफायर लगा सकते हैं; गरीब मजदूर और निम्न-आय वर्ग के लोग जहरीली हवा में काम करने और साँस लेने को मजबूर हैं। प्रदूषण का संकट वास्तव में एक गहन सामाजिक असमानता का आईना है।
4. राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: 'ब्लेम गेम' की घातक राजनीति
प्रदूषण संकट का सबसे निराशाजनक पहलू इसकी राजनीतिकरण है। हर साल, पड़ोसी राज्यों (मुख्यतः पराली जलाने को लेकर) और केंद्र सरकार के बीच 'ब्लेम गेम' चलता है।
# तीखी टिप्पणी:
* केंद्र सरकार दीर्घकालिक अंतर-राज्यीय समाधान लागू करने में विफल रही है।
* राज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले धूल नियंत्रण, निर्माण गतिविधियों और वाहन प्रदूषण पर सख्त कार्रवाई करने से कतराती हैं।
* यह 'तू डाल-डाल, मैं पात-पात' वाली राजनीति नागरिकों के जीवन की कीमत पर खेली जा रही है। नेताओं के लिए स्वास्थ्य से ज़्यादा ज़रूरी राजनीतिक स्कोर बनाना है।
## आगे का रास्ता: इच्छाशक्ति, न कि इच्छा सूची
यह संकट अब केवल 'एडवाइजरी' जारी करने या 'मास्क पहनने' की सलाह देने से हल नहीं होगा। हमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है जो निम्नलिखित दीर्घकालिक कदम उठाए:
1. जवाबदेही तंत्र: प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और संबंधित विभागों के अधिकारियों की विफलता के लिए कठोर जवाबदेही तय की जाए।
2. ऊर्जा संक्रमण: स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों और इलेक्ट्रिक वाहनों पर सब्सिडी और प्रोत्साहन को युद्ध स्तर पर बढ़ाया जाए।
3. अंतर-राज्यीय सहयोग: केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत एक स्थायी, सशक्त अंतर-राज्यीय प्राधिकरण स्थापित करना चाहिए जो पराली और औद्योगिक उत्सर्जन पर सख्त निगरानी रखे।
जब तक हम इस संकट को एक राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती के रूप में नहीं लेते, तब तक दिल्ली-एनसीआर भारत की राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक विफलता का दम घोंटने वाला प्रतीक बना रहेगा। सरकारें याद रखें, स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
