बापू के काम पर 'राम' का नाम, मंशा या सत्ता का नया तामझाम?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


बापू के काम पर 'राम' का नाम, मंशा या सत्ता का नया तामझाम?

"विकास के नाम पर छलावा भारी, मनरेगा की बलि लेकर क्या सधेगी ग्रामीण लाचारी?"

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में नाम बदलने का शगल कोई नया नहीं है। सड़कों, स्टेशनों और योजनाओं के नाम बदलना भगवा ब्रिगेड का पुराना और पसंदीदा खेल रहा है। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने सीधे उस नींव पर प्रहार किया है, जो ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का नाम बदलकर 'विकसित भारत गारंटी फ़ॉर रोज़गार और आजीविका मिशन ग्रामीण 2025' (VB-GRAM JI) करना केवल नामकरण का मामला नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और गरीबों के संवैधानिक हक पर सीधा हमला है।

हैरत की बात यह है कि जिस 'राम' के नाम पर राजनीति की जा रही है, उसी नाम का सहारा लेकर एक ऐसी योजना को पंगु बनाने की तैयारी है जिसने कोरोना काल में करोड़ों घरों के चूल्हे जलाए थे। 'जी राम जी' (GRAM JI) के संक्षिप्त नाम से सरकार की मंशा स्पष्ट है—वह महात्मा गांधी के ऐतिहासिक प्रभाव को मिटाकर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के कॉकटेल से ग्रामीण मतदाताओं को लुभाना चाहती है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस प्रधानमंत्री ने कभी इसी मनरेगा को 'कांग्रेस की विफलता का जीवित स्मारक' और 'गड्ढा खोदने वाली योजना' बताया था, आज वे उसी की संरचना बदलने के लिए इतने बेताब क्यों हैं?

विपक्ष का यह आरोप बेबुनियाद नहीं लगता कि सरकार ग्राम पंचायतों के अधिकारों को छीनकर सत्ता का केंद्रीकरण करना चाहती है। नए विधेयक में 'नॉर्मेटिव फंडिंग' (Normative Funding) का प्रावधान असल में ग्रामीण भारत के लिए 'डेथ वारंट' जैसा है। अब फंड मांग के आधार पर नहीं, बल्कि दिल्ली में बैठे बाबूओं द्वारा तय मानकों पर मिलेगा। यानी अगर किसी गांव में सूखा पड़ा है और वहां काम की मांग बढ़ी है, तो भी केंद्र उतना ही पैसा देगा जितना उसने पहले से तय कर रखा है। यह पंचायतों की स्वायत्तता को कुचलने और रोजगार के अधिकार को 'खैरात' में बदलने की साजिश है।

राज्यों पर वित्तीय बोझ डालना केंद्र की एक और चालाकी है। एक तरफ राज्यों को उनका जीएसटी बकाया समय पर नहीं मिलता, दूसरी तरफ 'जी राम जी' में केंद्र के योगदान को 60 प्रतिशत तक कम कर दिया गया है। यह सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के ताबूत में आखिरी कील जैसा है। अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी की चिंताएं जायज हैं—महंगाई के इस दौर में मानदेय बढ़ाने और रोजगार की सुरक्षा देने के बजाय सरकार 'ब्रांडिंग' पर करोड़ों खर्च कर रही है। यहां तक कि सरकार की सहयोगी टीडीपी भी इस फंडिंग पैटर्न पर सशंकित है, जो बताता है कि सरकार ने अपने सहयोगियों को भी अंधेरे में रखा है।

'विकसित भारत 2047' का सपना तब तक एक मृगतृष्णा है, जब तक 2025 का भारत बेरोजगार और भूखा है। पकौड़ा तलने और रील बनाने को रोजगार बताने वाली सरकार अब उस अंतिम सुरक्षा तंत्र को भी नष्ट कर रही है जो गरीबों को गरिमापूर्ण जीवन देता था। महात्मा गांधी का नाम हटाना केवल एक नाम का हटना नहीं है, बल्कि उस 'अन्त्योदय' की भावना का अंत है जिसकी दुहाई भाजपा अक्सर देती है। सरकार को समझना चाहिए कि योजनाएं नाम बदलने से नहीं, नीयत साफ रखने से सफल होती हैं।