कौशल-आधारित शिक्षा बनाम कौशल-सम्मानित अर्थव्यवस्था: एक विश्लेषण

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


कौशल-आधारित शिक्षा बनाम कौशल-सम्मानित अर्थव्यवस्था: एक विश्लेषण

आज भारत के शैक्षिक और आर्थिक परिदृश्य में 'स्किल-बेस्ड एजुकेशन' (कौशल-आधारित शिक्षा) एक जादुई शब्द बन गया है। नीति निर्माताओं से लेकर अर्थशास्त्रियों तक, हर कोई इसे बेरोजगारी का रामबाण इलाज मान रहा है। लेकिन, क्या भारत वास्तव में 'कौशल की कमी' (Skill-Deficit) से जूझ रहा है, या समस्या कहीं और गहरी है? इस पर एक विस्तृत विमर्श की आवश्यकता है।

1. शैक्षणिक दृष्टिकोण: प्रमाणन और औपचारिकता का संकट

शैक्षणिक रूप से भारत की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ 'ज्ञान' और 'डिग्री' के बीच एक गहरी खाई है।

अदृश्य कौशल (Invisible Skills): भारत के हर गली-कूचे में टेलर, इलेक्ट्रीशियन, मैकेनिक और कारीगर मौजूद हैं। इनके पास पीढ़ियों का अनुभव है, लेकिन उनके पास किसी विश्वविद्यालय का 'सर्टिफिकेट' नहीं है। 

शिक्षा प्रणाली की विफलता: हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने दशकों तक छात्रों को केवल क्लर्क बनने या डिग्री हासिल करने के लिए प्रेरित किया है। जब डिग्रियां रोजगार दिलाने में विफल रहीं, तो अचानक 'स्किल' का शोर मच गया।

 समाधान: शिक्षा को केवल प्रशिक्षण (Training) तक सीमित न रखकर उसे प्रमाणन (Certification) से जोड़ना होगा। 'रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग' (RPL) जैसे कार्यक्रमों को जमीनी स्तर पर लाना होगा ताकि एक अनुभवी बढ़ई या राजमिस्त्री को भी वही शैक्षणिक सम्मान मिले जो एक इंजीनियर को मिलता है।

2. सामाजिक दृष्टिकोण: श्रम का सम्मान और वर्ग भेद

भारत में कौशल की समस्या तकनीकी कम, सामाजिक अधिक है। यहाँ काम के आधार पर सामाजिक श्रेणी (Social Hierarchy) तय की जाती है।

नज़रिए का फर्क: यदि कोई यूरोपीय नागरिक लकड़ी का काम करे, तो उसे 'डिज़ाइनर' या 'क्रॉफ्ट्समैन' कहा जाता है। वही काम जब कोई भारतीय करता है, तो उसे 'मजदूर' या 'दिहाड़ीदार' की श्रेणी में डाल दिया जाता है।

अनौपचारिक क्षेत्र और हाशिए के समाज: भारत के स्किल्ड वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर मुस्लिम समुदाय और दलित वर्ग, टेलरिंग, ज़री-ज़रदोजी, मेटल क्राफ्ट और लेदर वर्क जैसे क्षेत्रों में लगा हुआ है। इनके पास हुनर की पराकाष्ठा है, लेकिन सामाजिक और ढांचागत बाधाओं के कारण इन्हें 'लेबर' मानकर शोषण किया जाता है। सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility): जब तक समाज शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति को हिकारत की नज़र से देखेगा, तब तक कोई भी स्किल-बेस्ड पॉलिसी सफल नहीं होगी। हमें 'डिस्पोजेबल लेबर' की मानसिकता से बाहर निकल कर कामगार को 'स्टेकहोल्डर' (हितधारक) मानना होगा।

3. व्यक्तित्व विकास: 'मजदूर' से 'उद्यमी' बनने का सफर

कौशल आधारित शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए।

उद्यमिता का अभाव (Lack of Entrepreneurship): एक कुशल टेलर अपना ब्रांड क्यों नहीं बना पाता? एक मैकेनिक गैरेज की चेन क्यों नहीं खोल पाता? इसका कारण कौशल की कमी नहीं, बल्कि वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) और आत्मविश्वास की कमी है।

सॉफ्ट स्किल्स और ग्लोबल एक्सेस: व्यक्तित्व विकास के अंतर्गत कारीगरों को यह सिखाना अनिवार्य है कि वे अपने हुनर को ग्लोबल मार्केट (जैसे Etsy, Amazon या इंटरनेशनल एक्सपोर्ट) तक कैसे ले जाएं।

 पूंजी तक पहुंच: बिना क्रेडिट एक्सेस (आसान ऋण) के, कौशल केवल पेट भरने का साधन बना रहता है, साम्राज्य खड़ा करने का नहीं।

4. आर्थिक संरचना: 'स्किल-रिस्पेक्टिंग इकोनॉमी' की जरूरत

भारत को केवल 'स्किल-बेस्ड एजुकेशन' की नहीं, बल्कि 'स्किल-रिस्पेक्टिंग इकोनॉमी' की आवश्यकता है। इसके लिए तीन स्तंभ अनिवार्य हैं:

 Credit Access --- छोटे कारीगरों को बिना किसी जटिल कागजी कार्रवाई के सस्ता ऋण मिले। |

Market Linkage --- स्थानीय हुनर को ई-कॉमर्स और ग्लोबल सप्लाई चेन से जोड़ना। |

 Policy Framework --- ऐसी नीतियां जो केवल बड़े कॉर्पोरेट्स के लिए 'सस्ता वर्कफोर्स' तैयार न करें, बल्कि सूक्ष्म उद्योगों को सुरक्षा दें। |

 क्या यह सिर्फ एक कॉस्मेटिक बदलाव है?

अगर हम केवल नाम बदलेंगे या पुराने कामगारों को 'ट्रेंड मजदूर' का टैग दे देंगे, तो कुछ नहीं बदलेगा। भारत की असली बीमारी 'हुनर की कमी' नहीं, बल्कि 'हुनर की कद्र की कमी' है।

असली बदलाव तब आएगा जब एक वेल्डर या कारपेंटर का बेटा गर्व से अपने पिता के पेशे को अपना सके और उसे समाज में वही प्रतिष्ठा मिले जो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर को मिलती है। जब तक स्ट्रक्चरल बदलाव (बैंकिंग, पॉलिसी और सामाजिक सोच) नहीं होगा, तब तक हर नया शैक्षिक सुधार केवल एक 'वायरल बयान' बनकर रह जाएगा।