जब हवा से ज्यादा 'खबरें' जहरीली हो जाएं – मीडिया का नैतिक प्रदूषण
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब हवा से ज्यादा 'खबरें' जहरीली हो जाएं – मीडिया का नैतिक प्रदूषणभारत आज केवल वायुमंडलीय प्रदूषण (AQI) की मार नहीं झेल रहा, बल्कि वह एक अधिक खतरनाक 'सूचनात्मक प्रदूषण' के दौर से गुजर रहा है। देश की राजधानी और उत्तर भारत के बड़े हिस्से जब 500 के पार पहुँच चुके जानलेवा एक्यूआई (AQI) में दम घोंटने को मजबूर हैं, तब हमारे 'लोकतंत्र के प्रहरियों' का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के चरणों में 'प्रचारक' बनकर लेटा हुआ है। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता के पतन को दर्शाती है, बल्कि लोकतंत्र की नसों में धीमा जहर घोलने जैसा है।
1. वाचडॉग से 'प्रचारक' तक का सफर
पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से कठिन सवाल पूछना और जनता की समस्याओं को नीति-निर्माण के केंद्र में लाना है। लेकिन आज के अखबारों और टीवी चैनलों की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं।
एक्यूआई बनाम वीबी-जी राम जी: जब दिल्ली 'गैस चैंबर' बनी हुई है, तब देश के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबारों की 'लीड' यह होती है कि सरकार मनरेगा (MGNREGA) का नाम बदलकर उसे 'जी राम जी' (VB-G RAM G) योजना करने वाली है। यह 'हेडलाइन मैनेजमेंट' की पराकाष्ठा है। गांधी का नाम हटाकर राम का नाम जोड़ना एक ऐसी भावनात्मक ढाल तैयार करना है, जिससे योजना की विफलता और बजट कटौती पर कोई सवाल न उठा सके। मीडिया इस चाल को बेनकाब करने के बजाय उसका 'महिमामंडन' कर रहा है।
2.सत्य की 'नसबंदी' और आंकड़ों का खेल
प्रदूषण के मामले में मीडिया का रवैया आपराधिक लापरवाही जैसा है।
सत्य को सीमित करना: भारतीय मानकों (CPCB) के अनुसार 500 का स्तर 'गंभीर' है और सिस्टम इसके ऊपर की रीडिंग सार्वजनिक नहीं करते। मीडिया को यह सवाल उठाना चाहिए था कि क्या यह जनता को अंधेरे में रखने की साजिश है? अगर अंतरराष्ट्रीय मानकों पर प्रदूषण 800 है, तो उसे 500 बताकर 'नॉर्मलाइज' करना पाठकों के साथ विश्वासघात है।
गरीबों की अनदेखी: प्रदूषण की सबसे ज्यादा मार उन पर पड़ती है जो सड़कों पर काम करते हैं या झुग्गियों में रहते हैं। लेकिन मीडिया के लिए खबर तब बनती है जब 'मेस्सी' या 'मोदी' का विमान कोहरे में फंसता है।
3. विचारधारा और व्यावसायिक हितों का द्वंद्व
आज का मीडिया संस्थान अब केवल 'न्यूज रूम' नहीं, बल्कि 'कॉर्पोरेट ऑफिस' बन चुके हैं।
विज्ञापन का दबाव: बड़े प्रदूषक उद्योग और सरकारें विज्ञापन के सबसे बड़े स्रोत हैं। ऐसे में उनकी नीतियों के खिलाफ बोलना व्यावसायिक आत्महत्या माना जाता है।
विचारधारा का चश्मा: कुछ अखबार अपनी विचारधारा के प्रति इतने वफादार हैं कि उन्हें रामलीला मैदान में लगे किसी 'अनाम' शख्स के नारों पर माफीनामा माँगना ज्यादा बड़ी खबर लगती है, बजाय उस जहरीली हवा के जो हर साल 17 लाख भारतीयों की जान ले रही है।
4. बेरोजगारी और हाशिए के मुद्दे मनरेगा जैसी योजनाएं देश के करोड़ों गरीबों के लिए जीवनदान हैं। सरकार जब इस योजना की शर्तों को कठिन बना रही है और राज्यों पर 40% भुगतान का बोझ डाल रही है, तो यह 'ग्रामीण अर्थव्यवस्था' की रीढ़ तोड़ने जैसा है। लेकिन मीडिया इसे 'रिफॉर्म' (सुधार) के नाम पर बेच रहा है। बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दे को 'हिंदू-मुस्लिम' या 'मंदिर-मस्जिद' की बहसों के नीचे दफन कर दिया गया है।
# जागने का समय यदि मीडिया अपनी भूमिका 'वॉचडॉग' से 'लैपडॉग' (गोद का कुत्ता) में बदल लेगा, तो जनता के पास अपनी बात पहुँचाने का कोई मंच नहीं बचेगा। प्रदूषण तो शायद बारिश आने पर कम हो जाए, लेकिन जो प्रदूषण मीडिया की निष्पक्षता में घुस चुका है, उसे साफ करने के लिए पाठकों को जागरूक होना होगा।
हमें ऐसे मीडिया की जरूरत है जो सरकार से यह पूछे कि "हम सांस कैसे लें?", न कि यह बताए कि "योजना का नाम राम के नाम पर रखने से विकास कैसे होगा?" जब तक जनता अखबारों की 'प्रायोजित' खबरों और 'वास्तविक' समस्याओं के बीच के अंतर को नहीं समझेगी, तब तक हम एक ऐसे अंधे कुएं की ओर बढ़ते रहेंगे जहाँ केवल सत्ता का शोर होगा और जनता की सिसकियाँ दब जाएंगी।
