ब्रिटिश शासन के समय एक ब्रिटिश अफ़सर ने एक भारतीय युवक के चेहरे पर थप्पड़ मारा।

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

ब्रिटिश शासन के समय एक ब्रिटिश अफ़सर ने एक भारतीय युवक के चेहरे पर थप्पड़ मारा।

तुरंत ही युवक ने भी अपनी पूरी ताकत से उस ब्रिटिश अफ़सर को इतना ज़ोरदार थप्पड़ मारा कि अफ़सर ज़मीन पर गिर पड़ा।

इस अपमान से स्तब्ध होकर अफ़सर सोचने लगा – एक साधारण भारतीय युवक कैसे उस साम्राज्य के सेना अधिकारी को थप्पड़ मार सकता है जिसके बारे में कहा जाता है कि उस साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता।

वह तुरंत अपनी पोस्ट पर गया और उस भारतीय को कड़ी सज़ा देने की मांग की।

लेकिन उच्च पदस्थ कमांडर ने उसे शांत करते हुए कहा – उस भारतीय युवक को सज़ा नहीं, बल्कि पुरस्कार देना चाहिए। और पुरस्कार के रूप में उसे दस हज़ार रुपए उपहार में देने चाहिए।

अफ़सर ने घृणा से चिल्लाकर कहा – यह सिर्फ मेरा या आपका नहीं, बल्कि ब्रिटिश महारानी का भी अपमान है। और आप कह रहे हैं कि उसे सज़ा देने की बजाय उसे पुरस्कार दिया जाए!

कमांडर ने दृढ़ आवाज़ में कहा – यह एक सैन्य आदेश है और तुम्हें इसे बिना देर किए पालन करना होगा।

जूनियर अफ़सर को कमांडर का आदेश मानना पड़ा। वह दस हज़ार रुपए लेकर उस भारतीय युवक के पास गया और बोला – कृपया मुझे माफ़ कर दें और इन दस हज़ार रुपए को उपहार के रूप में स्वीकार करें।

भारतीय युवक ने उपहार स्वीकार कर लिया और भूल गया कि उसे अपनी ही धरती पर एक उपनिवेशवादी अफ़सर के हाथों थप्पड़ खाना पड़ा था।

उस समय दस हज़ार रुपए बहुत बड़ी रकम थी। उसने उस धन का सही उपयोग किया और कुछ वर्षों में अपनी ज़िंदगी सुधार कर काफी संपन्न हो गया।

पहले वह एक साधारण युवक था, लेकिन अब समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति बन चुका था।

कई वर्षों बाद वही अंग्रेज़ कमांडर अपने जूनियर अफ़सर को बुलाकर बोला – क्या तुम्हें वह भारतीय याद है जिसने तुम्हें थप्पड़ मारा था?

अफ़सर ने कहा – वह अपमान मैं कैसे भूल सकता हूँ?

कमांडर ने कहा – अब समय आ गया है। तुम उसे ढूंढो और सबके सामने जाकर उसे ज़ोरदार थप्पड़ मार कर आओ।

अफ़सर बोला – यह कैसे संभव है? जब वह गरीब था तब उसने पलटवार किया। अब जब वह अमीर हो चुका है तो वह मुझे मार ही डालेगा।

कमांडर ने कहा – मैं जो कह रहा हूं, वही करो। यह भी तुम्हारे ऊपर आदेश है।

जूनियर अफ़सर को आदेश का पालन करना पड़ा। वह उस भारतीय युवक के पास गया और उसे ज़ोर से थप्पड़ मारा।

लेकिन इस बार बिल्कुल उल्टा हुआ।

भारतीय युवक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। यहां तक कि वह हिम्मत करके अफ़सर की ओर देखने तक की स्थिति में नहीं था।

अफ़सर हैरान होकर वापस कमांडर के पास पहुंचा।

कमांडर ने पूछा – मैं तुम्हारे चेहरे पर आश्चर्य देख रहा हूँ। तुम इतने हैरान क्यों हो?

अफ़सर ने कहा – जब वह गरीब था तब उसने पलटकर वार किया था। लेकिन आज जब वह संपन्न है तो वह आंख उठाकर देखने तक की हिम्मत नहीं कर पाया। यह कैसे संभव है?

अंग्रेज़ कमांडर ने धीमी आवाज़ में कहा – पहली बार उसके पास उसकी इज़्ज़त के अलावा कुछ नहीं था।

वह उसे सबसे मूल्यवान समझता था और उसकी रक्षा के लिए वह जान जोखिम में डालकर भी लड़ गया।

लेकिन अब उसने उसकी रक्षा नहीं की, क्योंकि अब उसके पास उसकी इज़्ज़त से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका धन है।

जिस दिन उसने दस हज़ार रुपए उपहार में स्वीकार किए, उसी दिन उसने अपनी आत्मसम्मान और इज़्ज़त को रुपयों के आगे बेच दिया।

और जब इंसान का आत्मसम्मान बिक जाता है, तो उसकी रीढ़ की हड्डी भी झुक जाती है।

आत्मसम्मान बनाए रखें।

पद, उपहार या किसी लालच में खुद को बेचने के बजाय अपनी रीढ़ सीधी रखें।