जन्म का अधिकार और सम्मानजनक बुढ़ापा: एक नए सामाजिक अनुबंध की आवश्यकता

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


जन्म का अधिकार और सम्मानजनक बुढ़ापा: एक नए सामाजिक अनुबंध की आवश्यकता

## वृद्धावस्था और राज्य की नैतिक विफलता

भारत में पेंशन पर विमर्श अक्सर श्मशान की शांति जैसा होता है—ठंडा और औपचारिकता से भरा। जब एक नागरिक अपनी आयु के छठे दशक में प्रवेश करता है, तब राज्य उसे ₹500 या ₹1000 की 'भीख' थमाता है और इसे गर्व से 'सामाजिक सुरक्षा' का नाम देता है। यह न केवल आर्थिक रूप से अपर्याप्त है, बल्कि मानवीय गरिमा का अपमान भी है। प्रश्न यह है कि क्या वृद्धावस्था की सुरक्षा राज्य की 'दया' होनी चाहिए या नागरिक के जीवनभर के 'सामाजिक निवेश' का प्रतिफल? यदि भारत को वास्तव में एक विकसित राष्ट्र (Viksit Bharat) बनना है, तो पेंशन की चिंता साठ की उम्र में नहीं, बल्कि जन्म के पहले क्रंदन के साथ शुरू होनी चाहिए।

## आर्थिक परिप्रेक्ष्य: चक्रवृद्धि ब्याज की शक्ति और पूंजी निर्मा

आर्थिक दृष्टि से यह मॉडल 'चक्रवृद्धि ब्याज' (Compounding) के गणितीय चमत्कार पर आधारित है।

 गणित का तर्क: यदि राज्य प्रत्येक नवजात के नाम पर ₹25,000 का एकमुश्त निवेश राष्ट्रीय सूचकांक (Index Fund) में करता है, तो 12% की औसत वार्षिक वृद्धि के साथ 60 वर्षों में यह राशि लगभग ₹2.24 करोड़ हो जाती है।

राजकोषीय बुद्धिमत्ता: वर्तमान में सरकारें प्रतिवर्ष खरबों रुपये ऐसी सब्सिडी में खर्च करती हैं जो उपभोग (Consumption) में खत्म हो जाती हैं। इसके विपरीत, जन्म-आधारित निवेश देश के शेयर बाजार को दीर्घकालिक स्थिर पूंजी (Long-term Capital) प्रदान करेगा, जो बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास को गति देगा। यह 'खर्च' नहीं, बल्कि 'संपत्ति निर्माण' (Asset Creation) है।

## सामाजिक परिप्रेक्ष्य: असंगठित क्षेत्र का सशक्तिकरण

भारत की 90% से अधिक कार्यशक्ति असंगठित क्षेत्र में है, जहाँ न ईपीएफ (EPF) है और न ही सामाजिक सुरक्षा।

 निर्भरता का अंत: वर्तमान सामाजिक ढाँचे में बुजुर्ग या तो बच्चों की मर्जी पर निर्भर हैं या सरकारी खैरात पर। जन्म-आधारित मॉडल इस शक्ति संतुलन को बदल देता है।

सम्मान का सार्वभौमीकरण: यह मॉडल सुनिश्चित करता है कि एक रिक्शा चालक और एक उच्चाधिकारी, दोनों का बुढ़ापा समान रूप से गरिमामय हो। यह सामाजिक असमानता की खाई को पाटने का सबसे प्रभावी उपकरण सिद्ध हो सकता है।

## राजनैतिक परिप्रेक्ष्य: 'रेवड़ी संस्कृति' बनाम 'दूरदर्शी निवेश'

भारतीय राजनीति वर्तमान में 'अल्पकालिक लाभ' (Short-term gains) के संकट से जूझ रही है। चुनावी लाभ के लिए मुफ्त बिजली और नकदी बांटना आसान है, लेकिन 60 साल बाद के भारत की योजना बनाना कठिन।

 प्राथमिकता का प्रश्न: प्रतिवर्ष ₹6 लाख करोड़ का निवेश बड़ा लग सकता है, लेकिन जब हम कॉर्पोरेट टैक्स छूट और गैर-निष्पादित आस्तियों (NPA) के बोझ को देखते हैं, तो यह राशि असंभव नहीं लगती।

 वोट बैंक से राष्ट्र निर्माण: राजनैतिक दलों को 'लोक-लुभावनवाद' से निकलकर 'लोक-कल्याणवाद' की ओर बढ़ना होगा। यह योजना किसी एक दल की नहीं, बल्कि राज्य और नागरिक के बीच एक स्थायी और पवित्र 'सामाजिक अनुबंध' (Social Contract) होनी चाहिए।

 संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: अनुच्छेद 21 और गरिमापूर्ण जीवन

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को 'गरिमा के साथ जीने का अधिकार' देता है।

राज्य का कर्तव्य: यदि राज्य जन्म के समय आधार कार्ड और अनिवार्य टीकाकरण सुनिश्चित कर सकता है, तो वह आर्थिक सुरक्षा का 'बीज' क्यों नहीं बो सकता?

पेंशन एक अधिकार: यह मॉडल पेंशन को 'एहसान' की श्रेणी से निकालकर 'संवैधानिक अधिकार' की श्रेणी में खड़ा करता है। यह उस 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की परिकल्पना को साकार करता है जिसका सपना हमारे संविधान निर्माताओं ने देखा था।

 भविष्य का आह्वान

पेंशन का प्रश्न बुढ़ापे की लाचारी का नहीं, बल्कि जन्म की संभावनाओं का है। भारत एक युवा देश है, लेकिन यदि आज हमने दूरदर्शिता नहीं दिखाई, तो भविष्य में हम एक 'असुरक्षित बुजुर्ग समाज' बन जाएंगे। ₹25,000 का यह निवेश दरअसल वह मूल्य है जो हम एक नागरिक के सम्मान के लिए चुकाते हैं।

नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि विकसित राष्ट्र केवल ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि अपने सबसे कमजोर और वृद्ध नागरिकों के चेहरों पर मौजूद 'आर्थिक निश्चिंतता' से पहचाना जाता है। समय आ गया है कि हम 'आज की चोरी' और 'कल की उधारी' से ऊपर उठकर एक ऐसे भारत की नींव रखें जहाँ जन्म लेते ही नागरिक का भविष्य सुरक्षित हो।

"क्या भारत इस साहसिक छलांग के लिए तैयार है? यह वित्तीय क्षमता से अधिक राजनैतिक इच्छाशक्ति का सवाल है।"