आंकड़ों की 'ग्लोबल' चमक और हकीकत का 'लोकल' अंधेरा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


आंकड़ों की 'ग्लोबल' चमक और हकीकत का 'लोकल' अंधेरा

"जब 'वर्ल्ड लीडर' बनने की होड़ में न्याय, सुरक्षा और शुचिता पीछे छूट जाए, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र केवल कागजों पर 'मुक्त' है।"

आज का भारत एक अजीबोगरीब विरोधाभास में जी रहा है। एक तरफ न्यूज़ीलैंड जैसे छोटे देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को 'ऐतिहासिक उपलब्धि' बताकर 20 अरब डॉलर के निवेश का सपना दिखाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ देश के भीतर पूर्व आईजी जैसे वरिष्ठ अधिकारी साइबर ठगी से इतने लाचार हैं कि उन्हें खुद को गोली मारनी पड़ती है। यह चमकता हुआ 'ग्लोबल' मुखौटा दरअसल उस अंदरूनी 'लोकल' क्षरण को छिपाने की कोशिश है, जहाँ संस्थाएं, कानून और नैतिकता धीरे-धीरे दम तोड़ रहे हैं।

1. एफटीए का अर्थशास्त्र: बड़े बाजार की विफलता, छोटे का उत्सव

न्यूज़ीलैंड और ओमान जैसे देशों (जिनकी आबादी बमुश्किल 50-55 लाख है) के साथ करार को जिस तरह 'मास्टरस्ट्रोक' बताया जा रहा है, वह आधा सच है।

 डेयरी का पेंच: द टेलीग्राफ की रिपोर्ट ने सरकार की उस मजबूरी को उजागर कर दिया है जिसे बाकी मीडिया छिपा रहा है। अमेरिका के साथ व्यापारिक करार इसलिए अटका है क्योंकि वह भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्र में प्रवेश चाहता है। न्यूज़ीलैंड से करार में डेयरी को बाहर रखना स्थानीय किसानों के लिए राहत तो है, लेकिन न्यूज़ीलैंड के नेताओं का यह कहना कि 'उन्हें उतना फायदा नहीं होगा', यह बताता है कि यह करार आर्थिक से ज्यादा 'राजनैतिक हेडलाइन' बटोरने के लिए है।

 अमेरिका से दूरी: जब दुनिया के सबसे बड़े बाजार (अमेरिका) ने भारत पर उच्च टैरिफ लगा रखा है, तब छोटे बाजारों का विविधीकरण एक अच्छी रणनीति हो सकती है, लेकिन इसे 'ऐतिहासिक' बताकर प्रचारित करना असल विफलता से ध्यान भटकाने जैसा है।

2. संस्थागत लाचारी और 'जी राम जी' का भ्रम

देश की सुरक्षा व्यवस्था की पोल दो घटनाओं ने खोल दी है।

आईजी की आत्महत्या की कोशिश: अगर एक पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (IG) साइबर ठगों के सामने इतना बेबस है कि उसे प्रधानमंत्री को सुसाइड नोट लिखकर जान देने की कोशिश करनी पड़े, तो आम नागरिक की सुरक्षा की कल्पना भी डरावनी है। यह बताता है कि 'डिजिटल इंडिया' में अपराध तकनीक से लैस है और हमारा सिस्टम पुराना।

 अखलाक हत्याकांड: दादरी के मोहम्मद अखलाक हत्याकांड (2015) के आरोपियों के खिलाफ यूपी पुलिस द्वारा मामला वापस लेने की अपील करना संविधान की मूल भावना और 'रूल ऑफ लॉ' पर सीधा प्रहार है। जब न्याय सत्ता की सुविधा के अनुसार बदला जाने लगे, तो 'लोकतंत्र' केवल एक शब्द रह जाता है।

3. सांस्कृतिक अहंकार और प्रशासनिक दमघोंटू माहौल

दिल्ली के पटपड़गंज की भाजपा पार्षद रेणु चौधरी का एक विदेशी को 'हिन्दी सीखो' कहकर धमकाना उस 'सांस्कृतिक अहंकार' का प्रतीक है, जो वैश्विक मंच पर भारत की 'सॉफ्ट पावर' को ज़हरीला बना रहा है।

आईआईआईटीके के निदेशक का इस्तीफा: दिल्ली के उपराज्यपाल (LG) कार्यालय के हस्तक्षेप और कारण बताओ नोटिस के कारण एक प्रतिष्ठित संस्थान के निदेशक का इस्तीफा देना यह बताता है कि कैसे वैधानिक कर्तव्यों के नाम पर शोध और विदेशी फंडिंग को नौकरशाही की बेड़ियों में जकड़ा जा रहा है।

अरावली का आंदोलन: राजस्थान में अरावली को बचाने के लिए चल रहा जन-आंदोलन और पुलिस के साथ भिड़ंत यह साबित करती है कि 'विकास' के नाम पर खनन माफिया और सत्ता के बीच का गठजोड़ अब जनता के सब्र का बांध तोड़ रहा है।

संसद में चुनाव सुधारों पर चर्चा हो या न्यूज़ीलैंड के साथ व्यापारिक करार, सरकार की हर गतिविधि में 'प्रचार' का तत्व 'तथ्य' से बड़ा होता जा रहा है। मनरेगा को 'जी राम जी' बनाने का प्रयोग हो या अरावली में 2% खनन की छूट, यह सब 'सहमति' के बजाय 'थोपे गए निर्णयों' की श्रृंखला है। अगर देश के भीतर कानून का राज कमज़ोर होता रहेगा और न्याय पक्षपाती होगा, तो न्यूज़ीलैंड जैसे सौ करारों के बाद भी हम वैश्विक गुरु नहीं, बल्कि केवल एक 'हेडलाइन मैनेज्ड' राष्ट्र बनकर रह जाएंगे।