पड़ोस में सुलगती आग और कूटनीति की कसौटी

 लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla


पड़ोस में सुलगती आग और कूटनीति की कसौटी

आज भारत-बांग्लादेश संबंध उस मुहाने पर खड़े हैं जहाँ एक गलत कदम दशकों की दोस्ती को स्थायी दुश्मनी में बदल सकता है। 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद यह पहली बार है जब ढाका में 'भारत-विरोध' को न केवल गलियों में शोर मिला है, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी इसे मौन सहमति मिल रही है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार, जिसे लोकतंत्र की बहाली का जिम्मा सौंपा गया था, वह अब पश्चिम की भू-राजनीतिक शतरंज का एक मोहरा बनती दिख रही है।

अमेरिकी राजदूत के साथ यूनुस की बातचीत और शेख हसीना पर लगाए गए ताजा आरोप यह संकेत देते हैं कि आने वाले चुनावों से अवामी लीग को बाहर रखने की पूरी 'ग्राउंड कोडिंग' तैयार कर ली गई है। यदि बांग्लादेश में चुनाव 'समावेशी' नहीं होते, तो यह लोकतंत्र नहीं बल्कि एक विचारधारा का दूसरी विचारधारा पर अधिरोपण होगा।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो पश्चिम मानवाधिकारों का झंडा बुलंद करता है, वह 'इंकलाब मंच' जैसे कट्टरपंथी संगठनों की हिंसा पर चुप्पी साधे हुए है। शरीफ उस्मान हादी की मौत पर शोक और दीपू दास की लिंचिंग पर मौन, पश्चिमी कूटनीति के दोहरे चरित्र को नंगा करता है। ऐसे में रूस का 1971 की याद दिलाना भारत के लिए एक कूटनीतिक संबल है, जो यह याद दिलाता है कि भूगोल बदला नहीं जा सकता।

बांग्लादेश को यह समझना होगा कि उसकी 94% सीमा भारत से सटी है। वह चारों तरफ से जिस देश से घिरा है, उससे दुश्मनी मोल लेकर वह अपना आर्थिक भविष्य सुरक्षित नहीं रख सकता। तारिक रहमान की वापसी और बीएनपी का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए 'सल्तनत-ए-पाकिस्तान 2.0' जैसी चुनौती पेश कर सकता है।

दिल्ली के लिए अब 'वेट एंड वॉच' का समय समाप्त हो रहा है। भारत को अपनी सुरक्षा और पूर्वोत्तर की स्थिरता के लिए न केवल कूटनीतिक दबाव बढ़ाना होगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बांग्लादेश में हो रहे अल्पसंख्यक उत्पीड़न और कट्टरपंथ के उभार को प्रमाणों के साथ रखना होगा। पड़ोस में एक और पाकिस्तान का जन्म न हो, यह केवल भारत की नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की शांति के लिए अनिवार्य है।

बांग्लादेश में कट्टरपंथ का नया चेहरा: 'इंकलाब मंच' और भारत-विरोध

शेख हसीना के पतन के बाद बांग्लादेश में जो राजनीतिक शून्य पैदा हुआ, उसे भरने के लिए 'इंकलाब मंच' जैसे नए और उग्र संगठन तेजी से उभरे हैं। यह समूह केवल एक राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि बांग्लादेश की सामाजिक और कूटनीतिक पहचान को पूरी तरह बदलने की कोशिश कर रहा है।

इंडिया आउट' कैंपेन: इंकलाब मंच और शरीफ उस्मान हादी जैसे नेताओं ने 'बॉयकॉट इंडिया' अभियान को हवा दी। इनका उद्देश्य व्यापारिक निर्भरता खत्म करने के बहाने भारत के प्रति नफरत फैलाना है।

 1971 की भावना को चुनौती: ये समूह 1971 के मुक्ति संग्राम की धर्मनिरपेक्ष विरासत को 'भारतीय थोपी हुई विचारधारा' बताकर खारिज करते हैं और बांग्लादेश को एक कट्टर इस्लामी राष्ट्र के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।

 अल्पसंख्यकों पर दबाव: दीपू दास जैसी मॉब लिंचिंग की घटनाओं को ये संगठन अक्सर "जनता का गुस्सा" बताकर जायज ठहराते हैं, जिससे हिंदू अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का माहौल बना है।

 विदेशी सांठगांठ: यह चिंताजनक है कि जहाँ पाकिस्तान और चीन इन समूहों को खाद-पानी दे रहे हैं, वहीं पश्चिमी देश मानवाधिकारों की आड़ में इनके प्रति नरम रुख अपनाए हुए हैं।