अवध और अवधी साहित्य में नारी: पूजा से शक्ति, समानता और आत्म-बोध का आध्यात्मिक सफर
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
अवध और अवधी साहित्य में नारी: पूजा से शक्ति, समानता और आत्म-बोध का आध्यात्मिक सफर
आपका सिद्धांत कि प्रगति का वास्तविक पैमाना नारी की मानवीय समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, अवध की भूमि पर और भी गहरा और अधिक आध्यात्मिक अर्थ ग्रहण करता है। अवध, जो राम और सीता की भूमि है, केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के नैतिक और आध्यात्मिक आदर्शों का केंद्र है।
अवध और अवधी साहित्य की महानता का गौरव केवल नारी की 'पूजा' या 'देवत्व' में नहीं, बल्कि उसे दिए गए 'आत्म-बोध' और 'पूर्ण अभिव्यक्ति' के अधिकार में निहित है।
1. साहित्यिक आध्यात्मिकता: सीता का आत्म-बोध और अभिव्यक्ति
अवधी साहित्य का शिखर, रामचरितमानस, नारी के चित्रण को उच्चतम आध्यात्मिक ऊँचाई पर ले जाता है, जहाँ 'पूजा' से अधिक आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता की महत्ता है।
सीता का मौन और शक्ति: सीता को अक्सर आदर्श रूप में केवल 'पूज्यनीय' त्याग की मूर्ति माना जाता है। किंतु, आध्यात्मिक गहराई में सीता का चरित्र 'मौन' में भी अपनी शक्ति अभिव्यक्त करता है। उनका संघर्ष, वनवास में उनकी दृढ़ता और अग्नि-परीक्षा का अस्वीकरण (एक व्याख्या के अनुसार), यह दर्शाता है कि नारी शक्ति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि भीतर के 'आत्म-बोध' से संचालित होती है।
अवधी भक्ति काव्य में द्वैत: मध्यकालीन अवधी भक्ति साहित्य, विशेष रूप से सगुण भक्ति (रामभक्ति) में, नारी को शक्ति (आदि शक्ति) और प्रकृति (प्रकृति पुरुष) के द्वैत में देखा गया। यहाँ नारी केवल श्रद्धा का पात्र नहीं है, बल्कि वह वह शक्ति है जिसके बिना पुरुष (राम) की लीला पूर्ण नहीं हो सकती।
प्रेमगाथाओं में साधिका: मलिक मुहम्मद जायसी की 'पद्मावत' जैसी अवधी प्रेमाख्यानों में नारी (पद्मावती) को केवल एक रूप नहीं, बल्कि साधना और आध्यात्मिक लक्ष्य (परमात्मा) के रूप में चित्रित किया गया है। यहाँ नायिका पुरुष पात्र (रत्नसेन) की मोक्ष की साधिका और प्रेरणा बनती है। यह चित्रण नारी को निष्क्रिय वस्तु के बजाय सक्रिय आध्यात्मिक मार्गदर्शिका के रूप में स्थापित करता है।
2. नैतिक और शैक्षणिक प्रगति: समाज का 'राम-राज्य'
अवध की प्रगति का आध्यात्मिक पैमाना आज भी 'राम-राज्य' के आदर्श में छिपा है, जिसका अर्थ है ऐसा शासन जहाँ हर नागरिक को न्याय, सम्मान और समान अवसर प्राप्त हो।
नैसर्गिक समानता का अधिकार: 'राम-राज्य' का शैक्षणिक और नैतिक सार यह है कि समाज में स्त्री-पुरुष का भेद केवल जैविक है, न कि अधिकारों और क्षमताओं के स्तर पर। प्रगति तब होगी जब अवध की हर बेटी को उसके भाई के समान नैसर्गिक (Innate) समानता का अधिकार प्राप्त हो।
अखंडता और पूर्णता: नारी को पूर्ण 'मानवीय' रूप में स्वीकार करना, समाज की नैतिक अखंडता को सुनिश्चित करता है। यदि समाज की आधी आत्मा (नारी) को दबाया जाता है, तो वह समाज आध्यात्मिक रूप से खंडित और अपूर्ण रह जाता है।
लोकगीतों में आत्म-अभिव्यक्ति की शक्ति: अवधी लोक साहित्य और गीतों में नारी अपनी पीड़ा, असंतोष और विरोध को जिस मुखरता से अभिव्यक्त करती है, वह 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का सबसे सशक्त सामाजिक प्रमाण है। यह लोक साहित्य हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक मुक्ति तभी संभव है जब व्यक्ति अपने सत्य को बिना किसी भय के अभिव्यक्त कर सके।
3. 'पूर्ण मानव' की प्रतिष्ठा
अवध और अवधी साहित्य की महानता तब पूर्ण होती है जब वह नारी को केवल एक प्रतीकात्मक पूजा की वस्तु से ऊपर उठाकर 'पूर्ण मानव' के रूप में प्रतिष्ठित करता है—ऐसा मानव जिसके पास निर्णय लेने की शक्ति है, सत्य बोलने का साहस है, और अपने आत्म-बोध को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता है।
यह आध्यात्मिक प्रगति है जब समाज यह स्वीकार करता है कि नारी को पूज्यनीय मानने से अधिक आवश्यक है कि उसे समान नागरिक माना जाए, जिसकी स्वतंत्रता से ही देश की आत्मा को मुक्ति और गौरव प्राप्त होता है।
