'सन्नाटे' की सियासत और काली स्याही का सच
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
'सन्नाटे' की सियासत और काली स्याही का सच
"दिसंबर 2025: एक अनकहा डर या सोची-समझी खामोशी?"
हिंदुस्तान का आम जनमानस आज एक अजीबोगरीब सन्नाटे में है। यह वह सन्नाटा नहीं जो शांति का प्रतीक हो, बल्कि वह सन्नाटा है जो किसी भयावह तूफान के आने से पहले पक्षियों की चहचहाहट छीन लेता है। एप्स्टीन फाइल्स (Epstein Files) के जिन्न ने जब से बोतलबंद खामोशी को तोड़ा है, भारत के राजनीतिक गलियारों में एक 'अज्ञात भय' की लहर है। हालांकि, फाइलों के पहले अंश में सीधा नाम न आने पर एक विशेष विचारधारा के समर्थकों ने 'आत्म-संतोष' की सांस ली है, लेकिन क्या यह संतोष स्थायी है या केवल एक बड़ी तबाही से पहले की 'सेंसर्ड' राहत?
## सुब्रमण्यम स्वामी का 'डिलीटेड' सच और शयनकक्ष की कूटनीति
इस पूरे प्रकरण की पटकथा तब लिखी गई जब भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ऐसा ट्वीट किया जिसने सत्ता के शीर्ष को हिला दिया। स्वामी ने सीधे प्रधानमंत्री की जीवनशैली पर सवाल उठाते हुए उन्हें 'प्लेबॉय' की संज्ञा दे डाली और दावा किया कि अमेरिका और चीन के पास उनके 'शयनकक्ष के राज' कैद हैं।
यह महज एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। यदि किसी राष्ट्रप्रमुख की निजी फाइलें विदेशी ताकतों के हाथ में हों, तो क्या वह राष्ट्र स्वतंत्र निर्णय ले सकता है? स्वामी का वह ट्वीट डिलीट होना और उनका अचानक विदेश चले जाना, इस 'सन्नाटे' को और अधिक गहरा और संदिग्ध बनाता है।
## एप्स्टीन की चैट और 'मोदी ऑन माय बोर्ड' का रहस्य
सबसे विचलित करने वाला तथ्य अमेरिका के विदेश मंत्रालय की वह 'चैट ट्रेल' है, जिसमें जेफ्री एप्स्टीन—जो मासूम बच्चियों की देह के व्यापार का सबसे बड़ा गुनहगार था—कहता है: "Modi on my board"। आखिर एक सजायाफ्ता अपराधी के 'बोर्ड' पर भारत के शीर्ष नेतृत्व का संदर्भ क्या कर रहा था?
इतना ही नहीं, हरदीप पुरी का नाम एप्स्टीन के प्रोटोकॉल रजिस्टर में पांच बार आना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। भारत के एक जिम्मेदार मंत्री को उस व्यक्ति से मिलने की इतनी व्याकुलता क्यों थी, जिसने पूरी दुनिया की नैतिकता को शर्मसार किया? पेट्रोलियम और कूटनीति के बीच 'सेक्स ट्रैफिकिंग' के इस सरगना का क्या काम था?
## चयनात्मक पारदर्शिता: ट्रंप का अवसर और ब्लैकमेलिंग का खेल
अमेरिका के डेमोक्रेट सांसद रो खन्ना का आक्रोश जायज है। फाइलों को 'अर्ध-सार्वजनिक' करना न्याय नहीं, बल्कि 'राजनीतिक हथियार' है। जब चेहरों पर काली स्याही पोत दी गई और तस्वीरों को ब्लर कर दिया गया, तब केवल क्लिंटन की आपत्तिजनक तस्वीरों को सार्वजनिक करना यह दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन ने 'आपदा में अवसर' ढूंढ लिया है।
यूरोपीय विश्लेषकों की यह बात डराने वाली है कि ट्रंप ने उन राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के फोटो रोक लिए हैं जिन्हें वह भविष्य में 'ब्लैकमेल' कर सकें। यदि यह सच है, तो दुनिया के कई राष्ट्रप्रमुख अब स्वतंत्र नेता नहीं, बल्कि ट्रंप की जेब में रखे वो 'मोहरे' हैं जिनकी डोर उन फाइलों से बंधी है।
## 'तोते में कैद जान' और गोदी मीडिया का 'masterstroke'
अमेरिकी विश्लेषकों की वह टिप्पणी आज सबसे सटीक बैठती है कि "राजा की आत्मा तोते में कैद कर ली गई है"। वह तोता—एप्स्टीन की वो अनसेंसर्ड फाइलें हैं जो फिलहाल ट्रंप के 'ब्लैक बॉक्स' में बंद हैं।
कल संभव है कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा (गोदी मीडिया) ढोल-नगाड़ों के साथ यह नैरेटिव बेचे कि फाइलों में नाम न आना मोदी जी का 'मास्टरस्ट्रोक' है। लेकिन प्रबुद्ध नागरिक यह जानता है कि नाम का 'न आना' और नाम का 'हटा दिया जाना'—इन दोनों के बीच काली स्याही का एक बहुत बड़ा समंदर है।
## अंतिम प्रश्न
आने वाले 15 दिनों में सनसनी की यह बूंदें टपकती रहेंगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या हिंदुस्तान का लोकतंत्र इतना परिपक्व है कि वह 'ब्रह्मचर्य' और 'नैतिकता' के दावों के पीछे छिपी कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग को समझ सके? क्या हम यह मान लें कि आने वाले समय में हमारी नीतियां दिल्ली से नहीं, बल्कि उन फाइलों के संचालकों के दबाव से तय होंगी?
सत्य फाइलों के पन्नों में नहीं, बल्कि उन 'काले धब्बों' में छिपा है जिन्हें दिखाने की हिम्मत फिलहाल किसी में नहीं है।
