'न्यूज़ रूम' का ज़हरीला धुआँ और दम घुटता लोकतंत्र
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
'न्यूज़ रूम' का ज़हरीला धुआँ और दम घुटता लोकतंत्र
"दिल्ली की हवा में घुले सल्फर और नाइट्रोजन से भी अधिक खतरनाक वह 'वैचारिक प्रदूषण' है, जो हर शाम टेलीविजन के न्यूज़ रूम से रिसकर हमारे ड्राइंग रूम तक पहुँच रहा है।"
आज जब देश की राजधानी स्मॉग की चादर में लिपटी अपनी साँसों के लिए संघर्ष कर रही है, तब हमारे 'लोकतंत्र के चौथे स्तंभ' के कुछ स्वघोषित रक्षक तथ्यों की बलि वेदी पर अपनी रेटिंग का महल खड़ा कर रहे हैं। प्रदूषण के वैज्ञानिक कारणों पर बात करने के बजाय, जब मुख्यधारा के एंकर अरावली की पहाड़ियों को कटघरे में खड़ा करते हैं या प्रदूषण की विफलता का दोष सीधे लोकतंत्र की बुनियाद पर मढ़ देते हैं, तो समझ लेना चाहिए कि मानसिक दीवालियापन अपनी चरम सीमा पर है।
## तर्कहीनता का 'महा-प्रदूषण'
यह विडंबना ही है कि जो माध्यम जनता को जागरूक करने के लिए बना था, वह आज भ्रम फैलाने का सबसे बड़ा कारखाना बन गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों के बजाय स्क्रीन पर चीखते-चिल्लाते एंकरों की जमात ने सूचना के प्रवाह को 'विषैले संवाद' में बदल दिया है।
क्या यह किसी हास्य-व्यंग्य से कम है कि हज़ारों वर्षों से मरुस्थल को रोकती आ रही अरावली को ही प्रदूषण का कारक बता दिया जाए?
क्या यह लोकतंत्र का अपमान नहीं है कि प्रशासनिक और नीतिगत विफलताओं को छिपाने के लिए व्यवस्था के मूल चरित्र को ही दोषी ठहरा दिया जाए?
## 'विषकन्या' संस्कृति और सामाजिक बिखराव
संपादकीय मर्यादा के नाम पर हम अक्सर चुप रह जाते हैं, लेकिन आज शब्दों की मर्यादा तार-तार हो रही है। स्क्रीन पर बैठने वाली तथाकथित 'विषकन्याएँ' और उत्तेजक एंकर अपनी शब्दावली से न केवल हवा को, बल्कि समाज के आपसी भाईचारे को भी प्रदूषित कर रहे हैं। उनके 'दूषित वचनों' का प्रभाव किसी कण से कम घातक नहीं है, जो फेफड़ों को नहीं, बल्कि समाज के विवेक को बीमार कर रहा है।
## जिम्मेदारी से भागता मीडिया
जब मीडिया वास्तविक दोषियों—निर्माता इकाइयों, धूल प्रबंधन की विफलता और नीतिगत सुस्ती—से सवाल पूछने के बजाय काल्पनिक दुश्मन खोजने लगे, तो समझ लीजिए कि 'न्यूज़' की मृत्यु हो चुकी है और केवल 'मनोरंजन का विद्रूप रूप' बचा है।
हमें समझना होगा कि दिल्ली का प्रदूषण केवल फेफड़ों की बीमारी नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र की विफलता है जिसे आईना दिखाने की जिम्मेदारी मीडिया की थी। यदि मीडिया ही धुंध फैलाने का काम करेगा, तो जनता को साफ हवा और साफ खबर, दोनों के लिए तरसना पड़ेगा। अब समय आ गया है कि दर्शक इस 'वैचारिक स्मॉग' को पहचानें और अपनी पसंद के 'रिमोट' से इस प्रदूषण को खारिज करें।
