नारों का नशा और सुन्न होता समाज—एक चतुष्कोणीय विश्लेषण

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

नारों का नशा और सुन्न होता समाज—एक चतुष्कोणीय विश्लेषण

"जब नफरत का शोर चुनावी चंदा बन जाए और डर का व्यापार राजनीति, तो समझ लीजिए कि विकास की अर्थी निकल रही है।"

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ और ‘हिंदू खतरे में है’ महज चुनावी नारे नहीं हैं, बल्कि ये उस 'सोशल इंजीनियरिंग' के औजार हैं जिनका उपयोग बुनियादी जवाबदेही को दफनाने के लिए किया जाता है। तुर्की से लेकर भारत तक, अधिनायकवाद का सबसे सफल मॉडल यही रहा है कि जनता को एक काल्पनिक शत्रु और एक स्वर्णिम अतीत के बीच ऐसा उलझा दिया जाए कि वह अपना वर्तमान मांगना ही भूल जाए।

1. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: 'कलेक्टिव नार्सिसिज्म' और भय का प्रबंधन

मनोवैज्ञानिक रूप से, जब कोई व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों (नौकरी, शिक्षा, बेहतर जीवन स्तर) में विफल रहता है, तो सत्ता उसे 'सामूहिक गौरव' का झुनझुना थमा देती है। ‘गर्व से कहो...’ जैसे नारे व्यक्ति को यह भ्रम देते हैं कि भले ही वह बेरोज़गार हो, लेकिन वह एक 'महान धर्म' का हिस्सा होने के नाते श्रेष्ठ है। वहीं, 'हिंदू खतरे में है' का नारा मस्तिष्क के 'एमिग्डाला' (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो डर को संचालित करता है) को सक्रिय रखता है। डर की स्थिति में इंसान 'तार्किक' (Rational) सोचना बंद कर देता है और केवल 'रक्षक' की तलाश करता है। सत्ता यहाँ खुद को उसी 'एकमात्र रक्षक' के रूप में पेश करती है।

2. आर्थिक विश्लेषण: क्रोनी कैपिटलिज्म और संसाधन का डायवर्जन

आर्थिक मोर्चे पर, यह नैरेटिव कॉरपोरेट जगत के लिए एक 'स्मॉकस्क्रीन' (धुएं की दीवार) का काम करता है। जब जनता मंदिर-मस्जिद या धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर सड़कों पर लड़ रही होती है, तब गुपचुप तरीके से सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण और नीतियों का 'कॉरपोरेट-पक्षीय' रूपांतरण आसान हो जाता है।

 तथ्य: इलेक्टोरल ट्रस्ट से मिलने वाला 82% चंदा यह साबित करता है कि पूंजी का झुकाव उस विचारधारा की ओर है जो जनता को भावनात्मक रूप से उलझाकर रखती है, ताकि आर्थिक असमानता पर सवाल न उठें।

विस्थापन: शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट में कटौती को 'राष्ट्र निर्माण' के भारी-भरकम शब्दों से ढंक दिया जाता है।

3. राजनैतिक विश्लेषण: 'लेवल प्लेइंग फील्ड' का अंत

राजनैतिक रूप से, इन नारों ने विपक्ष की प्रासंगिकता को ही चुनौती दे दी है। यदि विपक्ष बेरोज़गारी की बात करता है, तो उसे 'विकास विरोधी' या 'अधर्मी' करार दे दिया जाता है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, जो कॉर्पोरेट हितों से संचालित है, इन नारों को 24/7 प्रसारित कर एक 'इको चैम्बर' (ऐसी जगह जहाँ एक ही बात बार-बार सुनाई दे) बना देता है। इसके परिणामस्वरूप, चुनाव 'काम' पर नहीं बल्कि 'ध्रुवीकरण' पर लड़े और जीते जाते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाएं (चुनाव आयोग, एजेंसियां) अब स्वतंत्र अंपायर होने के बजाय इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले तंत्र बन गए हैं।

4. सामाजिक विश्लेषण: टूटता हुआ साझा चूल्हा

सामाजिक स्तर पर, इसका सबसे भयावह परिणाम 'अविश्वास' है। जब क्रिसमस जैसे त्योहारों पर हमले होते हैं और मीडिया उसे 'धर्मांतरण के खिलाफ युद्ध' बताकर महिमामंडन करता है, तो समाज का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो जाता है। लेखिका इसे-तेमेलकुरन की चेतावनी के अनुसार, जब समाज झूठ और असभ्यता को 'सच' मानकर स्वीकार करने लगता है, तो वह अनजाने में तानाशाही की मदद कर रहा होता है। 2025 का भारत आज इसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ नफरत को 'सांस्कृतिक पुनरुत्थान' का नाम दे दिया गया है।

## जागने की घड़ी

अस्पताल की ऑक्सीजन, स्कूल की छत और हाथ की नौकरी—ये वो सच हैं जो किसी भी 'गर्व' या 'खतरे' से बड़े हैं। यदि आज का युवा इन नारों की चकाचौंध में अपनी बुनियादी जरूरतों को भूल जाता है, तो आने वाली नस्लें केवल 'असुरक्षा' की विरासत में ही बड़ी होंगी। लोकतंत्र का असली अर्थ किसी धर्म या वर्ग की जीत नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की गरिमापूर्ण जीवन की जीत है।

समय आ गया है कि हम 'फेहरिस्त' से गायब हुए उन सवालों को वापस लाएं, वरना इतिहास गवाह है कि जो समाज अपनी बुनियादी जरूरतों के बदले केवल 'नारे' चुनता है, वह अंततः गुलामी और दरिद्रता की ओर ही अग्रसर होता है।