हारेगा लोकतंत्र, जीतेगा साहेब'—एक सुनियोजित पतन की पटकथा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
"जब पहरेदार ही चंदाखोर बन जाएं और आईना दिखाने वाले दरबारी, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र का 'पोस्टमार्टम' चल रहा है।"
तुर्की की लेखिका इसे-तेमेलकुरन ने जब 'हाउ टू लूज ए कंट्री' लिखी थी, तो उनके निशाने पर एर्दोआन का तुर्की था, लेकिन इसकी हर एक पंक्ति आज के 'नये भारत' की हकीकत से मेल खाती है। भारत में लोकतंत्र एक झटके में नहीं टूटा है, बल्कि इसे बहुत करीने से, विज्ञापनों की चमक, कॉरपोरेट के चंदे और मीडिया के शोर के बीच 'धीरे-धीरे' मारा जा रहा है।
## सभ्यता का चीरहरण और नैरेटिव का मायाजाल
लोकतंत्र के पतन का पहला चरण—शालीनता का पतन—भारत की संसद से लेकर सोशल मीडिया के ट्रोल आर्मी तक में स्पष्ट दिखता है। यहाँ असभ्यता को 'साहस' और नफरत को 'राष्ट्रवाद' का नाम दे दिया गया है। एर्दोआन की तरह ही यहाँ भी 'असली भारतीय' बनाम 'खान मार्केट गैंग' या 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' की एक काल्पनिक कहानी गढ़ी गई है। इस 'हम बनाम वे' की लड़ाई में असली मुद्दे (बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य) इस तरह गायब कर दिए गए हैं जैसे वे कभी थे ही नहीं।
## कॉर्पोरेट-सत्ता का अनैतिक 'गठबंधन'
एर्दोआन के तुर्की और मोदी के भारत में सबसे बड़ी समानता कॉर्पोरेट तंत्र का इस्तेमाल है। इलेक्टोरल ट्रस्ट के माध्यम से चंदे का 82% हिस्सा एक ही दल की तिजोरी में जाना कोई संयोग नहीं है। यह उस क्रोनी कैपिटलिज्म (Crony Capitalism) का प्रमाण है, जहाँ नीतियां जनता के लिए नहीं, बल्कि उन पूंजीपतियों के लिए बनती हैं जो बदले में सत्ता की वापसी का रास्ता 'वित्त-पोषित' करते हैं। जब पैसा सत्ता के पक्ष में खड़ा हो, तो विपक्ष के लिए 'लेवल प्लेइंग फील्ड' केवल एक संवैधानिक जुमला बनकर रह जाता है।
## मीडिया: लोकतंत्र का प्रहरी या 'भोंपू'?
तेमेलकुरन कहती हैं कि अधिनायकवाद के लिए मीडिया पर कब्जा अनिवार्य है। भारत में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आज 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' नहीं, बल्कि 'सत्ता का एक्सटेंशन' बन चुका है। जो अखबार और चैनल क्रिसमस पर हुई हिंसा को दबाकर, प्रधानमंत्री के चर्च जाने के 'फोटो-ऑप' को महान उपलब्धि बताते हैं, वे दरअसल जनता की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं। विपक्ष का 'दानवीकरण' करना और हर सरकारी विफलता पर प्रधानमंत्री के लिए 'कवच' तैयार करना ही आज की मुख्यधारा की पत्रकारिता का धर्म बन गया है।
## संस्थाओं का खोखलापन और डर का माहौल
न्यायपालिका से लेकर चुनाव आयोग तक, आज संस्थाएं औपचारिक रूप से जीवित तो हैं, लेकिन उनका 'रीढ़ की हड्डी' जैसा अस्तित्व संदिग्ध है। जिस तरह तुर्की में इस्तांबुल के मेयर को जेल भेजा गया, ठीक उसी तरह भारत में केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) का उपयोग विपक्ष की वैधता खत्म करने के लिए हो रहा है। सोशल मीडिया पर एक ट्वीट करने से पहले जब नागरिक को दस बार सोचना पड़े, तो समझ लीजिए कि 'डर की जलवायु' (Climate of Fear) पूरी तरह परिपक्व हो चुकी है।
लोकतंत्र का नया नामकरण हो चुका है। अब 'बहुमत' का मतलब 'निरंकुश अधिकार' मान लिया गया है। हम उस खतरनाक मोड़ पर खड़े हैं जहाँ झूठ को सामान्य मान लेना ही सबसे बड़ी नागरिक भूल है। यदि भारतीय समाज अब भी "चलो, इतना तो चलता है" कहता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे पास वोट देने का अधिकार तो होगा, लेकिन चुनने का विकल्प नहीं। लोकतंत्र का खोल बचा रहेगा, लेकिन उसकी आत्मा कब की जा चुकी होगी।
