इतिहास का 'वध' और ध्रुवीकरण का 'धुआं'
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
इतिहास का 'वध' और ध्रुवीकरण का 'धुआं'
"जब सत्ता के लिए तथ्य 'घुसपैठिए' बन जाएं और झूठ 'इतिहास', तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र की आधारशिला खतरे में है।"
बिहार की चुनावी बिसात बिछाने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब पश्चिम बंगाल और असम के रणक्षेत्र में उतर आए हैं। लेकिन बीते दो दिनों में उनके भाषणों और कार्यक्रमों से जो तस्वीर उभरी है, वह केवल चुनावी प्रचार नहीं, बल्कि तथ्यों के सुनियोजित संहार और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के पलायन की कहानी कहती है। बंगाल की 'धुंध' से लेकर असम के 'इतिहास' तक, हर जगह सत्य को सत्ता की वेदी पर चढ़ाया जा रहा है।
1. बंगाल की धुंध: सुरक्षा का ढोंग या विरोध से पलायन?
नादिया में धुंध के कारण हेलीकॉप्टर का न उतरना और प्रधानमंत्री का वर्चुअल संबोधन करना एक तकनीकी मामला हो सकता है, लेकिन इसके पीछे की राजनीति गहरी है।
विरोध बनाम खतरा: नादिया में प्रधानमंत्री के खिलाफ लगे पोस्टर और बैनर इस बात का संकेत थे कि बंगाल की जनता सवाल पूछना चाहती है। पंजाब चुनाव के वक्त किसानों के विरोध को 'जान पर खतरे' के रूप में पेश करना और अब बंगाल में विरोध की संभावना के बीच 'धुंध' को बहाना बनाना—यह दर्शाता है कि सत्ता अब जनता के काले झंडों का सामना करने का साहस खो चुकी है।
लोकतंत्र में अधिकार: लोकतांत्रिक देश में जनता का विरोध 'मौत का पैगाम' नहीं, बल्कि 'असहमति की आवाज़' होती है। प्रधानमंत्री का विरोध को जान के खतरे के रूप में पेश करना यह बताता है कि उन्हें लोकतंत्र में जनता को मिले मौलिक अधिकार सुहाते नहीं हैं।
2. असम: इतिहास की 'सर्जिकल स्ट्राइक' और सफेद झूठ
प्रधानमंत्री ने गुवाहाटी में असम को भारत से अलग करने की साजिश का जो आरोप कांग्रेस और पं. नेहरू पर मढ़ा, वह न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि हास्यास्पद भी है। 1946 के कैबिनेट मिशन प्लान के तथ्य आज भी रिकॉर्ड में दर्ज हैं:
ऐतिहासिक सच: कांग्रेस और विशेषकर पं. नेहरू ने ही असम को समूह 'सी' (Group C) और पूर्वी पाकिस्तान में मिलने से बचाया था।
साक्ष्य: 22 जुलाई 1946 को नेहरू ने गोपीनाथ बोरदोलोई को स्पष्ट लिखा था— “समूह के खिलाफ फैसला करना सही और उचित था।” 23 सितंबर 1946 को उन्होंने फिर दोहराया कि “किसी भी हाल में हम असम जैसे प्रांत को उसकी इच्छा के खिलाफ कुछ करने के लिए मजबूर नहीं करेंगे।”
गांधीजी का रुख: 29 दिसंबर 1946 के 'हरिजन' में प्रकाशित लेख गवाह है कि गांधीजी ने भी असम को अपनी पहचान के लिए अकेले लड़ने और पाकिस्तान में न मिलने की सलाह दी थी।
बावजूद इसके, प्रधानमंत्री यह दावा कर रहे हैं कि बोरदोलोई अपनी पार्टी (कांग्रेस) के खिलाफ खड़े हुए थे। यह 'इतिहास का राजनीतिकरण' केवल इसलिए किया जा रहा है क्योंकि असम में गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस मज़बूत हो रही है और भाजपा की ज़मीन खिसक रही है।
3. संघ और सरकार: संविधान की अवहेलना का नया अध्याय
प्रधानमंत्री के बयानों को सरसंघचालक मोहन भागवत के कोलकाता वाले भाषण के साथ जोड़कर देखना ज़रूरी है। भागवत का यह कहना कि “हिन्दुस्तान, हिन्दू राष्ट्र है और उन्हें संविधान में उस शब्द (हिन्दू राष्ट्र) की परवाह नहीं है,” सीधे तौर पर भारत के संवैधानिक ढांचे को चुनौती है।
ध्रुवीकरण का खतरनाक खेल: एक तरफ प्रधानमंत्री इतिहास को तोड़-मरोड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ संघ प्रमुख संविधान की परवाह न करने की बात कर रहे हैं। यह गठजोड़ स्पष्ट संकेत दे रहा है कि सत्ता के लिए सांप्रदायिक विभेद को आखिरी हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
दीर्घकालिक नुकसान: सत्ता मिल सकती है, चुनाव जीते जा सकते हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों पर झूठ की स्याही और समाज के दिल में नफरत की धुंध जो नुकसान करेगी, उसकी भरपाई आने वाली कई पीढ़ियां भी नहीं कर पाएंगी।
सत्य कभी धुंध से नहीं डरता और न ही उसे इतिहास बदलने की ज़रूरत होती है। प्रधानमंत्री मोदी का 'इतिहास प्रेम' दरअसल वर्तमान की विफलताओं को छिपाने का एक औज़ार मात्र है। जब राष्ट्र का नेतृत्व ही असत्य को हथियार बना ले, तो नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों के प्रकाश में सच्चाई को तलाशे।
