आंकड़ों की बाजीगरी में दफन पारदर्शिता और 'लोकतंत्र का मौसम'

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


आंकड़ों की बाजीगरी में दफन पारदर्शिता और 'लोकतंत्र का मौसम'

"जब संस्थाएं सरकार की 'मुनीम' बन जाएं और मीडिया 'मौसम विज्ञानी', तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र आईसीयू में है।"

भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान दौर में एक विचित्र विरोधाभास फल-फूल रहा है। एक तरफ 'डिजिटल इंडिया' और 'पारदर्शिता' का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ सीएजी (CAG) की रिपोर्टों में सरकारी खजाने की ऐसी 'बंदरबांट' उजागर हो रही है जिसे देखकर बोफर्स का जिन्न भी शरमा जाए। विडंबना देखिए कि जब देश की सबसे बड़ी कौशल विकास योजना में हजारों करोड़ का घपला आंकड़ों के साथ सामने आता है, तो मुख्यधारा के अखबारों की लीड खबर 'कोहरा और ठंड' होती है। यह 'पत्रकारिता का साहस' नहीं, बल्कि 'सत्ता के सामने समर्पण' का कालखंड है।

1. कौशल विकास या भ्रष्टाचार का 'यूनिवर्सिटी'?

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के नाम पर 14,450 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए, लेकिन सीएजी की जांच ने इस पूरी योजना को 'कागजी महल' साबित कर दिया है।

तथ्य का तमाचा: 95.90 लाख भागीदारों में से 94.53% मामलों में बैंक अकाउंट डिटेल्स ही नहीं थे। जिस देश में एक गरीब के खाते में सब्सिडी भेजने के लिए आधार और केवाईसी की दीवार खड़ी कर दी जाती है, वहां हजारों करोड़ बांटते समय 'बैंक डिटेल' को 'गैर-जरूरी' बना दिया गया।

 फोटोशॉप का खेल: उत्तर प्रदेश से राजस्थान तक, लाभार्थियों के नाम अलग थे लेकिन 'फोटोग्राफिक सबूत' एक ही थे। यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक संगठित वित्तीय अपराध है।

 दोहरा मापदंड: एक तरफ SIR (मतदाता सूची शुद्धिकरण) के लिए बीएलओ (BLO) पर इतना दबाव है कि वे आत्महत्या कर रहे हैं, वहां कोई ढील नहीं है। लेकिन जहां सरकारी धन का बंदरबांट होना था, वहां नियमों को 'ग्राउंड लेवल की समस्या' बताकर शिथिल कर दिया गया। यह स्पष्ट करता है कि सरकार की प्राथमिकता 'शुद्ध मतदाता' नहीं, बल्कि 'सुविधाजनक लूट' है।

2. 'क्विड प्रो क्वो': चंदे का धंधा और सब्सिडी का फंडा

चुनावी चंदे की राजनीति अब 'पारदर्शिता' के नाम पर 'नाम छिपाने' का खेल बन चुकी है। इलेक्टोरल बांड रद्द हुए तो चुनावी ट्रस्ट का सहारा लिया गया, जहां 82 प्रतिशत दान (3,112 करोड़ रुपये) अकेले भाजपा की झोली में गिरा।

 टाटा और 758 करोड़ का गणित: फरवरी 2024 में टाटा समूह को सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट के लिए 44,000 करोड़ की सब्सिडी मिलती है और ठीक दो महीने बाद, चुनाव से पहले, वही समूह भाजपा को 758 करोड़ का चंदा देता है। क्या यह महज एक संयोग है या फिर 'सब्सिडी के बदले चंदा' का नया मॉडल?

अनाम पार्टियों का रहस्य: गुजरात की उन 10-11 अनजान पार्टियों के पास 4,300 करोड़ रुपये कहाँ से आए, जिन्होंने कभी चुनाव ही नहीं लड़ा? यह 'ब्लैक मनी' को 'व्हाइट' करने की लॉन्ड्री नहीं तो और क्या है?

3. मीडिया का सन्नाटा और 'तिहाड़ी' विमर्श

जब इंडियन एक्सप्रेस सीएजी की रिपोर्ट और चंदे के आंकड़ों से सरकार की पोल खोल रहा होता है, तब द हिन्दू जैसे अखबारों में सन्नाटा पसरा होता है और बाकी मीडिया 'घुसपैठियों' के नाम पर गृह मंत्री के बयानों को छह कॉलम की लीड बनाता है।

भटकाव की राजनीति: गृह मंत्री संसद में 'वोट चोरी' के आरोपों का जवाब देने के बजाय उसे नेहरू और इंदिरा गांधी से जोड़ देते हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई वर्तमान की चोरी पकड़े जाने पर पूर्वजों के चरित्र पर सवाल उठाने लगे।

 पेड इनफ्लुएंसर का कवच: सरकार छह करोड़ रुपये सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर पर खर्च कर रही है ताकि 'फैक्ट चेक' के नाम पर आलोचना को दबाया जा सके। करोड़ों के विज्ञापन और पीआईबी के जरिए एक ऐसा 'आभासी संसार' रचा जा रहा है जहाँ भ्रष्टाचार का अस्तित्व ही नहीं है।

अरावली में खनन की छूट से लेकर कौशल विकास के फर्जीवाड़े तक, हर तरफ एक ही कहानी है—संस्थागत कब्ज़ा और जवाबदेही का अभाव। जब सीजेआई (CJI) को चुनाव आयुक्तों के चयन से बाहर कर दिया जाता है, तो उसका उद्देश्य स्पष्ट होता है कि 'चेक एंड बैलेंस' की व्यवस्था को खत्म कर दिया जाए। प्रधानमंत्री 'ईमानदार सरकार' का दावा करते हैं, लेकिन उनकी सुई 'घुसपैठियों' पर अटकी है, जबकि 'असली घुसपैठ' सरकारी खजाने में हो चुकी है। यह देश के लिए चेतावनी है—अगर आज हम मौसम की खबरों में उलझे रहे, तो आने वाली नस्लों के पास न तो रोजगार होगा और न ही स्वतंत्र संस्थान।