'वंदे मातरम' के 150 वर्ष: गौरव की पुनर्स्थापना या नया राजनीतिक अखाड़ा?

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

'वंदे मातरम' के 150 वर्ष: गौरव की पुनर्स्थापना या नया राजनीतिक अखाड़ा?

'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने पर संसद के दोनों सदनों में होने वाली चर्चा ने, एक बार फिर, देश के राष्ट्रगीत को राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर को 'महान अध्याय और गौरव को पुनःस्थापित करने' का मौका बताया, लेकिन इसके साथ ही, अतीत की राजनीति और भविष्य की अनिवार्यताओं पर एक तीखी बहस छिड़ गई है।

# ऐतिहासिक गौरव और राजनीतिक आरोप

'वंदे मातरम' केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की धधकती मशाल रहा है। 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत, और बाद में उनकी कृति 'आनंदमठ' (1885) में शामिल किया गया, जिसने 1905 के बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन को साझे राष्ट्रवाद का मंत्र दिया। भगत सिंह से लेकर अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान तक, हिंदू-मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे इंक़लाब ज़िंदाबाद की तरह ही अपनाया।

लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 1937 के फ़ैज़ाबाद अधिवेशन का ज़िक्र करते हुए कांग्रेस पर 'गीत के कुछ अहम हिस्सों को हटाने' और 'विभाजन के बीज बोने' का आरोप लगाना, इस गौरवशाली अवसर को अतीत के घावों को कुरेदने का जरिया बना देता है।

 तथ्यों का आईना: कांग्रेस ने 1937 में गांधी, नेहरू, आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस की समिति गठित की थी। आपत्तियाँ केवल मुस्लिम संगठनों की नहीं, बल्कि सिख, जैन, ईसाई और बौद्ध संगठनों की भी थीं, जो मानते थे कि गीत का कुछ हिस्सा एक धर्म विशेष के हिसाब से राष्ट्रवाद को परिभाषित करता है। रवींद्रनाथ टैगोर के सुझाव पर, कांग्रेस ने केवल पहले दो अंतरे गाने का निर्णय लिया जिनमें कोई धार्मिक पहलू नहीं था। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम नरेश ने टैगोर के पत्र का हवाला देकर पीएम के आरोपों को निराधार बताया है, जिसका मतलब है कि निर्णय विभाजनकारी नहीं, बल्कि समावेशी राष्ट्रवाद सुनिश्चित करने की कोशिश थी।

# अनिवार्यता बनाम संवैधानिक स्वतंत्रता

वर्तमान विवाद का सबसे ज्वलंत मुद्दा भाजपा नेताओं, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा, शैक्षणिक संस्थानों में 'वंदे मातरम' को गाना अनिवार्य करने की माँग है।

 संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रगान ('जन गण मन') को अनिवार्य किया, जबकि राष्ट्रगीत ('वंदे मातरम') को वैकल्पिक रखा। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सही सवाल उठाया है: यदि इसे अनिवार्य करना ज़रूरी होता, तो इसे संविधान में ही क्यों नहीं किया गया?

 व्यक्तिगत स्वतंत्रता: समाजवादी पार्टी के सांसद ज़ियाउर्रहमान बर्क और विधायक इक़बाल महमूद का विरोध इस बात पर केंद्रित है कि संविधान ने सभी को स्वतंत्रता दे रखी है, और किसी को भी यह गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जबरन थोपना, राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान को बढ़ाएगा नहीं, बल्कि विरोध की भावना को जन्म देगा।

 मूल भावना: 'वंदे मातरम' का इतिहास हमें सिखाता है कि यह गीत तब सबसे शक्तिशाली था जब इसे स्वेच्छा से और आज़ादी की लड़ाई की ऊर्जा के रूप में गाया गया, न कि सरकारी आदेश के तहत।

'वंदे मातरम' के 150 वर्ष हमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उस साझा अतीत की याद दिलाते हैं, जिसने हिंदू-मुस्लिम दोनों को एकजुट किया। प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना सही है कि यह गीत 'देश की आज़ादी के लिए ऊर्जा' बना।

हालांकि, इस गौरवशाली मौके को राजनीतिक स्कोर सेटलमेंट और विभाजनकारी आरोप-प्रत्यारोप के लिए इस्तेमाल करना, इस गीत की मूल, समावेशी भावना को कमजोर करता है। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का सम्मान प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है, लेकिन इस कर्तव्य को जबरदस्ती थोपने की कोशिश, देश के उस संवैधानिक बहुलवाद पर सीधा हमला है जिसका सम्मान हमारे संविधान निर्माताओं ने किया था।

संसद को इस अवसर का उपयोग राष्ट्रगीत की विरासत पर गर्व करने और संवैधानिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए करना चाहिए, न कि 'हम बनाम वे' की बहस को गहराने के लिए।

वंदे मातरम: यह स्वैच्छिक श्रद्धा का मंत्र है, अनिवार्य राष्ट्रवाद थोपने का सरकारी आदेश नहीं।