'कर्ज़ का पहाड़' और भारत का भविष्य: एक विश्लेषण

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


'कर्ज़ का पहाड़' और भारत का भविष्य: एक विश्लेषण

भारत सरकार का कर्ज़ 2010 के लगभग ₹35 लाख करोड़ से बढ़कर 2024 में ₹172 लाख करोड़ के क़रीब पहुँच जाना, देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक विस्तृत आर्थिक और संवैधानिक विमर्श की माँग करता है। यह केवल एक संख्यात्मक उछाल नहीं है, बल्कि यह राजकोषीय प्रबंधन, विकास रणनीति और आगामी पीढ़ियों पर बोझ से संबंधित गंभीर प्रश्न उठाता है।

# आर्थिक परिप्रेक्ष्य: उत्पादक कर्ज़ बनाम उपभोग का कर्ज़

कर्ज़ में 4.9 गुना की यह वृद्धि (लगभग 14 वर्षों में) अर्थव्यवस्था की विकास दर (Nominal GDP Growth) को देखते हुए सामान्य प्रतीत हो सकती है, लेकिन इसका विश्लेषण कर्ज़ की प्रकृति और राजकोषीय घाटे की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

1. राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट का प्रबंधन

 उत्पादकता का सवाल: क्या यह कर्ज़ उत्पादक संपत्तियों (पूँजीगत व्यय) जैसे बुनियादी ढाँचे (सड़कें, रेलवे, डिजिटल नेटवर्क) में निवेश के लिए लिया गया है? यदि हाँ, तो यह भविष्य में अधिक आर्थिक विकास दर (GDP Growth) को बढ़ावा देगा, जिससे कर्ज़ का GDP अनुपात समय के साथ कम हो सकता है।

गैर-उत्पादक व्यय का बोझ: यदि कर्ज़ का एक बड़ा हिस्सा राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) जैसे वेतन, सब्सिडी (जो आवश्यक हैं लेकिन तत्काल रिटर्न नहीं देतीं), और सबसे महत्वपूर्ण, ब्याज भुगतान को पूरा करने में खर्च होता है, तो यह अर्थव्यवस्था पर स्थायी बोझ डालता है। भारत सरकार की राजस्व प्राप्तियों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 25%) ब्याज भुगतान में खर्च होता है, जो विकास कार्यों के लिए उपलब्ध धन को कम करता है।

2. कर्ज़ का GDP अनुपात

कर्ज़ के बोझ का वास्तविक पैमाना सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में मापा जाता है।

 केंद्र सरकार का कर्ज़ GDP के अनुपात में 57% से 61% के बीच रहा है। कोविड-19 महामारी के दौरान (2020-21) आर्थिक राहत पैकेज और राजस्व में कमी के कारण यह अनुपात काफी बढ़ गया था।

विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसे वैश्विक निकाय भारत के कुल सार्वजनिक कर्ज़ (केंद्र + राज्य) के उच्च अनुपात (जो 80% से ऊपर है) पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। उनका मानना है कि यह अनुपात उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए जोखिमपूर्ण है और इसे 60% के आसपास लाने का लक्ष्य होना चाहिए।

जोखिम: उच्च कर्ज़ का मतलब है कि भविष्य में सरकार को अपनी ऋण रेटिंग बनाए रखने और घरेलू/अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों से सस्ता उधार लेने में अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

# संवैधानिक और विधायी परिप्रेक्ष्य: FRBM और जवाबदेही

भारतीय संसद ने राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 पारित किया था। इस कर्ज़ वृद्धि का मूल्यांकन संवैधानिक जवाबदेही के संदर्भ में होना चाहिए:

1. FRBM लक्ष्यों से विचलन: FRBM अधिनियम का मुख्य उद्देश्य राजकोषीय घाटे को GDP के एक निश्चित प्रतिशत तक सीमित करना और सार्वजनिक कर्ज़ को धीरे-धीरे कम करना था। कर्ज़ में हुई यह वृद्धि दिखाती है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने में चुनौतियाँ आई हैं, खासकर 2020 के बाद।

2. संसद में जवाबदेही: भारत सरकार संविधान के अनुच्छेद 112 (वार्षिक वित्तीय विवरण) के तहत अपना बजट संसद में प्रस्तुत करती है। कर्ज़ का प्रबंधन और व्यय पर नियंत्रण संसदीय संप्रभुता के अधीन है। विपक्षी दलों और विशेषज्ञ समितियों को इस बात पर सख्त निगरानी रखनी चाहिए कि यह कर्ज़ किस उद्देश्य से लिया जा रहा है और क्या इसका उपयोग देश की संपत्ति बढ़ाने के लिए हो रहा है।

3. अंतर-पीढ़ीगत समता (Inter-generational Equity): बढ़ता कर्ज़ अनिवार्य रूप से भविष्य की पीढ़ियों पर कराधान का बोझ डालता है। संवैधानिक नैतिकता के तहत, मौजूदा सरकार को ऐसा राजकोषीय प्रबंधन करना चाहिए जो वर्तमान उपभोग के लिए भविष्य की पीढ़ियों की क्षमता से समझौता न करे।

# निष्कर्ष

यह सच है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को तीव्र विकास के लिए उधार लेने की आवश्यकता होती है। लेकिन ₹172 लाख करोड़ का यह आंकड़ा सरकार को राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) की दिशा में निर्णायक कदम उठाने की चेतावनी देता है।

# आवश्यकताएँ:

 राजस्व आधार बढ़ाना: सरकार को टैक्स बेस बढ़ाने और टैक्स चोरी को रोकने पर ध्यान देना चाहिए। 

व्यय की दक्षता: गैर-प्राथमिकता वाले और अप्रभावी व्यय को कम करके पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता बढ़ाई जाए।

 गैर-रणनीतिक परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण: सरकारी कर्ज़ कम करने के लिए सार्वजनिक उपक्रमों और निष्क्रिय पड़ी सरकारी संपत्तियों का विनिवेश या मुद्रीकरण एक प्रभावी उपाय हो सकता है।

सरकार को इस विशाल कर्ज़ के संबंध में संसद और जनता के प्रति पूर्ण पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि 'कर्ज़ का पहाड़' भारत के आर्थिक भविष्य को अवरुद्ध न कर दे।

"₹172 लाख करोड़ का कर्ज़: विकास की सीढ़ी या भविष्य पर ब्याज का बोझ? राजकोषीय जवाबदेही समय की माँग है!"