लोकतंत्र का संकट: जब रेफरी ही खिलाड़ी बन जाए।

 संवाददाता: प्रदीप शुक्ला

लोकतंत्र का संकट: जब रेफरी ही खिलाड़ी बन जाए

भारत का लोकतंत्र इस समय एक चौराहे पर खड़ा है, और इस चौराहे पर खड़ा है हमारा चुनाव आयोग, जो संविधान का सबसे अहम प्रहरी है। लेकिन, बीते दिनों की घटनाओं ने इस प्रहरी की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का बयान, "हलफनामा दो या देश से माफी मांगो," न केवल गैर-संवैधानिक है, बल्कि यह लोकतंत्र के माथे पर एक गहरा दाग है। यह बयान एक सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता की तरह लगता है, न कि एक संवैधानिक संस्था के प्रमुख का, जिसका काम सभी पक्षों के लिए समान नियम सुनिश्चित करना है।

चुनाव आयोग को भारतीय लोकतंत्र का रेफरी कहा जाता है। उसका काम खेल के मैदान को साफ रखना और यह सुनिश्चित करना है कि हर खिलाड़ी को समान अवसर मिले। लेकिन, आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में वह रेफरी नहीं, बल्कि एक खिलाड़ी की तरह नजर आया। वह उस पक्ष का बचाव कर रहा था, जिस पर धांधली के आरोप लग रहे हैं, और उन पर हमला कर रहा था, जो ये आरोप लगा रहे हैं। जब राहुल गांधी और सत्ता पक्ष के मंत्री अनुराग ठाकुर जैसे नेता भी मतदाता सूची में गड़बड़ी की बात करते हैं, तो आयोग का फर्ज बनता है कि वह इन आरोपों को गंभीरता से ले और जांच का आश्वासन दे। लेकिन, आयोग जिम्मेदारी लेने के बजाय केवल बहानेबाजी कर रहा है और सवालों से भाग रहा है।

पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता जैसे अनुभवी पत्रकारों ने जब सीधे और तीखे सवाल पूछे, तो आयोग के पास कोई जवाब नहीं था।

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इन सवालों पर आयोग का जवाब "टन्न टन्न टन्न निल बट्टे सन्नाटा" था। यह दिखाता है कि आयोग के पास इन गंभीर आरोपों का कोई तार्किक या तथ्यात्मक जवाब नहीं है। वह तथ्यों से भाग रहा है। यह चुप्पी न केवल आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि आरोपों में दम है।

यह मामला केवल चुनावी गड़बड़ी का नहीं है, यह लोकतंत्र की आत्मा का सवाल है। जब चुनावी प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, तो लोगों का अपनी सरकार और नेताओं पर विश्वास टूट जाता है। सुप्रीम कोर्ट का दखल, जिसमें आयोग को काटे गए नामों की सूची जारी करने का निर्देश दिया गया है, यह साबित करता है कि विपक्ष के आरोप निराधार नहीं हैं। यह आदेश आयोग के मुंह पर एक तमाचा है और उसे अपनी जिम्मेदारी याद दिलाता है।

यह समय है कि चुनाव आयोग अपनी खोई हुई निष्पक्षता को वापस लाए। उसे एक बार फिर संविधान के प्रति अपनी निष्ठा साबित करनी होगी। वरना, यह लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा, जहाँ खेल का नियम बनाने वाला ही बाजीगर बन जाएगा।