जीएसटी का खेल: सरकार का छलावा, जनता पर आर्थिक मार।
संवाददाता: प्रदीप शुक्ला
जीएसटी का खेल: सरकार का छलावा, जनता पर आर्थिक मारसरकार ढोल पीट रही है कि जीएसटी की दरें घट रही हैं, और मीडिया इसे एक क्रांतिकारी आर्थिक सुधार बताकर जनता को गुमराह कर रहा है। कहा जा रहा है कि 12% और 28% के स्लैब खत्म करके इन्हें 5% और 18% में मिलाया जाएगा। सुनने में यह एक बड़ी राहत लगती है, लेकिन असलियत में यह एक सुनियोजित आर्थिक छलावा है, जो आम आदमी की जेब पर और भी गहरा घाव करेगा। यह वैसा ही है जैसे कोई आपकी तिजोरी से ₹1000 निकाल ले, और फिर ₹70 वापस करके कहे कि 'देखो, हमने आपको कितनी बड़ी राहत दी।'
1. आर्थिक दृष्टिकोण: कर का बोझ किसके कंधों पर?
आर्थिक दृष्टि से, जीएसटी की बनावट ही समस्या की जड़ है। यह एक अप्रत्यक्ष कर है, जो हर उपभोक्ता से समान रूप से वसूला जाता है, भले ही उसकी आय कितनी भी हो। इसका सीधा नतीजा यह है कि ₹15,000 कमाने वाला एक मजदूर परिवार भी उसी दर से टैक्स देता है, जिस दर से ₹15 लाख कमाने वाला एक उद्योगपति। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था का बोझ सबसे अधिक गरीबों और मध्यम वर्ग पर पड़ता है।
ऑक्सफैम की रिपोर्ट इस बात को प्रमाणित करती है कि भारत के निचले 50% लोग कुल जीएसटी का 64% बोझ ढोते हैं, जबकि शीर्ष 10% लोग केवल 3-4% का बोझ उठाते हैं। यह दिखाता है कि सरकार का राजस्व मॉडल "गरीबों से खींचो, अमीरों को दो" के सिद्धांत पर काम करता है।
वहीं दूसरी ओर, 2019 में कॉर्पोरेट टैक्स में भारी कटौती कर दी गई। अरबों कमाने वाले कॉरपोरेट्स का टैक्स 30% से घटाकर 22% कर दिया गया। ये बड़े पूंजीपति टैक्स चोरी, सब्सिडी और सरकारी रियायतों का लाभ उठाकर अपने मुनाफे को कई गुना बढ़ा रहे हैं, जबकि सरकार की झोली भरने का काम आम जनता के अप्रत्यक्ष करों से हो रहा है।
2. सामाजिक दृष्टिकोण: बढ़ती असमानता की खाई
जीएसटी की मौजूदा व्यवस्था ने भारतीय समाज में अमीरी और गरीबी की खाई को और भी गहरा कर दिया है। जब आवश्यक वस्तुओं जैसे दूध, तेल, कपड़े और मोबाइल रिचार्ज पर भी अप्रत्यक्ष कर लगता है, तो गरीब परिवारों के लिए जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी करना भी एक चुनौती बन जाता है।
एक तरफ, सरकार 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के नाम पर बड़े पूंजीपतियों को हर तरह की छूट और सुविधा देती है, और दूसरी तरफ, उसी जनता से पाई-पाई वसूलती है, जो उनके व्यापारिक साम्राज्य का आधार है। यह सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जहाँ समाज का एक तबका लग्जरी कारों और निजी जेट पर कर छूट का आनंद लेता है, जबकि दूसरा तबका अपनी दैनिक रोटी पर भी जीएसटी देता है।
3. पारिवारिक दृष्टिकोण: आम आदमी के लिए घर चलाना क्यों हुआ मुश्किल?
2017 में जीएसटी लागू होने के बाद, एक सामान्य परिवार के मासिक खर्चों में भारी वृद्धि हुई है। जिस परिवार की मासिक आय ₹15,000-18,000 थी, वह पहले ₹800-1,200 टैक्स देता था। आज वही परिवार, महंगाई और उच्च जीएसटी दरों के कारण ₹1,600-2,200 प्रति माह खर्च कर रहा है।
सरकार की प्रस्तावित "राहत" के बाद भी यह खर्च ₹1,100-1,500 तक ही आएगा, जो 2017 से पहले की स्थिति से कहीं अधिक है। यह बढ़ोतरी बढ़ती कीमतों के कारण होगी, क्योंकि कीमतें बढ़ने के साथ प्रभावी जीएसटी स्वतः ही बढ़ जाता है। इसका मतलब है कि परिवार की आय का बड़ा हिस्सा सरकार के खजाने में चला जाता है, जिससे उनकी बचत शून्य हो जाती है और आर्थिक अस्थिरता बढ़ती है।
यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें आम आदमी पिस रहा है। दूध, पेट्रोल, मोबाइल रिचार्ज या चाय - हर खरीद पर उसे अप्रत्यक्ष कर की मार झेलनी पड़ती है। इस बोझ के कारण परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक खर्चों में कटौती करनी पड़ती है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता में गिरावट आती है।
संक्षेप में, जीएसटी दरों में प्रस्तावित बदलाव एक आर्थिक छलावा है। यह न तो महंगाई को कम करेगा, न ही जनता को वास्तविक राहत देगा। यह केवल पूंजीवादी तंत्र को मजबूत करने और अमीरी-गरीबी की खाई को गहरा करने का एक और साधन है। जब तक कर व्यवस्था में मौलिक बदलाव नहीं होता और प्रत्यक्ष करों का बोझ अमीरों पर नहीं डाला जाता, तब तक आम आदमी को कोई वास्तविक राहत नहीं मिलेगी।
