डमरू: सृष्टि का नाद और शिव का अनहद नाद।

संवाददाता: प्रदीप शुक्ला 

डमरू: सृष्टि का नाद और शिव का अनहद नाद

डमरू, जिसे हम अक्सर भगवान शिव के हाथों में देखते हैं, मात्र एक वाद्य यंत्र नहीं है। यह एक गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक प्रतीक है, जो सृष्टि के जन्म, उसके जीवन और अंततः उसके लय होने की ब्रह्मांडीय प्रक्रिया को दर्शाता है। यह शिव के उस परम स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है, जो स्वयं काल के स्वामी हैं और सृजन-विनाश के परे अनहद नाद की परम शांति में स्थित हैं।

 डमरू का भौतिक रूप और उसका आध्यात्मिक मर्म

डमरू की संरचना ही अपने आप में एक गूढ़ रहस्य को समेटे हुए है। इसके प्रत्येक अंग का अपना एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ है:

1. डमरू के दो मुख: सृजन और विनाश का द्वंद्व

डमरू के दो मुख होते हैं जो एक दूसरे के विपरीत होते हैं। ये दो मुख क्रमशः सृजन (Creation) और विनाश (Destruction) का प्रतीक हैं। यह दर्शाता है कि सृष्टि का चक्र निरंतर गतिमान है। जहाँ एक ओर कुछ नया उत्पन्न होता है, वहीं दूसरी ओर कुछ समाप्त भी होता है। यह जीवन का शाश्वत नियम है, जिसका वर्णन भगवद्गीता में भी मिलता है:

"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।"

(भगवद्गीता २.२७)

अर्थात: जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु निश्चित है, और मृत्यु को प्राप्त होने वाले के लिए जन्म निश्चित है।

डमरू के ये दोनों मुख जीवन के इस द्वंद्व को दर्शाते हैं।

2. डमरू के मनके: क्रिया और कर्म का प्रतीक

डमरू के मध्य भाग से जुड़ी डोरी के सिरे पर दो मनके लगे होते हैं। ये दो मनके सृष्टि की दो विपरीत शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं: पुरुष और प्रकृति। इन मनकों का डमरू पर निरंतर आघात क्रिया और प्रतिक्रिया के सिद्धांत को दर्शाता है, जो कर्म के सिद्धांत से सीधे जुड़ा हुआ है। ये मनके हमें याद दिलाते हैं कि जीवन में हर क्रिया का एक निश्चित परिणाम होता है। यह कर्म का चक्र ही है जो जीव को जन्म-मरण के बंधन में बाँधे रखता है।

3. डमरू का डोरी: ब्रह्मांडीय ऊर्जा का बंधन

डोरी इन दोनों मनकों को एक साथ बाँधती है। यह डोरी उस अदृश्य शक्ति या ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है जो सृष्टि में हर चीज को जोड़ती है। यह वह शक्ति है जो पुरुष और प्रकृति, सृजन और विनाश के बीच सामंजस्य स्थापित करती है। यह डोरी ही कर्म के उस बंधन को भी दर्शाती है, जिससे जीव अपने कर्मों के अनुसार बंधा होता है।

4. डमरू का मध्य भाग: संतुलन और शून्य का रहस्य

डमरू का सबसे महत्वपूर्ण भाग उसका संकरा मध्य भाग है, जो संतुलन (Balance) का प्रतीक है। यह वह बिंदु है जहाँ सृजन और विनाश की शक्तियाँ मिलती हैं और संतुलित होती हैं। यह दिखाता है कि संसार को चलाने के लिए इन दोनों शक्तियों का सामंजस्य आवश्यक है। यही मध्य भाग शून्य का भी प्रतीक है, जो सभी ध्वनियों का स्रोत है और सभी का अंत भी है।

 नाद और अनहद नाद: सृष्टि की ध्वनि से परम मौन तक

डमरू से उत्पन्न होने वाली ध्वनि को 'नाद' कहा जाता है, जिसे सृष्टि का मूल कंपन माना जाता है। कहा जाता है कि इस नाद से ही संस्कृत वर्णमाला के अक्षर उत्पन्न हुए, जो ज्ञान, भाषा और सृष्टि का आधार बने।

लेकिन डमरू का सबसे गहरा रहस्य 'अनहद नाद' है। 'अनहद' का अर्थ है 'बिना किसी आघात के उत्पन्न होने वाली ध्वनि'। यह वह दिव्य ध्वनि है जो भौतिक नहीं है, बल्कि आंतरिक है। यह वह ब्रह्मांडीय ध्वनि है जिसे केवल योगी ही अपनी गहन साधना में सुनते हैं। यह वह परम शांति और चेतना का प्रतीक है जो सृष्टि के शोर के परे है। भगवान शिव, जो महाकाल (समय के स्वामी) हैं, इस अनहद नाद से जुड़े हैं। उनकी तांडव मुद्रा में डमरू बजाना केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि सृष्टि और प्रलय का ब्रह्मांडीय प्रदर्शन है।

यह हमें कठोपनिषद् के उस सत्य की याद दिलाता है:

"एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।

दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।।"

(कठोपनिषद् १.३.१२)

अर्थात: यह आत्मा सभी प्राणियों में गुप्त रूप से निवास करती है और आसानी से प्रकट नहीं होती। यह केवल सूक्ष्म और तीक्ष्ण बुद्धि वाले सूक्ष्मदर्शी साधकों द्वारा ही देखी जाती है।

डमरू हमें यह सिखाता है कि जीवन के द्वंद्वों (सृजन-विनाश, सुख-दुःख) के बीच भी हमें अपनी आंतरिक चेतना को जागृत करना चाहिए। मनके और डोरी के कर्मों के बंधन को समझकर, हमें डमरू के संकरे मध्य भाग की तरह, जीवन में संतुलन साधना चाहिए। अंततः, हमारा लक्ष्य डमरू के नाद से परे उस अनहद नाद तक पहुँचना है, जहाँ परम शांति और शिव की चेतना का अनुभव होता है।