"संघ एनजीओ है?" — भाषा की राजनीति और सत्ता की तल्ख़ी।
संवाददाता: प्रदीप शुक्ला
"संघ एनजीओ है?" — भाषा की राजनीति और सत्ता की तल्ख़ीशब्द कभी मासूम नहीं होते। वे न सिर्फ़ भाषा गढ़ते हैं, बल्कि हमारी सोच और पहचान भी तय करते हैं। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को एनजीओ कहा, तो यह महज़ एक शब्द का चुनाव नहीं था—यह वैचारिक राजनीति का बयान भी था।
पहला सवाल यही है: क्या संघ सचमुच एनजीओ है?
तकनीकी परिभाषा के लिहाज़ से हाँ—यह न तो सरकार है, न ही पंजीकृत राजनीतिक पार्टी। लेकिन संघ को एनजीओ कहना उसकी वास्तविक प्रकृति को सतही और छोटा कर देना है। एनजीओ शब्द आमतौर पर उन संस्थाओं के लिए इस्तेमाल होता है जो सेवा या विकास कार्य करती हैं—स्कूल, अस्पताल, पर्यावरण, राहत आदि। संघ का दावा इससे कहीं आगे का है: यह खुद को सांस्कृतिक आंदोलन और राष्ट्र पुनर्निर्माण का वाहक बताता है।
दूसरा पहलू: संघ का सीधा और गहरा रिश्ता राजनीति से है।
भारत में शायद ही कोई एनजीओ ऐसा है जिसके स्वयंसेवक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनते हों। संघ ने भाजपा के वैचारिक आधार और संगठनात्मक शक्ति के रूप में सीधी भूमिका निभाई है। ऐसे संगठन को एनजीओ कहना न सिर्फ़ गलत है, बल्कि भ्रामक भी है।
तीसरी परत: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एनजीओ शब्द की आलोचना हो रही है।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य संस्थाएँ अब CSO (Civil Society Organization) शब्द का इस्तेमाल करती हैं—क्योंकि यह संगठन को ‘सरकार नहीं’ के बजाय ‘नागरिक समाज का सक्रिय हिस्सा’ परिभाषित करता है। संघ को यदि किसी शब्द से परिभाषित करना है तो वह साधारण एनजीओ नहीं, बल्कि वैचारिक-पक्षपाती सीएसओ है।
लेकिन असली दिलचस्पी इस बात में है कि प्रधानमंत्री ने संघ को एनजीओ क्यों कहा?
यह संघ की दशकों पुरानी आत्म-छवि के उलट है। संघ हमेशा खुद को राजनीति से ऊपर, सांस्कृतिक आंदोलन और “राष्ट्र आत्मा” का प्रतिनिधि बताता आया है। उसे एनजीओ कह देना उसकी दावेदारी को घटाकर हज़ारों स्वयंसेवी संस्थाओं की कतार में खड़ा कर देता है। यह संघ की औक़ात बताने जैसा है—“सिर्फ़ एक संगठन भर।”
यही बात इसे मोदी और संघ के रिश्ते की तल्ख़ी बनाती है। सत्ता की ऊँचाई पर बैठे प्रधानमंत्री का यह इशारा संघ को आईना दिखाने जैसा है कि उसके दावे चाहे जितने विराट हों, असल राजनीति में उसकी हैसियत सीमित है।
संघ की वास्तविकता यह है कि वह समाज में बराबरी और न्याय का आंदोलन नहीं, बल्कि यथास्थिति को बनाए रखने का तंत्र है। उसका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद असल में वंचित वर्गों को आर्थिक-सामाजिक सवालों से हटाकर धार्मिक-परंपरागत पहचान की दीवारों में कैद करता है।
इस लिहाज़ से, मोदी का संघ को एनजीओ कहना अनायास नहीं लगता। यह सत्ता और उसके वैचारिक पालक संगठन के बीच की भीतरी खींचतान का सार्वजनिक इज़हार है।
