आधार और मतदाता सूची का एकीकरण: लोकतांत्रिक सुधार की अपरिहार्य दिशा।

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

आधार और मतदाता सूची का एकीकरण: लोकतांत्रिक सुधार की अपरिहार्य दिशा

भारत का संविधान प्रत्येक वयस्क नागरिक को मताधिकार देता है। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सही-सही दर्ज हो और कोई भी व्यक्ति एक से अधिक बार दर्ज न हो। लेकिन वास्तविकता यह है कि मतदाता सूची में ग़लतियाँ—डुप्लीकेट नाम, मृतक मतदाता, स्थानांतरित नागरिकों के पुराने पते—नियमित रूप से सामने आती हैं। इस कारण चुनाव आयोग को हर वर्ष सूची शुद्धिकरण पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

आज जब आधार (Aadhaar) ने हर भारतीय की पहचान और पते का एकसमान, अद्यतन और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार कर दिया है, तो क्यों न इसे मतदाता सूची से सीधे जोड़ा जाए?

🔹 संवैधानिक आधार

1. अनुच्छेद 324 – भारत के चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की शक्ति और दायित्व प्रदान करता है। मतदाता सूची का रख-रखाव इसी के अंतर्गत आता है।

2. अनुच्छेद 325 – किसी भी व्यक्ति को धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता।

3. अनुच्छेद 326 – वयस्क मताधिकार का अधिकार, जो कि चुनावों का मूलाधार है।

आधार और मतदाता सूची का एकीकरण इन संवैधानिक प्रावधानों को मज़बूत करेगा, क्योंकि यह प्रत्येक योग्य नागरिक को उसके मताधिकार से वंचित होने से बचाएगा और चुनाव आयोग को अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी अधिक दक्षता से निभाने देगा।

🔹 विधिक प्रावधान

 जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951 (Representation of the People Acts) मतदाता सूची तैयार करने और संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं।

चुनाव कानून (संशोधन) अधिनियम, 2021 – इसमें मतदाता सूची में पंजीकरण या सुधार के समय आधार संख्या देने का प्रावधान जोड़ा गया। हालांकि यह स्वैच्छिक है, अनिवार्य नहीं।

यदि संसद चाहे तो RP Act, 1950 की धारा 23 में संशोधन करके “आधार से स्वचालित सत्यापन” का प्रावधान जोड़ सकती है।

🔹 न्यायिक दृष्टिकोण

1. के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2018) – सुप्रीम कोर्ट ने आधार को संवैधानिक ठहराया, लेकिन कहा कि इसका प्रयोग केवल वैध उद्देश्यों के लिए हो और निजता का उल्लंघन न करे।

2. पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ (2003) – न्यायालय ने कहा कि मतदान का अधिकार संवैधानिक अधिकार है और चुनाव आयोग को मतदाता सूची में शुद्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।

3. लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) – इस निर्णय में मतदाता सूची की शुद्धता को लोकतंत्र की पारदर्शिता से सीधे जोड़ा गया।

इन निर्णयों से स्पष्ट है कि यदि आधार का उपयोग केवल पहचान और पते की शुद्धता के लिए किया जाए, तो यह पूरी तरह संवैधानिक और न्यायोचित है।

🔹 व्यावहारिक लाभ

 स्वचालित अपडेट – जैसे ही कोई नागरिक आधार में पता बदलेगा, उसका निर्वाचन क्षेत्र स्वतः बदल जाएगा।

 फर्जी और डुप्लीकेट नामों की समाप्ति – एक ही व्यक्ति के अनेक वोटर आईडी स्वतः हट जाएँगे।

 खर्च में बचत – मतदाता सूची संशोधन पर हर वर्ष होने वाले हज़ारों करोड़ रुपये के खर्च में भारी कमी आएगी।

 पारदर्शिता और विश्वास – नागरिकों का चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास बढ़ेगा।

🔹 संभावित चिंताएँ और समाधान

1. निजता (Privacy) – आधार और वोटिंग रिकॉर्ड को कभी न जोड़ा जाए, केवल पहचान व पते तक ही सीमित रखा जाए।

2. तकनीकी त्रुटि – यदि किसी का आधार विवरण ग़लत है, तो उसके लिए मानव-आधारित अपील व्यवस्था हो।

3. स्वैच्छिक बनाम अनिवार्य – शुरुआत में इसे वैकल्पिक (Opt-in) रखा जाए, और चरणबद्ध तरीके से सार्वभौमिक किया जाए।

भारत का लोकतंत्र आज डिजिटल क्रांति के मोड़ पर खड़ा है। जब बैंक, पासपोर्ट, शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-पंजीकरण सब आधार से जुड़े हैं, तो लोकतंत्र की आत्मा—मतदाता सूची—इससे अलग क्यों रहे?

आधार और मतदाता सूची का एकीकरण न केवल लोकतंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को मज़बूत करेगा, बल्कि चुनाव आयोग को अपने संवैधानिक कर्तव्य को और अधिक कुशलता से निभाने की शक्ति भी देगा।

अब समय है कि संसद और चुनाव आयोग मिलकर एक ठोस, सुरक्षित और पारदर्शी विधिक ढांचा तैयार करें, ताकि हर भारतीय नागरिक का मताधिकार अक्षुण्ण और सुरक्षित रह सके। यही सच्चे अर्थों में “डिजिटल लोकतंत्र” की स्थापना होगी।