श्रीभगवद्गीता : विश्वधर्म का सनातन महामंत्र

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

श्रीभगवद्गीता : विश्वधर्म का सनातन महामंत्र

भारतीय संस्कृति की आत्मा उपनिषदों में प्रकट होती है, और उपनिषदों का हृदय श्रीभगवद्गीता में। गीता कोई साधारण ग्रंथ नहीं, यह स्वयं भगवान् की वाणी है — गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः? (गीता माहात्म्य, पद्मपुराण)।

इसलिए आचार्य शंकराचार्य ने कहा — सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥

अर्थात् समस्त उपनिषद् गाएँ हैं, श्रीकृष्ण गोपालक हैं, अर्जुन बछड़ा है और ज्ञानीजन अमृतस्वरूप गीता का पान करते हैं।

 गीता का स्वरूप : अक्षय रत्नभांडार

गीता एक अथाह सागर है, जिसमें कितनी ही बार गोता लगाओ, नये रत्न ही मिलते हैं। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य से लेकर तिलक, गांधी और अरविन्द तक सभी ने इसमें नये-नये अर्थ खोजे और फिर भी इसकी गहराई का पार नहीं पा सके।

यह वही स्थिति है जिसका संकेत महाभारत में हुआ —

यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्।

गीता में संक्षेप में वह सब है जो शास्त्रों में विस्तृत है।

 गीता का उपदेश : वक्ता, पात्र और अवस्था

 वक्ता – स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण

गीता के वक्ता कोई साधारण मनुष्य नहीं, वरन् स्वयं भगवान् हैं। स्वयं गीता कहती है —

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ (गीता 4.6)

अर्थात् भगवान् अजन्मा होकर भी अपनी माया से अवतार लेते हैं।

अवतारवाद, विभूतिवाद और विश्वरूपदर्शन सब गीता में प्रतिपादित हैं।

 पात्र – अर्जुन

अर्जुन केवल शिष्य नहीं, सखा हैं। यही कारण है कि भगवान् ने कहा —

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ (गीता 4.3)

यानी अर्जुन की पात्रता केवल विद्या नहीं, बल्कि श्रद्धा और सख्य-भाव है।

कठोपनिषद् की प्रतिध्वनि यहाँ मिलती है —

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥

 अवस्था – कुरुक्षेत्र

गीता का उपदेश किसी शांत आश्रम में नहीं, रणक्षेत्र में हुआ। यह विशेष महत्व रखता है।

यदि इसे केवल रूपक मान लिया जाये तो गीता का कर्मयोग निष्क्रिय संन्यास का समर्थन करने लगेगा। परन्तु कुरुक्षेत्र वास्तविक है, और गीता बताती है कि धर्म युद्धक्षेत्र में भी है।

# गीता का धर्म : कर्मयोग

गीता का सार है —

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (गीता 2.47)

अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं।

यही शिक्षा उपनिषदों में भी है —

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। (ईशोपनिषद् 2)

गीता इसी उपनिषद्-तत्व को जीवन के यथार्थ कर्मक्षेत्र में प्रतिष्ठित करती है।

भगवान् बार-बार कहते हैं —

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ (गीता 2.48)

यानी योग है समत्वभाव से कर्म करना।

 गीता का दार्शनिक महत्व

1. ज्ञान और भक्ति का समन्वय – गीता कहती है कि केवल ज्ञान या केवल भक्ति नहीं, बल्कि ज्ञानयुक्त भक्ति और भक्ति-प्रेरित कर्म ही श्रेष्ठ है।

2. अवतारवाद – ईश्वर केवल परे नहीं, बल्कि अवतीर्ण होकर जगत् के लिए कर्म करते हैं।

3. विवेक और वैराग्य – गीता संसार से पलायन नहीं सिखाती, बल्कि संसार में रहते हुए अनासक्त होकर कार्य करना सिखाती है।

4. सार्वभौमिकता – गीता न हिन्दू है, न कोई संप्रदायिक ग्रंथ। यह समस्त मानवता के लिए है। महात्मा गांधी ने कहा था — “जब भी संदेह या निराशा होती है, गीता मेरे लिए मार्गदर्शक दीपक बन जाती है।”

 गीता की शाश्वतता

गीता की व्याख्या कभी समाप्त नहीं हो सकती। क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्य की चेतना विकसित होती है, गीता नये रूप में खुलती है। यही कारण है कि शंकराचार्य से लेकर आज तक हजारों टीकाएँ लिखी गयीं और फिर भी गीता का मर्म शेष है।

गीता स्वयं कहती है —

श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ (गीता 4.39)

गीता केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि विश्वमानव का मार्गदर्शन करनेवाली सनातन ज्योति है। यह न संन्यास का प्रचार करती है, न पलायन का, बल्कि कर्मयोग के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है। इसीलिए श्रीमद्भागवत में गीता को गीतोपनिषद् कहा गया है और कहा गया है कि —

सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वधर्ममयी तथा।

सर्वयज्ञमयी गीता सर्वदेशनुतं मता॥

अतः गीता है भगवान् श्रीकृष्ण की वाङ्मयी मूर्ति, अनन्त काल तक अमृतवर्षा करती हुई।