डिजिटल डिक्टेटरशिप की आहट: नागरिक से डेटा तक, सब सत्ता के अधीन

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

डिजिटल डिक्टेटरशिप की आहट: नागरिक से डेटा तक, सब सत्ता के अधीन

क्या आपने कभी सोचा है कि किसी दिन आपकी पहचान, आपके सारे अधिकार, आपकी सामाजिक और कानूनी मान्यता, सिर्फ एक सर्वर पर दर्ज कोड की मोहताज हो सकती है? और अगर उस कोड को किसी प्रशासनिक प्रक्रिया, तकनीकी खामी, या सत्ता की मर्जी से मिटा दिया जाए, तो आप — भले ज़िंदा हों, खड़े हों, बोल सकें — कानूनन मौजूद नहीं रहेंगे।

यह सिर्फ कोई dystopian कल्पना नहीं, बल्कि एक बनती हुई हकीकत है।

# आधुनिक पहचान: शरीर नहीं, डेटा है

पहले नागरिक की पहचान भौतिक थी — एक नाम, चेहरा, पता, दस्तावेज़। आज वह डिजिटल अवतार में बदल दी गई है — बायोमेट्रिक्स, आधार, वोटर आईडी, मेडिकल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन, फेशियल प्रोफाइल और बैंकिंग डेटा का एक जटिल नेटवर्क। यह डेटा सरकार, कंपनियों और अदृश्य एल्गोरिद्म के हवाले है, नागरिक के पास नहीं।

भारत में यह परिवर्तन बिना सार्वजनिक बहस, बिना सहमति, और बिना पारदर्शी नियंत्रण के लागू हो चुका है।

# डेटा डिलीशन = नागरिकता विलोपन

अब आपको जेल में डालने की ज़रूरत नहीं। बस वोटर लिस्ट से नाम काट दीजिए, आधार निष्क्रिय कर दीजिए, बैंक खाता फ्रीज़ कर दीजिए, और पेंशन सिस्टम से हटा दीजिए — नागरिक गायब।

बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों में लाखों नाम मतदाता सूची से हटाना केवल "डेटा सफाई" नहीं, यह डिजिटल गुमशुदगी है। बिना सूचना, बिना प्रक्रिया, और बिना जवाबदेही।

# फेशियल रिकॉग्निशन: हर नागरिक एक संदिग्ध

हर कैमरा अब आंख है — रैलियों में, सड़कों पर, स्कूलों में। चेहरा पहचानने की तकनीक ने यह फर्क मिटा दिया है कि आप अपराधी हैं या नागरिक। आप किससे मिले, कहां गए, कितनी देर रुके — सब दर्ज हो रहा है।

तेलंगाना, दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद — हर शहर में मौन सर्वेक्षण जारी है। विरोध में शामिल होना अब निगरानी में आना है।

क्या यह लोकतंत्र है या डिजिटल जेल?

# डिजिटल profiling से लोकतांत्रिक engineering

डेटा अब सिर्फ आपकी आदतें नहीं जानता — वह आपको प्रभावित भी करता है। आपकी ऑनलाइन गतिविधियों से तय होता है कि आपको कौन-सी खबर दिखेगी, कौन-सा विचार आपके पास पहुंचेगा। सत्ता अब प्रचार से नहीं, एल्गोरिद्म से शासन करती है।

यह विचारधारा नहीं, डेटा विज्ञान है — और इसका उपयोग पहले से ही चुनावों में, विरोध को दबाने में, और जनमत गढ़ने में हो रहा है।

# 'प्रशासनिक गलती' या रणनीतिक हथियार?

अगर आपके बैंक रिकॉर्ड, पेंशन फाइल, या मेडिकल डेटा 'गलती से' डिलीट हो जाएं, तो आप क्या करेंगे? शिकायत करेंगे? किससे? जब कोई दस्तावेज़ ही न बचे, तो आप कौन साबित करेंगे?

भविष्य में सत्ता की सबसे प्रभावी हिंसा — किसी को 'मिटा' देना — हथियारों से नहीं, कोड से होगी।

# डेटा सुरक्षा कानून: अधिकार नहीं, अनुशासन है

भारत का डेटा प्रोटेक्शन कानून नागरिकों के अधिकार की गारंटी नहीं देता, बल्कि सरकार को और अधिकार देता है। बिना न्यायिक समीक्षा, डेटा हटाया, बदला या साझा किया जा सकता है। कोई स्वतंत्र निगरानी तंत्र नहीं, कोई पारदर्शिता नहीं।

चीन में सामाजिक स्कोरिंग, रूस में प्रदर्शनकारियों की ट्रैकिंग, अमेरिका-UK में सीमित निगरानी — पर भारत में? पूरी निगरानी, बिना उत्तरदायित्व।

# और मीडिया? चुप्पी का डेटा स्ट्रीम

मीडिया इस डिजिटल तंत्र पर न सवाल उठा रहा है, न चेतावनी दे रहा है। वह भी इसी निगरानी सिस्टम का हिस्सा बन चुका है। न्यूज़ अब सत्ता का परदा बन गई है — जो खतरनाक है, उसे "डेटा प्रोजेक्ट" बताकर पेश करती है।

# समाधान: डेटा पर नागरिक का अधिकार

अब समय बहुत कम है। अगर अभी नहीं चेते, तो हम एक ऐसे डेटा-ड्रिवन अधिनायकवाद में प्रवेश करेंगे, जहां स्वतंत्रता सिर्फ डेटाबेस में होगी, और अधिकार केवल QR कोड में।

* क्या करना ज़रूरी है?

* डेटा का स्वामित्व नागरिक के पास हो

* हर डेटा संग्रह पर स्पष्ट सहमति

* डेटा डिलीशन या बदलाव के लिए न्यायिक प्रक्रिया अनिवार्य

* निगरानी के हर साधन पर स्वतंत्र निगरानी तंत्र

* नागरिकों को अधिकार मिले कि वे जान सकें: उनका कौन सा डेटा, किसने, क्यों लिया?


"मेरे पास छिपाने को कुछ नहीं" — सबसे खतरनाक सोच


जब नागरिक यह सोचता है कि "मैंने कुछ गलत नहीं किया", तो वह अनजाने में सत्ता को बिना सवाल के सब कुछ सौंप देता है। और इतिहास ने दिखाया है — जो सत्ता सवालों से परे होती है, वह धीरे-धीरे स्वतंत्रता निगल जाती है।


हमारे समय का सबसे बड़ा सवाल यह है — क्या हम नागरिक रहेंगे, या सिर्फ डेटा पॉइंट्स बनकर रह जाएंगे?


अगर हम नहीं जागे, तो भविष्य में कोई अदालत, कोई लोकतंत्र, और शायद खुद हम भी अपनी पहचान नहीं पा सकेंगे। और तब एक क्लिक से हमें मिटा दिया जाएगा — बिना विरोध, बिना रिकॉर्ड, बिना अपराध।


यह लोकतंत्र नहीं, डेटा डिक्टेटरशिप का घोष है। और इसे रोकना अब सिर्फ अधिकार नहीं, अस्तित्व की शर्त बन गया है।