अडाणी की कर्जकथा: बैंकिंग सिस्टम का अपहरण और मीडिया की चुप्पी

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

अडाणी की कर्जकथा: बैंकिंग सिस्टम का अपहरण और मीडिया की चुप्पी

मुंबई से आई ताज़ा रिपोर्ट में एक सच्चाई और उघड़ गई है — भारत का बैंकिंग तंत्र अब किसी "पब्लिक सेक्टर" का नहीं, बल्कि अडाणी ग्रुप का निजी सहारा बन गया है। जी हां, देश की जनता की गाढ़ी कमाई से जमा पूंजी जिस बैंकिंग प्रणाली में रखी जाती है, वह अब एक कॉरपोरेट साम्राज्य की सेवा में पूरी तरह समर्पित होती जा रही है।

 बढ़ता कर्ज़, बढ़ता मुनाफा, और बढ़ता सरकारी संरक्षण

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार अडाणी ग्रुप का कुल दीर्घकालिक कर्ज़ अब ₹2.65 लाख करोड़ को पार कर चुका है। इसका लगभग 50% हिस्सा भारतीय बैंकों, वित्तीय संस्थानों और एनबीएफसी से आया है — यानी देश के संसाधनों पर निजी कब्जे का राष्ट्रीय मॉडल बन चुका है।

👉 पीएसयू बैंकों से लिया गया कर्ज़ पिछले साल के 13% से बढ़कर 19% हो गया।

👉 एनबीएफसी का योगदान भी 25% तक पहुंच गया।

👉 विदेशी निवेश घट रहा है, लेकिन भारतीय संस्थान (जनता की संपत्ति) पूरी ताक़त से अडाणी साम्राज्य को कंधा दे रहे हैं।

 यह सिर्फ कर्ज़ नहीं, यह सत्ता की गारंटी है

जब कोई व्यापारी इतना भारी कर्ज ले और फिर भी "नेट डेब्ट-टू-EBITDA" 2.6 जैसे आंकड़ों से लीवरेज नियंत्रण में बताए, तो समझ लीजिए कि खेल आंकड़ों का नहीं, सत्ता के संरक्षण का है। अडाणी ग्रुप का विस्तार सिर्फ पूंजी का नहीं, बल्कि राजनीतिक ताक़त और नीति-निर्माण में पकड़ का भी है।

क्या आप सोचते हैं कि कोई किसान, छात्र, या छोटा दुकानदार इतनी "लीवरेज" दिखा पाएगा?

छोटे कर्ज़ के लिए ज़मीन कुर्क, जेल और आत्महत्या की खबरें आम हैं। लेकिन जब कर्ज़ लाखों करोड़ तक पहुंचता है — उसे "विकास", "बिजनेस स्ट्रैटेजी" और "आत्मनिर्भर भारत" जैसे चमकीले लेबल दे दिए जाते हैं।

 क्या बैंक अब सिर्फ कॉरपोरेट के लिए हैं?

सवाल यह नहीं है कि अडाणी ग्रुप मुनाफ़ा कमा रहा है या नहीं। सवाल यह है कि क्या जनता की पूंजी को एक अकेले कॉरपोरेट के जोखिम में डाला जा सकता है?

भारत का बैंकिंग सिस्टम आज एक निजी कॉरपोरेट जोखिम पोर्टफोलियो बन चुका है, जहाँ हर जोखिम को 'सरकार समर्थित विकास' की चादर से ढक दिया जाता है।

मीडिया क्यों चुप है?

क्या आपने इस खबर को न्यूज़ चैनलों पर "ब्रेकिंग न्यूज" बनते देखा? नहीं।

क्या किसी बड़े अख़बार ने इसे मुख्य सुर्ख़ी बनाया? नहीं।

क्यों?

क्योंकि भारत में अब आर्थिक विषमता और कॉरपोरेट अनैतिकता को सवाल नहीं, सिस्टम का हिस्सा मान लिया गया है। मीडिया इस व्यवस्था का प्रवक्ता बन गया है — सवाल करने वाला नहीं।

 यह सिर्फ व्यापार नहीं, यह लोकतंत्र की कीमत है

जब सरकार समर्थित कॉरपोरेट साम्राज्य देश के सार्वजनिक संसाधनों और पूंजी को निगलता है, और उस पर सवाल करने वाले गद्दार, विघ्नसंतोषी या विपक्षी कहे जाते हैं — तब यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, संवैधानिक संकट होता है।

जो पैसा गरीबों के लोन, शिक्षा, स्वास्थ्य या कृषि में जाना चाहिए, वो एक व्यक्ति विशेष की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में झोंका जा रहा है।

 और आख़िर में...

हर बार जब कोई कहे कि "देश बदल रहा है", तो आप यह पूछें:

 क्या देश की आर्थिक नींव चंद कॉरपोरेट घरानों को सौंप देना ही बदलाव है?

 क्या सरकारी बैंक अब सिर्फ अडाणी और अंबानी के लिए हैं?

क्या यह आर्थिक राष्ट्रवाद है या प्रायोजित कॉरपोरेट राष्ट्रभक्ति?

जब करोड़ों भारतीय छोटे कर्ज़ के लिए दर-दर भटकते हों और एक कॉरपोरेट 2.6 लाख करोड़ के कर्ज़ पर भी फूलता-फैलता रहे, तो लोकतंत्र की आत्मा तड़पती है — लेकिन मीडिया, बैंकों और सरकार को शायद फर्क नहीं पड़ता।

विशेष: इस विश्लेषण का मक़सद सिर्फ सूचना देना नहीं है, चेतावनी देना भी है। क्योंकि जब आर्थिक अन्याय सामान्य हो जाए, तो असमानता स्थायी बन जाती है — और एक दिन देश को उसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है।