“संसद का प्रहरी या सत्ता का पहरेदार?”
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
“संसद का प्रहरी या सत्ता का पहरेदार?”"उपराष्ट्रपति की कुर्सी पर देश के संविधान का इम्तिहान"
भारतीय लोकतंत्र में उपराष्ट्रपति का पद सदैव गरिमा, निष्पक्षता और संविधाननिष्ठा का प्रतीक माना जाता रहा है। परंतु बीते वर्षों में यह परंपरा टूटती दिखी है। जगदीप धनखड़ का कार्यकाल इसका ज्वलंत उदाहरण रहा, जहां राज्यसभा की कार्यवाही निष्पक्ष संचालन की बजाय राजनीतिक टकराव का अखाड़ा बन गई। इस्तीफ़े के बाद उनकी रहस्यमयी ‘गुमशुदगी’ ने न केवल सरकार की कार्यप्रणाली बल्कि पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
ऐसे समय में 9 सितम्बर का आगामी उपराष्ट्रपति चुनाव केवल एक पद की लड़ाई नहीं, बल्कि विचारधारा और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता की परीक्षा है। भाजपा ने अपने उम्मीदवार के रूप में सी.पी. राधाकृष्णन को चुना है, जो लंबे समय से पार्टी संगठन और राजनीति में सक्रिय रहे हैं। यह नाम केवल योग्यता या संवैधानिक गरिमा का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि तमिलनाडु में भाजपा की जड़ें जमाने की महत्वाकांक्षा का हिस्सा भी है। यह चयन बताता है कि सत्ता पक्ष अब संवैधानिक पदों को भी चुनावी रणनीति का उपकरण मानने से हिचकता नहीं।
इसके बरक्स विपक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को उतारकर स्पष्ट संदेश दिया है कि यह चुनाव “विचारधारा बनाम अवसरवाद” की लड़ाई है। न्यायपालिका में निष्पक्ष और सख़्त छवि रखने वाले रेड्डी का नाम विपक्ष की ओर से एकजुट होकर आना दर्शाता है कि अब संवैधानिक पदों पर भी विपक्ष सरकार को खुली चुनौती देने को तैयार है।
पर असली सवाल केवल उम्मीदवारों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या उपराष्ट्रपति का पद फिर से उसकी मूल गरिमा पा सकेगा? क्या यह पद संसद में संतुलन, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रहरी बनेगा या फिर सत्ता की आज्ञापालन का प्रतीक?
दुर्भाग्य यह है कि इस पूरे प्रकरण में भारतीय मीडिया ने अपनी भूमिका फिर से संदिग्ध कर दी है। पूर्व उपराष्ट्रपति के अचानक इस्तीफे और रहस्यमय गुमनामी पर कोई गंभीर खोजी रिपोर्टिंग नहीं हुई। यह चुप्पी सिर्फ सत्ता के दबाव का नतीजा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति पत्रकारिता की जिम्मेदारी से पलायन है। जो मीडिया विपक्षी नेताओं की हर टिप्पणी पर घंटे भर के डिबेट करता है, वह उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद से जुड़ी विसंगतियों पर चुप क्यों है?
आज जब लोकतंत्र का हर स्तंभ राजनीतिकरण और अविश्वास से जूझ रहा है, तब उपराष्ट्रपति का चुनाव महज़ सत्ता का “रिहर्सल मैच” बनना हमारे गणराज्य की आत्मा के लिए खतरनाक है। विपक्ष ने इस बार सरकार को सीधी चुनौती दी है, लेकिन असली चुनौती जनता और मीडिया के सामने है—क्या वे संवैधानिक गरिमा और पारदर्शिता की मांग में अपनी भूमिका निभाएंगे या फिर सत्ता की तय पटकथा के दर्शक बने रहेंगे?
लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब सवाल पूछे जाते हैं और जवाबदेही तय की जाती है। अब देखना यह है कि 9 सितम्बर का चुनाव उपराष्ट्रपति की कुर्सी को सत्ता का उपांग बनाता है या संविधान का प्रहरी।