“कपास पर आयात–नीति: क्या सरकार वाशिंगटन की एजेंट है?”
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
“कपास पर आयात–नीति: क्या सरकार वाशिंगटन की एजेंट है?”भारत का संविधान स्पष्ट कहता है कि सरकार की नीतियाँ “जनकल्याण” और “समान अवसर” पर आधारित होनी चाहिए। लेकिन जब कपास के आयात पर से शुल्क हटाने जैसा निर्णय लिया जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह जनकल्याण किसका है—भारतीय किसान का या अमेरिकी पूंजीपति का?
1. संसद की भूमिका पर प्रश्न
कपास जैसे करोड़ों किसानों की आजीविका से जुड़े मुद्दे पर संसद में कोई व्यापक बहस नहीं हुई। निर्णय सीधे अधिसूचना से लागू कर दिया गया। यह संविधान की उस संसदीय परंपरा का उल्लंघन है, जिसमें जनहित के हर बड़े आर्थिक निर्णय पर चर्चा अपेक्षित होती है। जब ईंधन पर टैक्स, रोटी पर GST और शिक्षा पर शुल्क संसद में बहस से गुजरते हैं, तो किसानों की रीढ़ तोड़ने वाला यह फ़ैसला क्यों चुपचाप लागू हुआ?
2. सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी
भारतीय न्यायपालिका अक्सर “जनहित याचिका” के नाम पर छोटे-छोटे मामलों में भी दखल देती है। फिर क्यों करोड़ों किसानों को प्रभावित करने वाली इस नीति पर कोई सुओ मोटो संज्ञान नहीं लिया गया? सुप्रीम कोर्ट ने अनेक बार कहा है कि “किसानों की आत्महत्या एक राष्ट्रीय आपदा है।” लेकिन जब उसी आपदा को और गहरा करने वाली नीतियाँ सामने आती हैं, तो संविधान के रक्षक मौन क्यों हो जाते हैं?
3. WTO और अमेरिकी दबाव
यह कोई रहस्य नहीं कि WTO (विश्व व्यापार संगठन) के तहत भारत पर वर्षों से दबाव है कि वह कृषि सब्सिडी और आयात शुल्क कम करे। सवाल यह है कि क्या हमारी सरकारें भारतीय संविधान की शपथ लेकर आती हैं या WTO की शर्तों की? जब अमेरिका अपने किसानों को अरबों डॉलर की सब्सिडी देकर बचाता है, तब भारत अपने किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार के हवाले क्यों कर देता है?
4. मीडिया की कायरता
सबसे बड़ा अपराध भारतीय मीडिया का है। वही मीडिया जो बॉलीवुड गॉसिप और विपक्षी नेताओं के व्यक्तिगत जीवन पर “प्राइम टाइम” चलाता है, वह किसानों की आत्महत्याओं और आयात नीति की मार पर मौन साध लेता है। यह चुप्पी किसी “स्वतंत्र पत्रकारिता” की नहीं बल्कि “कॉर्पोरेट दासता” की निशानी है।
5. लोकतंत्र पर चोट
जब किसानों के सवाल संसद, सुप्रीम कोर्ट और मीडिया—तीनों जगह से गायब कर दिए जाएँ, तो यह केवल कृषि नीति का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र का संकट है। यह वही लोकतंत्र है जिसकी रक्षा के लिए संविधान निर्माताओं ने कहा था—“भारत एक समाजवादी गणराज्य होगा।” लेकिन आज भारत न समाजवादी है, न गणराज्य—बल्कि कॉर्पोरेट-नियंत्रित उपनिवेश बनता जा रहा है।
असली सवाल यह नहीं है कि कपास पर शुल्क क्यों हटाया गया।
असली सवाल यह है कि क्या भारत की आर्थिक नीतियाँ भारतीय संसद बनाती है या अमेरिकी लॉबी?
और यदि इस पर भी चुप्पी रहे, तो यह मान लेना होगा कि भारत में किसान तो सिर्फ वोट बैंक हैं—उनकी ज़िंदगी, उनकी मौत और उनका खून सरकार और मीडिया दोनों के लिए महज़ आंकड़े हैं।
