“वित्तीय तंगी का झूठा ताबीज: सरकार का श्रमिक विरोधी चेहरा उजागर”।

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


“वित्तीय तंगी का झूठा ताबीज: सरकार का श्रमिक विरोधी चेहरा उजागर”

भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि जो सरकारें जनता की सेवा और कल्याण का दावा करती हैं, वही सरकारें अपने ही कर्मचारियों को श्रमिक से गुलाम बनाने का काम करती हैं। दैनिक वेतनभोगी और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी सालों-साल खटते रहे, लेकिन उनकी मेहनत का हक़ हर बार “वित्तीय तंगी” के नाम पर लूटा गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग (UPHESC) के दैनिक वेतनभोगियों के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय सुनाकर न सिर्फ सरकार को कठघरे में खड़ा किया है बल्कि पूरे देश की सरकारों को कड़ा संदेश दिया है।

 सुप्रीम कोर्ट का प्रहार: ताबीज नहीं है वित्तीय तंगी

अदालत ने दो टूक कहा:

 “सरकार बार-बार वित्तीय तंगी का हवाला नहीं दे सकती। यह कोई ताबीज नहीं है जिससे वह हर बार बच निकले।”

यह टिप्पणी महज न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि सियासी पाखंड की धज्जियाँ उड़ाने वाला निर्णय है। सरकारें जब कॉरपोरेट घरानों को लाखों करोड़ की टैक्स माफी दे सकती हैं, संसद और मंत्रालयों की शान-ओ-शौकत पर अरबों खर्च कर सकती हैं, तो फिर वही सरकारें अपने ही कर्मचारियों के बकाया वेतन और स्थायित्व पर “पैसे नहीं हैं” का रोना क्यों रोती हैं?

 फैसले के धारदार बिंदु

2002 से नियमित सेवा : UPHESC के दैनिक वेतनभोगी कर्मियों को 2002 से स्थायी कर्मचारी माना जाएगा।

बकाया भुगतान अनिवार्य : सरकार को बीते वर्षों का पूरा वेतन और लाभ देना होगा।

 राज्य सरकार की अपील खारिज : न्यायालय ने साफ कहा कि यह “वित्तीय संकट” का नहीं बल्कि श्रमिकों का अधिकार का मामला है।

 श्रमिक विरोधी नीतियों का पर्दाफाश

यह फैसला उन लाखों कर्मचारियों के लिए उम्मीद है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और नगर निकायों में अस्थायी दर्जे पर काम कर रहे हैं। असल में सरकारों की रणनीति साफ रही है—

नियमित कर्मचारियों की जगह कॉन्ट्रैक्ट पर भर्ती कर लो।

कम वेतन देकर श्रमिकों से ज्यादा काम करवाओ।

 जरूरत पड़ने पर “वित्तीय तंगी” का ढोंग रचकर अधिकार टाल दो।

यह नीति न केवल श्रमिक विरोधी है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।

 मीडिया का अपराध

इतना बड़ा फैसला—जो देशभर के करोड़ों कर्मचारियों की नियति बदल सकता है—उस पर भारतीय मीडिया लगभग मौन है। चैनलों पर चुनावी जुमले, चाटुकारिता और बॉलीवुड मसाला तो भरमार है, लेकिन सरकार की जवाबदेही तय करने वाले मुद्दों को दबा दिया जाता है। यह वही मीडिया है जो प्रधानमंत्री की हर “लफ़्फ़ाज़ी” को राष्ट्रभक्ति का अमृत बताता है, लेकिन कर्मचारियों के खून-पसीने के सवालों पर “शर्मनाक चुप्पी” साध लेता है।

 जवाब दो सरकार!

सुप्रीम कोर्ट ने तो रास्ता दिखा दिया है, अब सरकार को जवाब देना होगा—

क्या यह शर्मनाक नहीं कि दो दशक तक अपने ही कर्मचारियों को उनका हक़ देने से बचा गया?

क्या यही “नया भारत” है, जहाँ श्रमिकों का हक़ छीनकर कॉरपोरेट की जेब भरी जाती है?

कब तक जनता की मेहनत और न्याय को “वित्तीय तंगी” का ताबीज दिखाकर कुचला जाएगा?

आज जरूरत है कि कर्मचारी संगठन, बुद्धिजीवी वर्ग और जागरूक जनता इस फैसले को हथियार बनाकर सरकार से जवाब तलब करे। लोकतंत्र में सत्ता का असली मालिक जनता है, न कि वह सरकार जो कॉरपोरेट की गुलामी में अपने कर्मचारियों को गुलाम बना दे।

सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है—“वित्तीय तंगी का बहाना अब नहीं चलेगा।” अब जनता की बारी है कि सरकार से कहे—“जवाब दो!”