“बेरोज़गार पर कर: यह कैसी व्यवस्था, यह कैसा लोकतंत्र?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

बेरोज़गार पर कर: यह कैसी व्यवस्था, यह कैसा लोकतंत्र?”

भारत हो कोई अन्य देश; उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसका युवा वर्ग है। यही वह ताक़त है, जिसे दुनिया “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहकर भारत के भविष्य की उम्मीद मानती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी सरकार सचमुच इस ताक़त को अवसर दे रही है—या बेरोज़गारी की आग में झुलसते इन युवाओं को और कर-भार तले दबा रही है?

 बेरोज़गारी और कर का गठजोड़

आज का सच यह है कि कोचिंग संस्थानों की फीस पर 18% GST वसूला जा रहा है।

यानी जिस बेरोज़गार युवक के पास नौकरी नहीं है, वही जब नौकरी पाने की कोशिश करता है—तो सरकार पहले उससे कर वसूल लेती है। इतना ही नहीं, SSC, रेलवे, बैंकिंग, UPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की फीस पर भी GST वसूला जाता है।

सोचिए, लाखों-करोड़ों युवा हर साल इन परीक्षाओं के लिए आवेदन करते हैं। एक-एक फॉर्म की फीस में सौ-दो सौ रुपये GST जुड़ जाता है। यह रकम छोटी लग सकती है, पर लाखों उम्मीदवारों पर यही रकम सरकार के खजाने में हज़ारों करोड़ का कर-राजस्व बन जाती है। यह राजस्व किनसे लिया जा रहा है? बेरोज़गार युवाओं से।

 शिक्षा और रोजगार—क्या ये व्यापार हैं?

सरकार का तर्क है कि कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाएँ “commercial service” हैं, इसलिए टैक्स लगाना जायज़ है। लेकिन क्या शिक्षा और रोजगार की तलाश को वाणिज्यिक गतिविधि कहना न्यायसंगत है?

यह नीतिगत कायरता है—जहाँ सरकार कॉरपोरेट घरानों को टैक्स में राहत देती है, अरबों के NPA माफ़ कर देती है, वहीं बेरोज़गार युवाओं पर कर का बोझ डाल देती है।

 कायर मीडिया की चुप्पी

और शर्मनाक यह है कि जिस मुद्दे पर देश का भविष्य टिका है, जिस मुद्दे से करोड़ों परिवारों का दर्द जुड़ा है—उस पर भारतीय मीडिया मौन है।

टेलीविज़न चैनल घंटों जाति, धर्म और नफरत पर बहस करते हैं, लेकिन यह सवाल नहीं उठाते कि बेरोज़गार से टैक्स लेना किस नैतिकता और किस संविधान के तहत जायज़ है।

मीडिया ने सत्ता के आगे अपनी रीढ़ खो दी है। यह चुप्पी दर्शाती है कि मीडिया अब लोकतंत्र का प्रहरी नहीं, बल्कि सत्ता का भोंपू बन चुका है।

 युवाओं के साथ छल

सरकार “Skill India”, “Digital India”, “Startup India” जैसे नारे गढ़ती है। प्रधानमंत्री लाल क़िले से “युवा शक्ति” की दुहाई देते हैं। लेकिन यही युवा जब नौकरी के लिए दौड़ता है तो उसे पहले टैक्स के कांटे पर चढ़ा दिया जाता है।

यह धोखा है—युवाओं के विश्वास से, उनके सपनों से और देश के भविष्य से।

 जवाबदेही का सवाल

 क्या सरकार यह मानती है कि बेरोज़गार युवाओं पर टैक्स लगाना उचित है?

 क्या सरकार इस बात को स्वीकार करेगी कि रोजगार दिलाने की प्रक्रिया को राजस्व का स्रोत बना देना युवा-विरोधी नीति है?

क्या मीडिया यह सवाल पूछने का साहस दिखाएगा, या फिर हमेशा की तरह सत्ता के चरणों में पड़ा रहेगा?

भारत को अगर सचमुच विश्व शक्ति बनना है, तो पहला कदम होना चाहिए—शिक्षा, कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं पर से GST हटाना।

बेरोज़गार पर कर लगाना लोकतंत्र नहीं, क्रूर मज़ाक है। यह नीति बदलनी ही होगी। सरकार को जवाब देना होगा और मीडिया को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी—वरना इतिहास गवाह रहेगा कि भारत ने अपने ही युवाओं को राजस्व का स्रोत मानकर उनके सपनों का गला घोंटा।