लोकतंत्र के लिए एक ख़तरनाक क़दम: जनादेश पर भारी पड़ती एजेंसियों की शक्ति

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला

लोकतंत्र के लिए एक ख़तरनाक क़दम: जनादेश पर भारी पड़ती एजेंसियों की शक्ति

भारतीय लोकतंत्र का आधार जनता का जनादेश है, जो संविधान के तहत न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सत्ता के संतुलन से सुरक्षित होता है। लेकिन हाल ही में लोकसभा में पेश किया गया संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 इन सभी लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर एक सीधा हमला है। यह विधेयक अगर कानून का रूप लेता है, तो यह देश को एक ऐसे "पुलिस स्टेट" की ओर धकेल सकता है, जहाँ चुनावी जीत से ज्यादा महत्व जांच एजेंसियों की शक्तियों को मिलेगा।

यह विधेयक एक ऐसा नियम प्रस्तावित करता है जिसके तहत यदि किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को 5 साल या उससे अधिक की सजा वाले अपराध में 30 दिनों तक लगातार हिरासत में रखा जाता है, तो उसे स्वतः ही पद से हटा दिया जाएगा। ऊपर से यह भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त कदम लग सकता है, लेकिन इसकी बारीकियों को देखें तो यह बेहद खतरनाक है। यह कानून 'दोष सिद्ध होने तक निर्दोष' के हमारे न्याय-सिद्धांत का खुला उल्लंघन करता है। किसी भी व्यक्ति का दोष सिर्फ़ और सिर्फ़ अदालत में सिद्ध हो सकता है, लेकिन यह विधेयक दोषसिद्धि से पहले ही पद से हटाने का रास्ता खोलता है। यह न्यायपालिका की अवहेलना है और सत्ताधारी दल को अपने विरोधियों को राजनीतिक रूप से निष्क्रिय करने का एक शक्तिशाली हथियार दे सकता है।

राजनैतिक रूप से, यह विधेयक विपक्ष को कमजोर करने का एक सोचा-समझा दाँव है। यह ऐसे समय में आया है जब विपक्ष के कई बड़े नेताओं, जैसे हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल, पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई चल रही है। यह कानून सत्ताधारी दल को गैर-भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को अस्थिर करने का सीधा अधिकार देगा। यह सिर्फ़ विपक्ष के लिए ही नहीं, बल्कि NDA के घटक दलों, खासकर नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू को भी दबाव में लाने का एक तरीका हो सकता है, ताकि वे केंद्र सरकार के खिलाफ कोई आवाज़ न उठा सकें।

संवैधानिक रूप से, यह विधेयक सत्ता के पृथक्करण और संघवाद के सिद्धांतों को कमजोर करता है। यह कार्यपालिका के हाथ में न्यायपालिका के अधिकार देकर सत्ता के संतुलन को बिगाड़ता है। साथ ही, यह केंद्र सरकार को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को हटाने की शक्ति देकर हमारे संघीय ढांचे को भी चुनौती देता है।

यह विधेयक एक संवैधानिक संशोधन है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। यह देखना होगा कि क्या सरकार इसे पारित करा पाती है। लेकिन, इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि विपक्ष इस विधेयक के खिलाफ एक मजबूत और एकजुट रणनीति बनाए और जनता को इसके गंभीर परिणामों के बारे में जागरूक करे। सिर्फ़ विरोध करना काफी नहीं है, क्योंकि यह लड़ाई केवल एक विधेयक की नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र और संविधान को बचाने की है।