परोपकार की स्वस्थ परंपरा: भारतीय समाज की अंतरात्मा और भविष्य की दिशा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
परोपकार की स्वस्थ परंपरा: भारतीय समाज की अंतरात्मा और भविष्य की दिशाभारत की मिट्टी सदियों से एक ऐसी उपजाऊ भूमि रही है, जहाँ सिर्फ फसलें ही नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और परोपकार के बीज भी पनपे हैं। हमारे इतिहास में, यह भावना धर्म, दर्शन, और सामाजिक व्यवहार के हर पहलू में गहराई से समाई हुई है। यह वही भूमि है जहाँ ऋषियों, मुनियों और संतों ने अपनी शिक्षाओं से समाज को राह दिखाई। राम और कृष्ण की कहानियों से लेकर बुद्ध, महावीर, नानक, चैतन्य और गांधी के सिद्धांतों तक, परोपकार हमेशा भारतीय चेतना का मूल रहा है। यही वजह है कि, चाहे वह किसी भी प्रकार की आपदा हो – अकाल, बाढ़, या कोई अन्य प्राकृतिक त्रासदी – भारतीय समाज ने हमेशा आगे बढ़कर खुले दिल से मदद की है।
ऐतिहासिक और आधुनिक परोपकार के उदाहरण
हमारी परोपकारी परंपरा केवल धार्मिक या आध्यात्मिक दायरे तक सीमित नहीं रही है। इसका एक सशक्त उदाहरण 1962 और 1965 के युद्धों के दौरान देखने को मिला, जब देश की बेटियों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए खुशी-खुशी अपने गहने तक उतार दिए थे। यह बलिदान की भावना दिखाती है कि हमारे समाज में 'स्व' से ऊपर 'समूह' और 'देश' को रखा जाता है। धार्मिक संस्थाओं ने भी हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मंदिरों, मस्जिदों और दरगाहों में दिए गए दान का उपयोग न केवल धार्मिक कार्यों में होता है, बल्कि सामुदायिक भोजन (लंगर), धर्मशालाएँ, और अस्पतालों जैसी सुविधाओं को चलाने में भी होता है।
आधुनिक समय में भी यह परंपरा उतनी ही जीवंत है। 90 के दशक के बाद की बड़ी आतंकवादी घटनाओं के बाद अस्पतालों के बाहर रक्तदान के लिए लगी लंबी कतारें, या मृत्यु के बाद अंगदान की बढ़ती प्रवृत्ति, यह साबित करती है कि भारतीय नागरिकों में परोपकार की भावना गहराई तक समाई हुई है।
औद्योगिक घरानों और परोपकार का नया अध्याय
भारत में परोपकार केवल व्यक्तिगत स्तर तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि हमारे औद्योगिक घरानों ने भी इसमें एक प्रमुख भूमिका निभाई है। टाटा जैसे समूहों ने, स्वामी विवेकानंद के साथ एक संवाद से प्रेरित होकर, अपनी बहुत बड़ी संपत्ति इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISC) की स्थापना के लिए दान कर दी। यह संस्थान आज भी भारत के सबसे उत्कृष्ट शोध संस्थानों में से एक है। टाटा, बिड़ला, बजाज और विप्रो जैसे परिवारों ने परोपकारी गतिविधियों में एक प्रमुख भूमिका निभाई है, जिससे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, अस्पताल और सामाजिक ट्रस्ट स्थापित हुए हैं।
महात्मा गांधी का 'ट्रस्टीशिप' का सिद्धांत, जो यह मानता था कि धनवान लोग अपनी संपत्ति के संरक्षक (ट्रस्टी) होते हैं और उन्हें समाज के कल्याण के लिए इसका उपयोग करना चाहिए, ने कई उद्योगपतियों को प्रेरित किया। सरकार द्वारा अनिवार्य कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) कानून ने भी इस प्रक्रिया को एक कानूनी ढाँचा दिया, जिसके तहत बड़े औद्योगिक घरानों को अपने मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा सामाजिक सुधारों पर खर्च करना अनिवार्य है। अजीम प्रेमजी जैसे परोपकारी व्यक्ति, जिन्होंने अपनी अधिकांश संपत्ति शिक्षा के क्षेत्र में दान कर दी है, इस परंपरा को और भी मजबूत कर रहे हैं।
भविष्य की चुनौतियाँ और संभावनाएं
इंडिया फिलैंथ्रॉपी रिपोर्ट 2022 के अनुसार, अगले कुछ वर्षों में औद्योगिक घराने सामाजिक कार्यों पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करेंगे। यह एक बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है। हालाँकि, जैसा कि कोविड-19 महामारी ने हमें दिखाया है, हमारे समाज में अभी भी गहरी असमानताएँ मौजूद हैं। महामारी ने वंचित वर्गों को असमान रूप से प्रभावित किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि अभी और कितना काम किया जाना बाकी है।
भविष्य में, परोपकारी गतिविधियों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए सुचारू प्रबंधन और पारदर्शिता की आवश्यकता है। केवल धन का आबंटन पर्याप्त नहीं है; इसका सही उपयोग सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत और व्यवस्थित ढाँचा भी आवश्यक है। पश्चिमी देशों में स्थापित बड़े-बड़े ट्रस्ट और फाउंडेशन इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिन्होंने पोलियो और एड्स जैसी बीमारियों के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भौतिकवाद के इस युग में, जब व्यक्तिगत लाभ पर अधिक जोर दिया जाता है, यह महत्वपूर्ण है कि भारतीय समाज अपनी परोपकार की स्वस्थ परंपरा को न भूले। यह परंपरा न केवल हमारे गौरवशाली अतीत का हिस्सा है, बल्कि एक सशक्त, स्वस्थ और समतावादी भारत के निर्माण के लिए भी आवश्यक है। यह परोपकार की भावना ही हमें एक-दूसरे से जोड़ती है और हमें मानवीय बनाती है।